मैं क्यूँ लिखता हूँ….#WhyIWrite

Posted by Santosh Kumar Mamgain
April 14, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

मैं क्यूँ लिखता हूँ? सवाल मेरा अपने आप से और मुर्खता ये कि अपने आप से बात करने के लिए भी मंच ढूंढ रहा हूँ, मानो अपने लिए नहीं किसी और के लिए लिख रहा हूँ. और शायद  सच भी है. कोई अपने लिए कैसे लिख सकता है. क्या ये संभव है कि कविता भीतर ही जन्म ले और भीतर ही मर जाए? कहानी दिमाग में बुनती रहे, और बिना एक शब्द बाहर आये कान, मुंह, ह्रदय, आत्मा, सबकी तृप्ति हो जाए? मैं क्यूँ लिखूं जब मैं जानता हूँ कि मेरा लिखना केवल मेरे अहं की तृप्ति है, शब्दों का खेल है, मात्राओ का मेल है, दिल की भड़ास है, कोई दबी हुई आवाज़ है, पर जो भी है, भाव मेरे है पर ये शब्द बड़े बेवफा है, ये किसी एक के नहीं. एक ही शब्द एक ही पंक्ति, एक ही विषय पर जाने कितनो ने लिखा है, और कई लोग शायद जीवन भर इसी भ्रम में रहकर लिखते रहते है कि वो कुछ नया लिख रहे है. मैं क्यूँ लिखता हूँ, कि  ताकि दूसरे पढ़ सके? अगर दूसरे पढ़ न सके, उसपर किसी मैगज़ीन या किताब की जिल्द न लगे तो क्या वो रचना सार्थक है? मैं क्यूँ लिखूं, बस ये बताने के लिए दुनिया को कि मेरे अन्दर भी एक कहानी है, और मुझे वो कहानी कहनी आती है.  क्या हो अगर वो कविताओ, कहानियों का ढेर बस यूँ ही पड़ा रहे? क्या हो अगर कोई न जाने कि हम कोई है? बहुत से लेखक हुए है जिनके जीते जी उनको किसी ने न समझा, किसी ने न पढ़ा, और मरने के बाद लोगों को पता चला- अच्छा ये लिखता भी था? कितने पन्ने छाप चुके है, ये किस बात का गवाह है कि आप कितने बड़े फनकार है. आपकी कला अपने में कुछ नहीं, अगर कोई पढने वाला न हो, कोई आपको साहित्य श्री की ख्याति से नवाज़ न सके तो आपका साहित्य निरर्थक है. अगर आपको महफ़िलो में न बुलाया जाए, तो आपकी कोई पहचान नहीं, अगर आपके नाम के साथ कोई उपमा न जुडी हो तो आपकी कोई पहचान नहीं.

मैं क्यूँ लिखता हूँ, क्यूंकि जब मंच में किसी और को देखता हूँ तो अपनी कल्पना करता है, क्यूंकि मुझे दूसरो की ज़रूरत है ताकि खुद की नज़र में नीचे न गिर जून, ताकि अपनी दिल की आग को ठंडा कर सकूँ. क्यूँ लिखूं मैं अगर लिखना केवल निमित्त मात्र है, असली काम तो पढ़ाना है,मैं लिखता हूँ ताकि लोग पढ़ सके, वरना तो मैं कविता बनाता और किसी को मालूम भी नहीं चलता. लेकिन मैं चाहता हूँ सबको मालूम चले. मैं अपनी कला का ढोल पीटता हूँ ताकि लोगों के दिमग्ग में भर सकूँ ये बात कि मैं भी लेखक हूँ. मैं लिखता हूँ और कोई नहीं पढता क्यूंकि मैं किसी को नहीं पढाता, लेकिन फिर बेचैनी होती है. मैं फेसबुक पर डालता हूँ, उल-जलूल वेबसाइटों को अपनी अहं की कलम से भर देता हूँ, लाइक मिलते है तृप्ति मिलती है, लगता है कला सार्थक हो गयी. फिर कोई मैगज़ीन कोई किताब देखता हूँ, किसी आयोजन या कोई ख़िताब देखता हूँ. मेरा अहं है मैं सबको सफल देखना चाहता तो हूँ, लेकिन अपने से ऊपर नहीं. फिर बेचैनी होती है कि मैं यहाँ क्यूँ नहीं हूँ. फिर कोशिश करता हूँ, हाथ पैर मारता हूँ, अक्सर असफल होता है और अन्दर ही अन्दर घुटता हूँ, और ये सब सिर्फ इसलिए कि केवल मेरा होना काफी नहीं, केवल मेरा लिखना काफी है, ज़रूरी है हर कदम पर मेरी अहं की तृप्ति होना. अब शायद कोशिश होगी कि किताब छाप जाए, वो भी किसी बड़े प्रकाशक द्वारा, सेल्फ पब्लिशिंग काफी नहीं. बड़े प्रकाशक का लेबल ज़रूरी है, लेखक की ख्याति ज़रूरी है, पुरस्कार ज़रूरी है, सत्कार ज़रूरी है, ज़रूरी है किताब का छपना भी, बिकना भी, वरना मैं अच्छा लेखक रहूँगा सफल नहीं बनूँगा. वरना लोग वाह वाह करेंगे लेकिन आपको गंभीरता से नहीं लेगे. आप किसी कोने में अपनी कविता लिखते रह जायेंगे, और बाकि लोग ख्याति पाकर आपसे बड़े हो जायेंगे. वहां आपकी कला किसी काम नहीं आएगी, वहां लेबल ज़रूरी है. अच्छे हो, भाड़ में जाओ, लेबल है आओ जी आओ.

मैं लिखता क्यूँ हूँ.. शायद इसलिए कि बचपन से हमको हिंदी और अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तको में दबा के साहित्य पढ़ाया जाता है. हमारा बचपन रजा रानियों की कहानियों से आरम्भ होकर धीर गंभीर साहित्य पर अंत होता है, और जाने अनजाने हम मानने लगते है कि इन शब्दों के पीछे के कारीगर कोई विशिष्ट लोग होते है, दुनिया से अलग और सबसे अनोखे. हम कोशिश करते है उनके जैसा बनने की. हमारी पहली कविता, पहली कहानी इन्ही लेखको या कवियों की नक़ल से उत्पन्न होती है और जा मिलती है, समय के साथ भावनाओ और अभिव्यक्ति के संगम में. मैं क्यूँ लिखता हूँ, शायद इसलिए ताकि समाज से परे अपनी एक पहचान बना सकू, शायद इसलिए ताकि अपने वजूद में कोई अर्थ तलाश सकूं.

लेकिन फिर मैं आसपास देखता हूँ और पाता हूँ कि हर कोई यहाँ कवि है, हर कोई लिखता है, और तब मेरे अन्दर अफ़सोस भी जन्म लेता है और प्रतिस्पर्धा भी. अफ़सोस इस बात का कि मैं तो समझता रहा था कि कवि गिने चुने लोग होते है, सबके बस की बात नहीं. यहाँ तो महफ़िले भरी पड़ी है लोगों से जो खुद को शायर कहते है और उनसे भी ज्यादा ऊँ लोगों की जो खुद को उस जगह पर देखना चाहते है. कला तो है पावर रिलेशन और अधिक है, मायने ये नहीं रखता कि कौन क्या लिखता है, मायने ये रखता है कि कौन मंच तक की दौड़ लगा सकता है, कौन पहले उस कुर्सी को पकड़ सकता है जिसके लिए सौ लोग आपस में लड़ रहे है. अफ़सोस होता है उसको कि मैं लिखता क्यूँ हूँ, और अगर लिखता हूँ तो कोई मुझे सुनता क्यूँ नहीं है? और अगर मुझे कोई नहीं सुनता, कोई नहीं पढता तो क्या हक है मुझे ये कहने का कि हाँ मैं लिखता हूँ?

अब मैं करता हूँ प्रतिस्पर्धा, पहले ख्याल आने पर कविता निकलती थी, अब कविता लिखने के लिए ख्याल पैदा करता हूँ, पहले लिखता था और खुश  होता था, अब लिखता हूँ और सोचता हूँ क्या लफ्ज़ का इस्तेमाल करूँ कि ज्यादा लाइक मिले? क्या कोई विवादस्पद विषय उठाऊँ  जिससे लोगों की नज़र मुझपर पड़े. क्या कवि होना काफी है, या क्रन्तिकारी भी होना पड़ेगा? क्या बौद्धिकता का स्वांग रचने से  मेरी रचना को गंभीरता से देखा जाए. क्या, अगर मैं सिर्फ कवि हूँ, राजनीति का मुझे कोई ज्ञान नहीं, समाज से मुझे सरोकार नहीं तो क्या मैं कवि हूँ, या महज़ तुकबंदी करने वाला नौसिखिया? एक तरफ तो कला का विचारधारा से जुड़ना है दूसरी तरफ कला के मंच का विचारधाराओ का अड्डा बन जाना, दोनों ही अवसर पर मैं लाचार खड़ा दिखता हूँ. न विचारधारा न जुड़ सकता हूँ, न मिथ्या सामाजिक विवेचना कर सकता हूँ. मैं तो वो हूँ जो इंतज़ार करता हूँ कि मंच के बाहर जाने पर कोई मेरी पीठ थपथपाए, पर होता कुछ यूँ है कि जब तक पहली ताली आपके कानो में पड़ती है तब तक आखिरी ताली बज चुकी होती है. मंच से बाहर उतरते ही भुला दिया जाता है- कवि भी, कविता भी.

तो क्या अमर होना चाहिए- कवि या कविता? हो सकता है कविता अमर हो जाए, लेकिन कवि अनजान रहे. मुझे लगता था जिनकी रचनाये छपती है उनका जीवन अलग होता होगा, बातें अलग होती होंगी, भाषा अलग होती होगी. लगता था और अब भी लगता है कि अपनी रचना को छपते हुए देखना विस्मयकारी अनुभव होता होगा. पार साथ ही हमें ये भी लगने लगा है कि लिखने वाला छपने वाला, बिकने वाला हमारी गली, नुक्कड़ से निकलता है, इतना करीब होता है हमारे कि जब वो एक दिन कवि या लेखक बनकर सामने आता है तो एक पल को विश्वास नहीं होता. दूसरो को कम आंकने की बहुत बुरी आदत होती है हमारी, और हो भी क्यूँ न, भला हमारा खोखला अभिमान कैसे बना रहेगा. पूरा चमत्कार बनने की प्रक्रिया में है, बनने के बाद सब सामान्य हो जाता है. और हम इसीलिए खुद को अभागा महसूस करते है क्यूंकि हमारा उस प्रक्रिया से गुज़रना बाकि है. पाकर चाहे कुछ न मिले, पाने की ख़ुशी तो मिले, उस प्रक्रिया का अनुभव तो मिले. चेतन भगत को शायद इसीलिए कोसते है क्यूंकि मन में ये सवाल कौंधता है कि “इन मे ऐसा क्या है जो हम में नहीं?” और तब ये सवाल भी उठता है- “नाम बड़ा है कि काम बड़ा है?”, “कवि बड़ा या कविता बड़ी?” तो मैं किसकी महानता चाहता हूँ? अपनी या अपनी कविता की? किसकी प्रशंसा होनी चाहिए- मेरी या मेरी कविता की? क्या बेहतर होगा- मैं मर जाऊं और कविता अमर हो जाए या मैं जीते जी अपनी और अपनी कला का अस्तित्व खोजता रहूँ?कविता की जीत कला की जीत है, कवि की जीत उसके अहं की भी जीत है. क्या कला बड़ी है या कवि का अहं बड़ा है? क्या मैं कला की जीत के लिए लिखता हूँ या अपनी जीत के लिए.

पर शायद ये सवाल बेईमानी है. कला और व्यक्ति विरोधाभास में रहे ये कतई आवश्यक नहीं है. हम बहुत कुछ सोचते है एक ही वक़्त में और ज़रूरी नहीं कि हम एक वक़्त पर एक ही चीज़ चाहते हो. हमें जीवन भी चाहिए, प्रतिष्ठा भी चाहिए, धन भी चाहिए, अहं भी चाहिए. और सब कुछ साथ चाहिए. पर किस्मत अगर इतनी मेहरबान हो तो क्या कहने… और तभी जन्म लेती है कुंठा, हताशा और नाराजगी. प्यासा का नायक हम सब में बसता है. दुनिया में रहता है और दुनिया से दुखी है, दुनिया से शिकायत है कि उसने कभी उसको सुना नहीं. और शिकायत भी किससे- उसी दुनिया से. कविता लिखता है, पर छपती नहीं. कुंठा जन्म लेती है, और उस कुंठा से जन्म लेती है एक नयी कविता. उसकी कविता के कद्रदान बहुत है- तेल वाला, एक गणिका, एक संभ्रांत पूर्व प्रेमिका, और बहुत से अनजान चेहरे मगर कोई उसकी कला का खरीददार नहीं है. और क्यूंकि कला ख़रीदे जाने पर ही कला समझी जाती है, इसलिए कवि अहमक समझा जाता है, और वो भी दुनिया को अहमक समझता है. इसी पागलपन ने हम सब को जिंदा रखा हुआ है. हम अपनी असफलता का दोषारोपण उस समाज पर कर सकते है जो कला की कद्र नहीं जानता और इस तरह हम खुद को अपनी कला का हौसला बंधा सकते है. मैं लिखता हूँ, और हताश होता हूँ, और उस हताशा को मिटने के लिए और लिखता हूँ. जब अपनी कला पर विश्वास न हो तो अपने आप से निराशा होती है, और जब अपनी कला पर विश्वास हो जाए तो सारी  दुनिया से निराशा होती है.

मैं अब भी लिख रहा हूँ, क्यूंकि ये मंच मेरा है, यहाँ मेरी सत्ता है, पर एक समय बाद आपको बस सीमाएं दिखती है और मन करता है कि इन सीमओं से पार जाया जाए. मैं हर सेकंड देख सकता हूँ कि कितने लोगों ने मेरा लेख पड़ा ताकि मेरी आशा या निराशा को आंकड़ों का सहारा मिल सके. उस दिन का इंतज़ार है जब लिखने की व्यर्थता का गुमान हो जाए. बहुत लोग है लिखने को, मैं क्यूँ लिखूं? जब काम की तरह कला का इस्तेमाल होता है तो भाव अलग होता है, क्यूंकि तब आप नितांत दूसरो के लिए लिख रहे हो. जब कला काम नहीं तो कला एक जरिया है बात पहुँचाने का. तब कला और अहं के बीच वास्तविक द्वन्द होता है. क्या मैं काम करने के लिए लिखता हूँ या काम पाने के लिए लिखता हूँ? क्या मैं अपनी कला दिखाने के लिए लिखता हूँ या अपनी कला की सार्थकता आजमाने के लिए लिखता हूँ?

मैं आखिर क्यूँ लिखता हूँ? लिखने की आदत है सो लिखता हूँ या किसी दिन वक़्त बदलने की आशा है इसलिए लिखता हूँ? शायद मेरे पास अनगिनत सवाल है और एक भी जवाब नहीं इसलिए लिखता हूँ… और जिस दिन जवाब मिल जायगा, उस दिन क्या लिख पाऊंगा? पता नहीं. क्या लिखता हूँ पता नहीं, क्यूँ लिखता हूँ पता नहीं. बस हाथ चलते जाते है और शब्द बुनते जाते है.

 

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.