“मर्द बनना छोड़ पहले इन्सान बनना सीख ले।”

Posted by Pragya Bharti
April 15, 2018

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हमारे देश में हर मुद्दे पर राजनीति होती है। चाहे वह आरक्षण का मुद्दा हो या आज़ादी का, रोटी की बात हो या पानी की। हमने सभी को समान माना है और हर मुद्दे को राजनीति की आँच पर बराबर सेंका है। बात चाहे जो भी हो उसको राजनैतिक जामा पहनाना हमें अच्छी तरह से आता है। हमारे देश में राजनीति सबसे अहम है। अब हाल में हुए बलात्कार के मामलों को ही देख लीजिए। कोई हिन्दू होने की गवाही देकर अपराधियों को बचाने की फ़िराक में है तो कोई इसलिए आवाज़ उठा रहा है कि समुदाय विशेष को सहानुभूति दिखा अपने आप को धर्म निरपेक्ष साबित कर सकें। ऐसा सबके साथ हो ज़रूरी नहीं, तो कृपया मेरे कथन को अन्यथा न लें। परन्तु बहुत से लोग केवल अपने निजी स्वार्थ के लिए आवाज़ उठाने का ढ़ोंग कर रहे हैं। खैर, उन से तो बेहतर ही हैं जो तटस्थ बने हुए हैं, चुप हैं।

हिन्दू समुदाय से या किसी भी और समुदाय से ताल्लुक रखना क्या आपको यह आज़ादी देता है कि आप आपके समुदाय के लोगों द्वारा किए किसी ग़लत काम को भी सही साबित करने के लिए लड़ें? सिर्फ इसलिए कि आप किसी समुदाय विशेष से ताल्लुक रखते हैं आपकी गलत हरकत नज़रअंदाज़ की जानी चाहिए? यह तो वही बात हो गई कि आप आतंकवाद को न्यायसंगत ठहरा दें। जिस तरह किसी आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता उस ही तरह किसी बलात्कारी का कोई धर्म नहीं होता। आप हिन्दू होने की बात करते हैं, क्या हिन्दू धर्म यही सिखाता है? यह उसी समाज के लोग हैं जो किसी पौराणिक किरदार के सम्मान की खातिर महीनों तक लड़े थे। आज कहाँ हैं आप लोग? कहाँ हैं आपके संस्कार? आपको बहुत नाज़ है अपनी संस्कृति पर, अपने संस्कारों पर, एक आठ साल की मासूम लड़की के बलात्कार और हत्या करने की घटना ने आपके संस्कारों का काला चिठ्ठा खोल दिया है। बंद करिए संस्कारों और धर्म की दुहाई देना। धर्म के नाम पर लोगों को डराना और अपनी झूठी प्रतिष्ठा के नाम पर हर काम को सही ठहराना। आप गलत हैं। चाहे सबूत हों या नहीं। चाहे आपको सज़ा मिले या नहीं। किसी भी बलात्कार को आप सही कैसे कह सकते हैं? कैसे किसी बलात्कारी को बचाने की कवायद कर सकते हैं? एक बैंक अधिकारी का बयान सामने आया है, जो कह रहे हैं कि – “अच्छा हुआ मर गई, नहीं तो बड़ी होकर भारत के खिलाफ़ सुसाइड बम बनकर सामने आती।” सर, वो लड़की बड़े होकर क्या बनती, यह तो नहीं पता पर अगर वह आतंकवादी भी बनती तो भी उसके बलात्कार का हक आपको नहीं है। आप उसे उसके किए की सज़ा दे सकते हैं पर उसका बलात्कार नहीं कर सकते। और फिर अभी उन लोगों के किए की क्या सफाई देंगे आप? अभी तो वह बच्ची थी, मासूम बच्ची, जिसे बलात्कार का मतलब भी नहीं पता होगा। किस बात की सज़ा उसे मिली? मुसलमान होने की? तब तो हिन्दू लड़कियों के बलात्कार की घटना होनी ही नहीं चाहिए। पर नहीं, यहाँ हर वर्ग, हर आयु की लड़की खतरे में है। एन. सी. आर. बी. के हाल में जारी आँकड़ों के मुताबिक साल 2016 मे महिलाओं के खिलाफ़ 3,38,954 केस दर्ज़ हुए हैं। यहाँ बात किसी धर्म या समुदाय की नहीं है बात है लैंगिक असमानता की, बात है खुद को शक्तिशाली दिखाने की। ये कैसा शक्ति प्रदर्शन है जो किसी महिला के साथ ज़बरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बना कर किया जा रहा है? ये कैसे संस्कार हैं जो इस नृशंस घटना के अपराधियों के समर्थन को मजबूर कर रहे हैं? और ये कैसे राजनेता जो बलात्कार की घटना को भी राजनैतिक खेल बनाने की कोशिश में हैं? कैसे इतनी देर तक आप चुप रह गए प्रधानमंत्री जी? आप तो विकास की बात करते हैं, कैसे विकास की ओर देश अग्रसर है कि एक राजनेता किसी लड़की के बलात्कार का आरोपी है और उस पर मुकदमा चलने की बजाए लड़की के पिता के पिता गिरफ्तार होते हैं और पुलिस कस्टडी में मारे जाते हैं? खैर जहाँ पुलिस इतनी निर्दयी हो कि खुद अपराध में शामिल हो वहाँ ये कौन – सी बड़ी बात है? कठुआ में हुए बलात्कार की घटना से कुछ तथ्य सामने आए हैं, जिसमें पुलिस अधिकारी कहता है कि अभी लड़की को मत मारो मुझे उसका रेप करना है, यह भी पता चला कि इस अपराध को छिपाने के लिए रूपए खाए गए, वहाँ कानून व्यवस्था की क्या हालत है आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। महिलाओं के खिलाफ़ बढ़ते अपराधों की संख्या ने समाज के मुँह पर एक बार फ़िर तमाचा जड़ा है। झूठे अहम, संस्कारों और संस्कृति की चमक से बाहर निकल कर देखिए तस्वीर काली है। और, और स्याह होती जा रही है। अपनी पीढ़ी को बचा लीजिए वरना या तो इस समाज में केवल लड़के बचेंगे या फ़िर लड़कियाँ केवल शारीरिक ज़रूरत पूरी करने का साधन हो कर रह जाएंगी। पार्च्ड फिल्म में बोले गए इस संवाद से आज सबको सीख लेने की आवश्यकता है –
“मर्द बनना छोड़ पहले इन्सान बनना सीख ले।”

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