मैं भारत🇮🇳 हूँ

Posted by Dileep Kumar Yadav
April 17, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

   “मैंने बुद्ध, महावीर, आजीवक, नानक, कबीर, रैदास जैसे अनेक अहिंसावादियों को देश में अमन व चैन का प्रसार करते हुए देखा है। मैंने सम्राटों के सम्राट अशोक को भी तलवार छोड़ते हुए देखा है। मैंने विदेशी कनिष्क व मिनांडर को भी अहिंसा के सम्मुख झुकते देखा है। मैंने पटाचारा, विशाखा, आम्रपाली, गौतमी आदि को स्वतंत्र विचरण करते हुए आकाश को छूते हुए देखा है। मैंने सल्तनत काल से मुगल काल तक का भारत भी देखा है। मैंने अंग्रेजी हुकूमत का खौफ़ और शोषण भी देखा है। विगत 60-70 सालों में कांग्रेस और अन्य पार्टियों का इतिहास भी देखा है।

मैंने मगध से भारत के निर्माण तक को, भारत से अन्य राष्ट्रों के विघटन को भी देखा है। मेरी छवि कभी भी शोषक या उत्पीड़क की नहीं रही। मेरे रथ को खींचने वाले हजारों सारथियों ने अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार मेरा सृजन किया है। कुछ ने लूटा भी है तो कलंकित नहीं किया। लेकिन आज मैं ऐसे दौर में आ पहुंचा हूँ जहाँ मैं खुद को खोता हुआ महसूस कर रहा हूँ। मैं अपने आपको डरा हुआ महसूस कर रहा हूँ। आज मैं भारत होकर भी भारत ना होना महसूस कर रहा हूँ ।
               मैंने तो हमेशा से सबको अपनाया है। जिस प्रकार एक माँ-बाप के लिए उसकी हर सन्तान एक जैसी होती है वो उनमें भेदभाव नहीं करते उसी प्रकार मैनें कभी अपने बच्चों में भेदभाव नहीं किया, ना मेरे बच्चों ने। लेकिन ना जाने आज ऐसा क्या हो गया है? ना जाने क्यों मेरे बच्चे आपस में लड़ रहें है ,अपनों की ही जान के दुश्मन बने हुए है , अपनों का ही खून बहाने में लगे हुए हैं। मैंने पूछा क्यों तो किसी का कहना है कि ये सगे नहीं है ये पराये हैं। मैंने कहा पैदा करने वालों से बड़ा तो पालने बाला होता है मैंने उन्हें पाला है उन्होंने भी मेरी सेवा वैसे ही की ही जैसी तुमने फिर वो पराये कैसे हुए? कुछ ये कह रहे हैं कि वो हमसे बुद्धिमान नहीं है, वो हमारे जैसे नहीं है ,वो बचपन से हमसे पीछे रहे हैं फिर आज आप क्यों उन्हें हमारे साथ हर जगह ले जा रहे हो ? मैंने कहा जो बचपन में कमजोर हों जरूरी नहीं वो बड़े होकर भी कमजोर रहें, उन्हें भी हक है आगे बढ़ने का ,अगर उनकी थोड़ी मदद से वो तुम्हारे बराबर हो जाये तो उसमें क्या दिक्कत है? फिर तो शायद तुम्हें भी उन्हें साथ ले जाने में दिक्कत नहीं होगी।लेकिन इसका कुछ फायदा नहीं हो रहा।

मेरे एक बेटे इक़बाल ने कहा था –

 

“यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से।
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।। सारे…

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।।  सारे…”

अब मुझे ये हस्ती मिटती नजर आ रही है। मेरी इज्ज़त को बार बार मेरे अपनों के द्वारा ही लूटा जा रहा है। मैं अब सह नहीं पा रहा हूँ।

मुझे शारिपुत्र जैसा कोई दिख नहीं रहा जो अपने सिंहनाद से इन दुष्टों का विनाश कर सके। मुझे एकलव्य के बाणों की जरूरत है जो उन कुत्तों का मुँह बन्द कर सके जो देश को विभिन्न सम्प्रदायों और वर्गों में बांटकर अपना उल्लू सीधा करना चाह रहे है। मुझे ज्योतिबा की ज्योति अब दिखाई नहीं दे रही जो एक नई आज़ादी को मुक़म्मल करें। मुझे अम्बेडकर जैसा विद्वान दिखाई नहीं दे रहा जो असत्य में दिग्भ्रमित मेरी सन्तानों को न्याय और समता का रास्ता दिखलाए। मुझे पेरियार, शाहू व मण्डल जैसे व्यक्तित्व नहीं दृष्टिगत हो रहे जो अधिकारों के लिए अड़िग हो जाएं। मुझे बिरसा के उलगुलान का स्वर सुनाई नहीं पड़ रहा, मुझे झलकारी बाई कोरी का झांसी का युद्ध याद नहीं आ रहा। मुझे कांशीराम के साइकिल की घण्टी सुनना बन्द हो गई है। मुझे सावित्री और फ़ातिमा के स्कूलों के दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। ये सहा नहीं जा रहा है, इसलिए आपसे ये बात साझा कर रहा हूँ- नमस्कार

                 “मैं भारत हूँ…..मैं सोच रहा हूँ”

“सोच रहा हूँ कि,
मेरे गुलशन की क्यारियों को कौन तहस-नहस कर रहा है?

सोच रहा हूँ कि,
मेरे बच्चों में कौन धर्म और जाति का ज़हर घोल रहा है?

सोच रहा हूँ कि,
कौन है जो फूट डालो राज करो की नीति को फैला रहा है?

सोच रहा हूँ कि,
कौन है जो बलात्कारी आतंकियों को बचा रहा है?”

     

        “मैं भारत हूँ…..मैं डर रहा हूँ “

“आज को देखकर मेरा समझाना व्यर्थ नजर आ रहा है,इसलिए मैं डर रहा हूँ ।

मेरे बच्चे मेरी आंखों के सामने एक -दूसरे का खून हा रहें हैं,इसलिए मैं डर रहा हूँ

मेरे विविधता युक्त श्रृंगार को एकरसता के श्रृंगार में  बदला जा रहा है, इसलिए मैं डर रहा हूँ।

 मेरे प्रहरी आज बिना जंग के ही मर रहे हैं,इसलिए मैं डर रहा हूँ।

मेरे बगीचे के माली(किसान) आत्मदाह कर रहे हैं,
इसलिए मैं डर रहा हूँ।

मेरी आँखों का चश्मा(मीडिया)आज बिक रहा है,
इसलिए मैं डर रहा हूँ।

 सत्य को कुचला जा रहा है , इसलिए मैं डर रहा हूँ।

समता व स्वतंत्रता को नालियों में डुबोया जा रहा है, इसलिए मैं डर रहा हूँ।

न्याय को पैसों व जाति  से तोला जा रहा है,इसलिए मैं डर रहा हूँ।

न्यायालय अब खाप जैसे निर्णय देने लगे हैं, इसलिए मैं डर रहा हूँ।

जनता खून के आंसुू बहा रही है और सरकार मूकदर्शक बन हुई है, इसलिए मैं डर रहा हूँ।

मुझे करुण चीत्कार, आर्तनाद और क्रंदन सुनाई पड़ रहा है, इसलिए मैं डर रहा हूँ।

देवालयों में तरुणियों की तार-तार होती अस्मिता दिखाई दे रही है, इसलिए मैं डर रहा हूँ।

मेरे बच्चे मेरे प्रतीक तिरंगे को बलात्कारी को बचाने के लिये लहरा रहे हैं, इसलिए मैं डर रहा हूँ।

इसलिए आज मैं जीते जी मर रहा हूँ,

 

         “मैं भारत हूँ …..मुझे भारत होना है”

मुझे पुनः विश्व गुरु के पद पर आसीन होना है, मुझे पुनः अहिंसा, सत्य का द्योतक बनना है, मुझे पुनः बलात्कार मुक्त भारत बनना है, मुझे पुनः विविधता युक्त भारत बनना है, मुझे पुनः समता, स्वतंत्रता व बन्धुत्व के गीत गाने हैं, मुझे इन साम्प्रदायिक व जाति की ज़हरीली जंजीरों से आजाद होना है, मुझे भारत होना है।” 

                     “मैं भारत हूँ…..”

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.