धर्म के पाटों में दम तोड़ते बेटियों का सम्मान और न्याय

Posted by Himanshu Priyadarshi
April 15, 2018

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कठुआ और उन्नाव गैंगरेप केस में सत्तारूढ़ दल द्वारा सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के आरोपियों को बचाने के लिए लीपा-पोती किया जाना बहुत दुखद है जिस तरह सरकार और उसके सहयोगी दल-संगठनों ने आरोपियों की काली करतूतों को वूश डालकर धोने की भरपूर कोशिश की और  सामूहिक दुष्कर्म तथा क्रूरतम हत्या में भी दीन-धर्म तलाशने की जो कायरतापूर्वक प्रयास किया जाना तथा उसके बाद कठुआ, जम्मू में आरोपियों के बचाव जो तिरंगा रैली निकाली गई।

उससे हमारे राष्ट्रीय ध्वज का जो अपमान हुआ सो हुआ लेकिन एक बात ये जरूर साबित हो गयी कि भारतीय समाज के तौर पर इंसानी सभ्यता में सबसे बड़े कलंकित प्राणी जरूर हैं ऐसी स्थिति में तो हमें सल्फ्यूरिक अम्ल और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का घोल पीकर अपने हृदय और ज़ेहन का आत्मदाह कर लेना चाहिए काहे कि हमारे अन्तर में इतनी संवेदनशीलता तो बची नहीं कि हम अपराध के अर्थ को समझ सकें…अपराध महज़ अपराध होता है फिर चाहे वो कोई भी करे अपराधी चाहे किसी भी जात-धर्म का हो उसे अपराध के अनुरूप और भरपूर दण्ड मिले इसमें अपराधियों के धर्म को तलाशने का कैसा घिनौना ख़्याल है?

एक ओर जहां संयुक्त राष्ट्र ने कठुआ और उन्नाव केसों को लेकर भारतीय समाज और उसके न्यायिक व्यवस्था पर जो कचोटता हुआ सवाल उठाया है वहीं हमारे प्रधानमंत्री के मुखारविंद से सिर्फ इतने ही बोल फूटे कि दोषियों को बख़्शा नहीं जाएगा लेकिन वे अपराधियों के बचाव में संलिप्त शासन-प्रशासन के लोगों पर दो टूक भी न बोल सके…इस प्रकार क्या उनका ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का नारा बदलकर ये नहीं हो जाना चाहिए कि ‘बेटी पढ़ाओ की न पढ़ाओ पर बेटी हमीं से बचाओ’? क्या उन्हें ये विचार नहीं करना चाहिए था कि ‘सबका साथ सबका विकास’ के साथ ही ‘सबको सम्मान सबको न्याय’ भी मिलना चाहिए?

फिर यहीं दूसरी तरफ स्वघोषित राष्ट्रीय स्वाभिमान दल के अगुआ सबसे बड़े देशभक्त दीपक शर्मा जैसे लोग फेसबुक लाइव पर मोर्चा खोलकर उन्नाव और कठुआ केस पर व्याख्यान देते हैं कि “बेटी आसिफा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रेप की पुष्टि तो हुई ही नहीं उसका रेप किया ही नहीं गया ये तो हमारे हिन्दू भाइयों को बिकाऊ मीडिया तथा वामपंथी सोच रखने वाले लोगों ने झूठे केस में फंसाने की साजिश की और कठुआ में तो ऐसा कोई मन्दिर है ही नहीं जिसका जिक्र मीडिया में किया जा रहा है और जो एक मंदिर है भी वो एकदम खुला हुआ है जिसमें कोई भी कमरा नहीं है और वो सार्वजनिक स्थान पर है जहां लोगों की आवाजाही निरन्तर रहती है ऐसे में यदि वहां ऐसा कोई कुकर्म होता तो क्या लोगों को पता ही नहीं चलता इसलिए ये सब झूठ है…शर्मा ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि बच्ची आसिफा का शव तो जंगल से मिला है किसी मंदिर से नहीं और आसिफा की हत्या कठुआ में छिपी हुए रोहिंग्या मुसलमानों ने की न कि हमारे हिन्दू भाइयों ने…”

जब इस बात पर कमेंट बॉक्स में लोगों ने आपत्ति जाहिर की तथा कुछ सिरफिरे लोगों ने अपनी बात आराम से न करके अपशब्दों का प्रयोग किया तो जबाब में महामना क्रांतिकारी दीपक शर्मा ने भर-भर के मां-बहनों की गालियां दीं और अपने चाहने वाले कट्टर हिन्दू भाइयों से अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिए क्रूरतापूर्वक विनम्र अपील की…

यदि दीपक शर्मा की बात में रत्ती भर भी सच्चाई होती तो वे केस से संबंधित तथ्य और सबूत जुटाकर संबंधित केस के अफसरों को नहीं देते ताकि जल्द से जल्द केस का समाधान हो आरोपी दण्ड को प्राप्त हों परन्तु शर्मा जी ने ऐसा कुछ भी करने की सोची नहीं…इनके जैसे लोगों का एक ही काम होता है कि किसी भी विषय की गम्भीरता को समझे बिना उसमें हिन्दू-मुस्लिम प्रोपैगैंडा को घुसा देना मतलब कुछ भी करके जनता का ध्यान प्रस्तुत समस्या से भटकाकर उस समस्या की ओर मोड़ देना जो वास्तव में है ही नहीं…ये सब चल रहा है और शासन-प्रशासन को कानों-कान कोई खबर भी नहीं…हद है कोई समाज को तोड़ने का खुला प्रयास कर रहा है और सत्ता अपने मद में चूर आंखें मूंदे बैठी है, ऐसा क्यों है किसी को कुछ पता नहीं?

जब आरोपी पक्ष के लोग कहते हैं कि क्या कोई तीन बच्चों की माँ से रेप करेगा और प्रशासन उसपर भी माननीय माननीय करता रहता है तो ऐसे प्रशासन से क्या उम्मीद की जा सकती है कि वो ऐसे असामाजिक तत्वों(जो साम्प्रदायिक सद्भाव को ठेस पहुंचाकर समाज को खंडित करना चाहते हैं) पर कार्यवाही करेगा जो समाज तोड़ने पर तुले हुए हैं? क्या हम सबको और सरकार को भी इसपर विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि अपराध तथा अपराधियों को धर्म के चश्में से देखने की जरूरत नहीं है और यदि ऐसा ही रहा तो किसी याची को न्याय कैसे मिल पायेगा?????

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