मैं लिखना चाहती हू,क्यूंकि मैं एक औरत हू ..समाज की धुरी

Posted by आवाज़
April 12, 2018

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हां ये सच है …गलत नही कहा मैंने, हु मैं समाज की धुरी,मैं ही नही दुनिया की हर औरत ..जो सुबह उठकर अपने बच्चे के टिफिन से  लेकर …रात में अपने पति के बिस्तर तक सब सम्भालती है ….उसके बाद उम्मीद क्या करती है? सिर्फ और सिर्फ ये कि,जो भी उससे जुड़े लोग है वो उसके आत्मसम्मान की रक्षा करे लकिन सच में जब समाज का विश्लेषण करती हु तो पाती हु …की दुनिया का सबसे मुर्ख जीव का तमगा किसी को मिलना चाहिए तो इस औरत नाम की प्रजाति का नाम लिस्ट में सब से ऊपर होगा |

पैदा होने से लेकर मरने तक समाजिक धारणाओं के नाम पर, पारिवारिक गुण दोषों के आधार पर मजे की बात रिश्तो के आधार पर उसको जो महान बनने की सीख दी जाती है,वो वोही तो जीती है सिर्फ …..मैंने अपने निजी जीवन में ऐसे बहुत से उदाहरण अपने ही आस पास देखे ..अपने ही रिश्तो में ….कभी दादी ,कभी भाभी,कभी नन्द और कभी मम्मी के नाम पर …जो सिर्फ और सिर्फ महान बनने  के चक्कर में भेट चढ़ गई ,और उसके बदले में अगर शै मायनों में देखा जाए तो जिन so called रिश्तो और समाज की भेट वो चढ़ी अन्तोगत्वा उनके लिए वो कभी काम वाली बाई और कभी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन कर रह गई ….पता है मुझे बहुत कडवा लिखती हु …और पुरुष प्रधान मानसिकता वाले किसी भी व्यक्ति को ये बाते हजम नही होंगी ….तो ऐसे लोगो के लिए एक फ्री की सलाह भी है की pls मेरे लिखे को न पढ़े और अगर पढ़े भी तो कोई अच्छी दवा खा कर ….

मैं सच कहू तो इतनी मुकर नही थी मैं…किसी समय इस महान भीड़ का हिस्सा मात्र थी …बाद में समझ आया की ये बेवकूफी अगर में भी करुँगी तब तो हो गया ….इस पुरे मामले में एक महत्वपूर्ण बात और महसूस की मैंने की महान बनने का ज्ञान देने में भी आदमियों से ज्यादा महत्पूर्ण भूमिका यही पिसती हुई औरते निभाती है ….कभी माँ,कभी दादी,कभी बहन,कभी ननद और last but not least भाभी …इसके पीछे का मनोभाव आज तक समझ नही पाई मैं…एक रटे हुए तोते की तरह इन लोगो की डैलोग डिलीवरी  की “तुम क्या झेल रही हो हमने बहुत झेला है”या फिर “सभी आदमी ऐसे होते है”और आज का लेटेस्ट वाला “आदमी है कोई बर्तन नहीं जिसे बदल दोगी”…इस तरह के लग भग  1000 भासन तो मुझे याद हो गए होंगे …..

जिस समय एक औरत को ,एक बेटी को, एक बहु को अपने लिए सहारे की जरूरत होती है समाज का इस तरह के लोगो का एक पूरा धडा उसको दुनिया भर की बाते समझा कर उसी रास्ते पर छोड़ देता है जहा पर अभी तक वो स्वयं खड़ा होता है ….मान गई तो ठीक नही मानी तो फिर बहुत रास्ते है …..वो कहते है न साम,दाम,दंड ,भेद सब आजमाए जाते है ….और अन्तोगत्वा 99% महिलाए वापस अपने खोल में घुस जाती है …..मुझे एक वैज्ञानिक कारण समझ आया की सामने वाले को ये लगता है की अगर, हमने झेल लिया तो ये क्यों नही? 

मानती हु समाजिक व्यवस्थाओ को चुनौती देना आसन काम नही है… लेकिन सर्वथा असंभव है ये कम से कम मैं तो नहीं मानती ….मेरा मानना है कि मानसिक रूप से पुरुषो की अपेक्षा औरत मजबूत होती है ….अगर ऐसा न होता तो ईश्वर हम औरतो को सृजन करने की छमता न देता …सृष्टी हो या समाज इसकी वृद्धि में सब से ज्यादा योगदान हमारा है ….हम शक्ति है वो शक्ति जिसके बिना शिव भी शव है …जो सृष्टी रचने की छमता रखती है वो हम है ….फिर क्यों हम इस मकडजाल में उलझे ..अपने आत्मसमान अपने जीवन के फैसले हम क्यों दुसरो की सुविधा या व्यवस्थाओ के हिसाब से ले ….

जिन बच्चो को हम पैदा करते है, वो बच्चे जिनकी जिमेदारी एक माँ हमेशा इमानदारी से निभाती है…क्या वो बच्चे एक औरत होने के नाते अपनी माँ का दर्द समझते है …आगे जब लिखूंगी तब इस बारे में ही लिखूंगी …..

अभी तो में उन औरतो को जवाब देंन चाहूंगी जो भासन देती है खामखा वाले …अरे भाई आपने झेला क्यूंकि आपमें काबलियत नही थी परिस्थियों के सामने खड़ा होने की ….. होते होंगे सभी आदमी ऐसे वाले अगर 5% औरते भी हो गई तो क्या?…और हां आदमी है बर्तन नही पर बस इतना ही कहूँगी …की हम या ये कह लो मैं भी एक इंसान हु आप के दरवाजे पर बंधा जानवर नही जिसको जब जिसकी मर्जी आएगी लात मार कर चला जाएगा …..उसके स्वाभिमान, उसके दर्प, उसके आत्मसमान को चोट पहुचाएगा….

आज के लिए इतना काफी है न ….

 

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