प्रतिष्ठा के आँच में जल रहा “प्रतिभा”

Posted by Pintu Kumar
April 25, 2018

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प्रतिष्ठा : मैं नहीं मानता!!!   अगर मुझे कोई ये पुछे की इस दुनिया का सबसे बकवास चीज क्या है? जिसके पिछे समस्त मानव जाती परेशान है | तो मै निःसंदेह कहुँगा की वो बकवास चीज है “प्रतिष्ठा” अब भला ये तथा कथित प्रतिष्ठित समाज जो समझे पर मैं तो इस प्रतिष्ठा को बकवास ही समझता आखिर क्यों न समझू, आप ही बताओ वो चीज कैसे अच्छी हो सकती है, जो लोगो को परेशान करे | जन्म से लेकर मरने तक की बेटा एेसा न करना ये मत करना वैसा न करना वे मत करना नहीं तो प्रतिष्ठा खत्म हो जयेगी | ये एक ऐसा बोझ है, जिसके वजह से हमेशा लोगों के अन्दर एक डर का साया होता है | वो डर किसी कानून का नहीं वही बकवास प्रतिष्ठा का होता है | अब भला संविधान भी यही कहता की कानून के अलवा लोगों को डराना अपराध है | तो हम कैसे न माने की “प्रतिष्ठा” बकवास है | अब मै प्रतिष्ठा के शाब्दिक अर्थ पे अपना एक अलग विचार रखना चाहता हूँ | आप जब इस प्रतिष्ठा शब्द को सुनते है, तो दो शब्द हमारे कानो के पास से गुजरता है वो ऐसा महसूस होता है :- पर एवं तिष्ठा ! एक नजर में कहे तो “पर” मतलब पराया, तब  हमे लगता है की दुसरे के कर्म या चर्चा से प्रतिष्ठा बनता है, मतलब साफ है प्रतिष्ठा दूसरे के द्वारा किया जाने वाला कर्म के समानुपती है | अब जब भला दुसरे पे हमारा बस नहीं तो तो कैसी प्रतिष्ठा की उम्मिद | अंततः मै एक बार फिर कहूँगा कि प्रतिष्ठा एक बकवास है, फिर मै क्यों मानू | “बनना है तो श्वअभिमानी बनो प्रतिष्ठित नहीं”   पिन्टू कुमार, के कलम से!!

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