क्या आसिफा को न्याय मिलेगा ?

Posted by Ankur Vimukt
April 16, 2018

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#अपराध
#JusticeForAshifa

” कठुआ सामूहिक दुष्कर्म और मर्डर केस: पुलिस अधिकारी ने कहा था- मैं भी दुष्कर्म करूंगा फिर हत्या करना ”

“कठुआ में हाल में पकड़े गए दुष्कर्मी के बचाव में प्रदर्शन और मार्च से स्तब्ध हूं।”

अपराध शाखा के मुताबिक आसिफा के साथ दुष्कर्म और हत्या मामले में हेड कांस्टेबल तिलक राज और सब-इंस्पेक्टर आनंद दत्ता को भी गिरफ्तार किया गया। दत्ता पहले इस मामले के जांच अधिकारी थे। सूत्रों ने कहा कि जांचकर्ता पुलिसकर्मी ने महत्वपूर्ण सबूतों को क्षतिग्रस्त कर दिया है। सूत्रों ने कहा था कि पीड़िता द्वारा पहने गए कपड़े को अपराध शाखा को सुपुर्द करने से पहले धोया गया था।

कठुआ जिले के हीरानगर के रसाना गांव में आठ साल की बच्ची की हत्या करने से पहले उससे सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। नीचता की हद तो तब हो गई जब स्पेशल पुलिस ऑफिसर दीपक खजूरिया ने बालिका की हत्या से पहले एक बार फिर दुष्कर्म करने की इच्छा जताई।

समाज किस ओर जा रहा है , वह बच्ची न हिन्दू है न ही मुस्लिम वह एक बच्ची है जिसको जन्म एक मां ने दिया होगा ….वही माँ जिसने आपको और मुझे जन्म दिया है ! सेक्स की भूख व्यक्ति को कहा तक ले आयी ……वर्तमान परिस्थिति देखकर लगता है आने वाला समय ऐसा होगा जहां भाई बहन को,पिता बेटी को अपनी हवस का शिकार करने से नहीं चुकेगा । यदि जल्द देश की विकृत सोच में बदलाव लाने हेतु प्रयास न किये गए तो यह देश जल्द नष्ट होगा और जिसके ज़िम्मेदार आप और हम होंगे ।

स्तर यह है कि , किसी घर की छत पर टंगे महिलाओं के अंत:वस्त्र देखकर कुछ असामाजिक तत्व छत फाँदकर उस घर की बहू-बेटियों की इज़्ज़त लूटने की कोशिश कर डालते हैं, या सड़क पर बिना दुपट्टे के निकलने वाली लड़की को देखकर उनके भीतर का शैतान जाग जाता है और मौका देखकर उसे दबोचने का दुस्साहस कर डालते हैं, रात को किसी महिला ने अगर अकेले बाहर निकलने की गलती कर दी तो उसके ऊपर हाथ साफ करने का लोभसंवरण ये लंपट नहीं कर पाते है। इसके बाद यदि ये अपराधी पकड़े जाते हैं तो ख़ुद को बेक़सूर साबित करने ले लिए सारा दोष उन लड़कियों व महिलाओं के सिर मढ़ देते हैं। इनका समर्थन कुछ व्यवहारवादी बुध्दिजीवी भी इस प्रकार करते हैं कि क्यों वे अपने अंत:वस्त्र बिना किसी लज्जा के खुले में सूखने के लिए डालकर, या अपने अंगों से दुपट्टा हटाकर, या रात के समय अकेले बाहर निकलकर पुरुष कामाग्नि को आमंत्रण देती हैं।

लड़कियाँ अपनी रोज़मर्रा के कार्यों में इस बात से कदाचित् अनभिज्ञ रहती हैं कि कौन सा कार्य उनके अपने लिये ही घातक साबित हो जाय और उनका ज़ख़्म ही इस समाज की नज़र में जुर्म बन जाए और तब, वहाँ की सामाजिक व्यवस्था उन्हें दोषी क़रार देने में कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हो जाती है।

सोचनीय !!

– अंकुर त्रिपाठी ‘विमुक्त’
लेखक

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