न्यूटन को मिला सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार, जानिए ऐसा क्या है न्यूटन में

Posted by ABHINAV PATHAK
April 14, 2018

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न्यूटन।
एक ऐसे लोकतंत्र की कहानी जो अपनी बड़ी जनसंख्या पर गुमान करता है। एक ऐसे समाज की कहानी जो बुद्ध, महावीर और गाँधी के सिद्धांतों पर चलने की बात करता है।
यह कहानी है एक बेचैनी की। सिस्टम से लड़ने की बेचैनी, सिस्टम में टिकने की बेचैनी और सिस्टम से लड़ने की बेचैनी। आदिवासी समुदाय के भीतर सिस्टम में घुसने की बेचैनी है, जिसे समाज समझ नहीं पाया है। देेेश के प्रशासन के भीतर सिस्टम में यथास्थिति को बरकरार रखने की बेचैनी है। वहींं देेेश का एक युवा बेचैन है बदलाव के लिए। न्यूटन कहानी है एक संघर्ष और उम्मीद की।

किसी मिडिल क्लास परिवार का सिद्धांतवादी न्यूटन जीवन को क़िताबों से अलग नहीं देखता। उसके लिए थ्योरी और प्रैक्टिकल एक ही है। इसे वह आदिवासी इलाके में ड्यूटी करने वक्त भी बनाये रखता है।

कहानी में तीन मुख्य पात्र हैं। एक न्यूटन (राजकुमार राव) जो अभी अभी चुनाव अधिकारी के रूप में तैनात हुआ है, एक आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) जो सिस्टम का आदी हो चुका है और एक पात्र है माल्को।
माल्को एक आदिवासी महिला है जो बीएलओ का काम देख रही है।
न्यूटन को हेलीकॉप्टर से छत्तीसगढ़ के जंगली इलाके में पहुंचाया गया है। वहाँ आत्मा सिंह चुनाव को अपने हिसाब से चलाना चाहता है। वो कहता है कि यहाँ चुनाव कराना असंभव है क्योंकि नक्सलियों ने चुनाव का बहिष्कार किया है। फिर भी न्यूटन अपनी ड्यूटी को गम्भीरता से लेता है। वो पोलिंग बूथ पर जाता है और आधे दिन तक लोगों का इंतजार करता है। आधा दिन बीतने तक एक भी वोटिंग नहीं होती है। तभी  आत्मा सिंह  को ख़बर मिलती है कि विदेशी पत्रकार चुनाव की रिपोर्टिंग करने आ रही है। इसके बाद दिखता है आदिवासी समाज के साथ  सिस्टम का व्यवहार।

अपने दल बल के साथ गाँव में जाते हैं और डरा धमकाकर पोलिंग बूथ तक लाते हैं। लेकिन न्यूटन को यह मंजूर नहीं। वह लोगों को वोटिंग का प्रोसेस और फ़ायदे बताता है। इसमें उसका साथ देती है माल्को। आदिवासी समाज के लोग वोटिंग का फ़ायदा नहीं समझते फिर भी वोट करते हैं। इसके बाद विदेशी पत्रकार आती हैं और रिपोर्टिंग करके चली जाती हैं। इसके बाद फिर से आत्मा सिंह वोटिंग को बंद करा देता है। न्यूटन यह बर्दाश्त नहीं करता और आख़िरकार उसे बंदूक उठानी पड़ती है। वोटिंग के आखिरी सेकेन्ड तक न्यूटन अपनी ड्यूटी पर तैनात रहता है।

इस प्रकार न्यूटन आदिवासी समाज की वह पीड़ा है जिसे सरकारें नहीं महसूस करतीं। नक्सली ताक़तों की आड़ में उनके संवैधानिक अधिकार कहीं खो जाते हैं। न्यूटन इन सबके बीच उम्मीद का एक किरण बन कर उभरता है। अपने ड्यूटी को पूरा करने के लिए उसे हथियार तक उठाने पड़ते हैं इसलिए न्यूटन आजाद भारत का सच्चा सिपाही है। न्यूटन हज़ारों वंचितों के लिए भारत की वह नींव है जिसकी बदौलत लोकतंत्र की इमारत मजबूती से खड़ी है।

फ़ोटो- गूगल

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