बड़े चैनलों की अनदेखी की वजह से उभरते सैंकड़ों लोकल वेब न्यूज़ चैनल, और सच

Posted by Abhijeet Thakur
April 12, 2018

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दिल्ली / एनसीआर
देश की राजधानी को ख़बरों की राजधानी भी कह सकते हैं । देश के लगभग तमाम छोटे बड़े समाचार संसथान (प्रिंट , इलेक्ट्रॉनिक या वेब ) एनसीआर से ही संचालित होते हैं , मसलन पत्रकारों और खबरियों का सबसे बड़ा हुज़ूम भी यहीं वास करता है । दिल्ली के हर क्षेत्र में आपको दर्जनों पत्रकार मिल जाएंगे जो कई नामी से ले कर छोटे मोटे मीडिया संसथान से जुड़े हैं और अपने अपने बीट या क्षेत्र की ख़बरों को रिपोर्ट कर अपनी आजीविका कमाते हैं या शौकिया तौर पर मुफ़्त में भी ख़बरों का आदान प्रदान कर के महज पत्रकार या प्रेस का टैग लगाये अपनी सामजिक प्रतिष्ठा और पहुँच को बढ़ाकर आय का श्रोत बनाने में निरंतर प्रयासरत रहते हैं । बड़े इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ब्रांड से जुड़े पत्रकार भी निरंतर जूझते रहते हैं ख़बरों की तलाश में और दिन रात के प्रयासों के फलस्वरूप महीने में एक आधा दर्जन खबरें बड़े चैनल की क्राइटेरिया में फिट बैठ पाती हैं जो चलती और दिखती हैं ।
ऐसे में दिल्ली एनसीआर में पिछले कुछ वर्षों तक लोकल अखबारों का जोर ज्यादा हुआ करता था जो स्थानीय ख़बरों को प्रमुखता से छाप कर लोकल मीडिया की कमी को पूरा करते थे । बावजूद इसके स्थानीय लोगों , नेताओं , संस्था , संगठन , शैक्षणिक संसथान या व्यावसायिक संस्थानों को टीवी या सोशल मीडिया पर दिखने की चाह रह ही जाती थी । मसलन वो छोटे बड़े कार्यक्रमों में स्थानीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों को प्रमुखता से आमंत्रित करते इस इच्छा के साथ की शायद कुछ एक मिनट या सेकंड उनकी खबर भी कहीं टीवी पर दिख जाए । लोकल खबरें दिखाने वाले एक आध चैनल में कई बार खबरें चल भी जाती लेकिन ज्यादातर बड़े ब्रांड इस तरह की ख़बरों को तरजीह नहीं देते । फलस्वरूप लोग महज माइक आईडी के साथ बाइट लेते हुए रिपोर्टर वाली अपनी फ़ोटो को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर काम चलाते ताकि समाज में सन्देश प्रेषित हो की इतनी सारी मीडिया ने अमुख खबर या कार्यक्रम को कवर किया । दिखाया या नहीं दिखाया बाद की बात है , कम से कम माहौल तो बनाया !!
बीते दो -ढ़ाई सालों में ये ट्रेंड बदला । बड़े चैनल से जुड़े इक्के दुक्के स्मार्ट पत्रकारों ने लोकल और हाइपर लोकल ख़बरों को स्थान देने के लिये न्यूज़ पोर्टल या वेब न्यूज़ का मंच तैयार किया । अब सभी खबरें टीवी के अंदाज़ में ही वेब न्यूज़ पर दिखने लगी । इंटरनेट और डिजिटल इंडिया के बढ़ते प्रभाव में लोग मोबाइल पर खबरें देखने में रुचि लेने लगे । कोई भी शख्स अपने मोबाइल पर फेसबुक , यूट्यूब , वेबसाइट या न्यूज़ एप्प के माध्यम से अपने गाँव , कस्बे, मोहल्ले या कॉलोनी से सम्बंधित खबरें बिलकुल टीवी के अंदाज़ में देख सकता था । आईडिया धीरे धीरे हिट हो चला और लोकल सेक्शन से इन वेब चैनलों को रेवेन्यू भी आने लगा ।
लेकिन तभी एंट्री हुई भेड़चाल की !!

* अकेले नॉर्थ दिल्ली में हैं 40 वेब न्यूज़ चैनल / पोर्टल
जहाँ इक्के दुक्के हुआ करते थे वहाँ अब अकेले नॉर्थ दिल्ली में 30 से 40 की संख्या में वेब न्यूज़ चैनल है । किसी ने वेब पोर्टल बनवा रखा है तो कोई सिर्फ फेसबुक और यूट्यूब से ही काम चला रहा है । एक बात जो सब में कॉमन है वो है माइक आईडी । चैनल का स्तर , ख़बरों की गुणवत्ता या विश्वशनियता चाहे जो भी हो… लेकिन मुँह में घुसेड़ कर बाइट लेने के लिये माइक आईडी दर्जनों की संख्या में हर हाथ में दिख जाएंगे ।

कहाँ से होती है आमदनी ?
जहाँ एक ओर बड़े मीडिया संस्थानों को हाइपर लोकल सेक्शन ख़बरों और रेवेन्यू के हिसाब से बाजार नहीं दीखता वहीं मंदी के दौर में भी आज से सभी वेब न्यूज़ चैनल न सिर्फ़ चल रहे हैं बल्कि कुछ न कुछ कमा रहे हैं । जरिया चाहे जो भी हो ।

* कुछ इस प्रकार है हाइपर लोकल न्यूज़ का बाज़ार
1. Advertorial ( विज्ञापन ख़बर )
बहुतायत चैनल संचालक advertorial शब्द से अनिभिज्ञ हैं । दरअसल Advertorial न्यूज़ एक स्मार्ट तकनीक मानी जाती है उपभोक्ताओं तक अपने उत्पाद या सेवाओं को पहुँचाने के लिये । वीडियो विज्ञापन को खबर के अंदाज़ में बनाया जाता है जिसमें दर्शकों को दिखती तो खबर है लेकिन वो होता विज्ञापन है । बड़े बड़े चैनल या अखबारों में भी ये Advertorial बड़ी भारी कीमत वसूल कर चलाये जाते हैं । लोकल सेक्शन में 10,000 से ले कर 50,000 तक के विज्ञापन बनते और चलते हैं । लेकिन इस स्तर के वीडियो कंटेंट तैयार करने में सक्षम चैनलों की स्थानीय स्तर पर कमी है जबकि पोटेंशियल कस्टमर बेस बहुत बड़ा है ।

2. पीआर न्यूज़
Advertorial न्यूज़ का ही दूसरा प्रारूप जिसमें मुख्य रूप से कार्यक्रमों / नेताओं इत्यादि को कवर कर न्यूज़ पैकेज में दिखाया जाता है । रेट चैनल के स्तर और पहुँच पर निर्भर करता है । मुफ़्त, हज़ार दो हज़ार से ले कर बढ़िया स्तर के लोकल वेब न्यूज़ चैनल के लिये ये कीमत ज्यादा भी हो सकती है ।
3. माइक आईडी चमकाना मात्र

छोटे मोटे माइक आईडी वाले 500-1000 में उपलब्ध (ये काम छुटभैये करते हैं ससम्मान )

4. उगाही ( गैरकानूनी लेकिन सबसे ज्यादा चलन में )
इसमें बड़े ब्रांड की आईडी और लोकल वेब चैनल के गठजोड़ से एक बेजोड़ सिस्टम तैयार होता है और आमदनी होती है ज़बरदस्त । हालाँकि सब ऐसे नहीं हैं लेकिन जो हैं वो ज़बरदस्त हैं । अवैध शराब कारोबारी, मिट्टी खनन माफ़िया, अवैध निर्माण, ईंट भट्ठे , फैक्ट्रीयाँ, ट्रैफिक पुलिस और कई स्थानीय अवैध गतिविधियों पर पैनी नज़र रखते हुए महीने में इक आध बार कैमरे आईडी संग राउंड लगाओ और लाखों पाओ वाला फॉर्मूला है ये । खबर कहीं ना भी चलती हो तो वीडियो बनाकर अपने वेब चैनल पर धुआँधार दिखाकर व्हाट्सऐप ग्रुपों पर तो सर्कुलेट की ही जा सकती है । शिकार को आतंकित करने के लिये इतना ही काफी । पैकेट अगले दिन कार्यालय तक पहुँच जाएंगे (नोटों वाले )
5. विज्ञापन
सीधे सीधे एल बैंड या ख़बरों के प्रायोजक वाले विज्ञापन कम ही मिलते हैं । लेकिन संपर्क अच्छे हों और चैनल की क्वालिटी, ब्रांडिंग और पहुँच बढ़िया तो मिल भी जाते हैं ।
* मीडिया की साख पर बट्टा कहाँ लगता है ?
पहल अच्छी थी, कुछ चैनल पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ चलते हुए गुणवत्ता भी बरकरार रखे हुए हैं । लेकिन बहुतायत (वही हुजूम और भेड़चाल वाले ) तथाकथित पत्रकार ख़बरों के नाम पर कुछ भी दिखा और चला रहे हैं । प्रेजेंटेशन घटिया , स्क्रिप्ट बेजान , विज़ुअल बेकार और voice ओवर बचकाना लेकिन चैनल है भैया…. चलेगा । चैनल बनाना और चलाना इतना आसान है की कम पढ़ा लिखा बंदा भी अकाउंट बना कर चालाना शुरू कर देता है।
कुल मिलाकर एक बड़ा सेक्शन जो की ख़बरों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है और बिज़नेस के हिसाब से भी बड़ा बाजार, लेकिन राज कर रहे हैं न जाने कैसे कैसे पत्रकार !! अगर कोई बड़ी मीडिया कंपनी योजनाबद्ध तरीके से इस छितराये कुनबे को संगठित कर संचालित करे या ये खुद भी संगठित हो कर एक कॉमन बैनर की स्थापना कर इसी दिशा में आगे बढ़ें तो सही और व्यवहारिक तौर तरीकों से भी अवसर बेहतर हो सकते हैं । और हर कोई गुणवत्ता के साथ काम करते हुए अच्छे पत्रकार होने का सम्मान भी बनाये रख सकता है । इसमें मीडिया की साख भी बरकरार रहेगी ।
आज अगर सिर्फ दिल्ली एनसीआर की बात करें तो सैंकड़ो की संख्या में लोकल वेब चैनल्स चलाये जा रहे हैं । ख़बरों की तलाश में घूमता हर खबरिया एक चैनल मालिक है, हर स्ट्रिंगर प्रधान सम्पादक है और हर पत्रकार अपने आप में एक मीडिया संस्थान ।
बावजूद इसके जब लोगों के बीच जाएंगे तो पता चलता है की उनके नज़र में इन सबकी विश्वशनियता कम ही है। उन्हें आज भी बड़े ब्रांड्स ही दीखते हैं और आज भी वो चाहते हैं की उनके क्षेत्र की या उनसे जुड़ी ख़बरों को कोई अच्छे से दिखाये… उसका असर हो ।

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