निर्भया के नाम आसिफा का खत-

Posted by ROHIT KUMAR PATHAK
April 17, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

 दीदी, तुम कहां हो ….?,  मैं तुम्हें कब से ढूंढ रही हूं क्योंकि मुझें समझ नहीं आ रहा कि मैं अपना दर्द किससे कहूं। हम सगी बहनें तो नहीं लेकिन हमारे बीच दर्द का रिश्ता तो ज़रूर है। इसलिए मैं तुम्हीं से अपना दर्द कह देना चाहती हूँ। दीदी 16 दिसंबर 2012 को तुम्हें 6 लोगों ने मिलकर नोचा था। उनको दया तो नहीं आयी मगर भगवान को तुमपर दया जरूर आ गयी और उन्होंने तुम्हें अपने पास बुला लिया। मगर जब तुम इस बेरहम दुनिया से चली गईं थी तो यहाँ खूब शोर हुआ और लगा कि अब लड़कियों के लिए ये देश सबसे ज्यादा सुरक्षित होगा। लेकिन दीदी ऐसा नहीं हुआ। देखो तुम्हें गए हुए 6 साल बीत चुकें है मगर एकबार फिर, आज मेरे साथ क्या हुआ?  मेरे साथ उसी घटना को और डरावनें तरीक़े से दोहराया गया।   

PHOTO – GOOGLE


दीदी, मेरा नाम आशिफा है। मेरा घर जम्मू में कठुआ जिले के रसाना गांव में था। मेरी जान जाने का कारण मेरा अपना मुसलमान समुदाय ही था जिसमें मैं पैदा हुई थी और मेरी ग़लती बस इतनी सी थी कि मैं उस समुदाय में पैदा हुई………? लेकिन दीदी मैं तो सिर्फ आठ ही साल की थी, तुम तो फिर भी मुझसे बड़ी थी।………..  उनको मुझपर थोड़ी भी दया नहीं आयी, दीदी। पर कोई बात नहीं दीदी मैं यह सोचकर चुप हूँ कि इनको तुमपर भी दया, कहां आयी थी। दीदी, मेरी गलती बस इतनी है कि मैं अपने घोड़े को ढूंढते-ढूंढते किसी इंसान रूपी जानवर के चंगुल में फंस गई। इन लोगों ने मुझें बहुत मारा दीदी। ………मारने के बाद एक कमरे में बंद कर दिया। फिर लोग आते रहे और मुझ छोटी सी बच्ची पर जुल्म करते रहे। ये दर्द का सिलसिला, कई दिनोंतक चला।  उन्होंने ये भी नहीं सोचा कि इस छोटी सी बच्ची का क्या कसूर, इसने तो अभी ठीक से दुनिया भी नहीं देखी । शायद…….. उनमें दया नहीं थी । तभी तो उन्होंने मेरा ये हाल किया। वो आठ लोग थे और मुझें बहुत दर्द हुआ, दीदी।जानती हो, न पेट में दाना न शरीर में जान, और उपर से ख़ाली पेट जो थी और उस खाली पेट में भी, वे लोग मुझें न जाने कैसी नशीली दवा ख़िलाते रहे, और एक के बाद एक मेरे नन्हें से शरीर पर आते रहे। मेरे शरीर का ऐसा कौन अंग है जो उन्होंने नहीं नोचा, दीदी। बहुत दर्द हुआ…….बहुत, पर मुझें ये नहीं समझ आ रहा कि उन्हें क्या मिला, बस कुछ पल का मजा या अन्धे धर्म की संतुष्टि, आखिर मिला क्या उन्हें,,,,,,,,,इस नन्हें शरीर को नोच कर।

 

जानती हो दीदी, जो लोग आते थे उनमें कुछ पुलिस वाले भी थे। उनमें से एक तो, वही पुलिस वाला था जिसे मेरे घर वालों ने, मुझे ढूंढने के लिए लगाया था। मुझ नन्हीं सी जान को इन दरिंदों ने खुद तो, जी-जान से कुचला, फिर भी इनका मन नहीं भरा तो….. मुझें रौंदने के लिए इन लोगों ने यूपी के मेरठ से भी अपने किसी दोस्त को बुला लिया। दीदी मुझमें जान तो बची नहीं थी फिर भी ये लोग मुझें मारने के लिए जंगल ले गए। वहां मुझे मारने ही जा रहे थे कि एक पुलिस वाले ने कहा रुको…………?  मुझें लगा कि शायद उसे मुझपर दया आ गई हो, लगा शायद अब मैं बच जाऊंगी।   लेकिन दीदी उसने जो कहा उसे सुनकर मेरी जीने की इच्छा एकदम मर गयी। जानती हो उसने क्या कहा, उसने कहा – रुको, इसके मरने से पहले मैं इसे एक बार और नोचना चाहता हूँ। और तब उन सबने, मुझें फिर नोंचा।

 

मेरा दोष क्या था दीदी..? मैं तो इतनी छोटी हूं कि मुझे जाति, बिरादरी और धर्म में फर्क तक नहीं पता। मैं बहुत डरी हुई हूं, दीदी।  कुछ वकील और नेता मेरे गुनहगारों को बचाने के लिए शोर मचा रहे हैं। डर इसलिए रहीं हूं क्योंकि अगर ये लोग बच गए तो फिर किसी मासूम को नोचेंगे। हां कुछ लोग हैं जो मेरे लिए इंसाफ मांग रहे हैं लेकिन तुम्हें तो मालूम ही है, दीदी…………… ये सबकुछ, कुछ दिनों तक ही चलेगा। ये सब भूल जाएंगे और अपने-अपने घर चले जाएंगे।  कुछ नहीं बदलेगा। तुम्हारे जाने के बाद कुछ बदला था क्या जो मेरे जाने के बाद बदलेगा। कभी बंगाल, तो कभी उन्नाव, तो कभी असम, हर एक दिन रेप का होता हैं। अब किसे फर्क पड़ता है। सब सोचते है, कौन सी हमारी बेटी है। छोड़ो न चलो अपना काम करें । कभी बच्चियों के साथ, तो कभी बूढ़ी औरतों के साथ। ये सब तो चलता ही रहेगा। क्योंकि हमारे समाज की हर लड़की, हर औरत नोचने के लिए ही तो बनी है।

Justice for AASIFA

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.