शिक्षा में सुधार के बगैर स्थायी नहीं होगा सुशासन

Posted by Anish Bhanu
April 16, 2018

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बिहार एक ऐसा प्रदेश है जहाँ के सर्वाधिक 92%बच्चे सरकारी स्कूल में पढाई करते हैं। सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढाई करने वाले बच्चों का यह प्रतिशत देश के किसी भी दुसरे राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है। पिछले कुछ सालों में, खासकर शिक्षा के अधिकार कानून के लागू होने के बाद प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाने पर काफी जोर दिया गया है। एक ऐसे राज्य में जहाँ के अधिकांश परिवार अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी विद्यालयों पर निर्भर हैं, वहां प्राथमिक शिक्षा की सेहत पर ध्यान देना और सुधार के लिये निरंतर प्रयासरत रहना सरकार के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक हो जाता है।

पिछले कुछ सालों में बिहार सरकार ने प्राथमिक स्कूलों की स्थिति में सुधार के कुछ सकारात्मक प्रयास किये हैं। बिहार राज्य शिक्षा परियोजना के जरिये सूबे में स्कूली शिक्षा को लेकर किये गये प्रयोगों की तारीफ़ की जानी चाहिए। “मेरे सपनों का विद्यालय” एक ऐसी ही पहल है, जिसमें सरकारी स्कूलों को मॉडल स्कूल के रूप में विकसित किया जा रहा है। “मीना मंच” का मकसद बीच में पढाई छोड़ चुके बच्चों को फिर से स्कूली शिक्षा से जोड़ना है। इस कार्यक्रम की खूबसूरती यह है की बीच में पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों को पुनः स्कूल तक लाने में उसके हमउम्र के सहपाठी उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। ऐसे ही जीविका के अंतर्गत चलाये जा रहे महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को प्राथमिक स्कूलों की निगरानी की जिम्मेदारी दी गयी थी। हालांकि यह कुछ खामियों की वजह से सफल नहीं हो सका। बिहार में लंबे वक्त से शिक्षकों की शिकायत रही है कि सरकार उनसे पढ़ाने के बजाय दूसरे प्रसाशनिक कामों में इस्तेमाल करती है, जिससे उनके स्कूल में पढ़ाने का काम बाधित होता है। सरकारी प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति शिक्षा सुधार की दिशा में एक बड़ी चुनौती रही है। इसपर लगाम लगाने के अबतक कोई भी उपाय कारगर साबित नहीं हुए हैं। स्कूल में शिक्षकों की संख्या से ज्यादा जरुरी उन शिक्षकों का नियमित होना है।

निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम (2009), राज्य में अप्रैल 2010 से लागू है। और इससे पहले से सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्राथमिक स्कूल की शिक्षा में सुधार को लेकर कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। इसके बाबजूद आज बिहार में 6-14 आयु वर्ग के करीब 3 लाख बच्चे स्कूली शिक्षा से बाहर हैं। जो बच्चे स्कूलों में पढ़ भी रहे हैं उनमें कक्षा के अनुसार अपेक्षित जानकारी का अभाव है। कक्षा तीन में पढ़नेवाले महज 39% बच्चे भाषा की परीक्षा में 50% अंक हासिल कर पाते हैं। कक्षा पांच में पढाई कर रहे 7% बच्चे ही भाषा की परीक्षा में 50% से अधिक अंक पाते हैं, जबकि गणित में 50% या उससे अधिक अंक पाने वाले बच्चों को संख्या 27% है। इसी प्रकार कक्षा आठ में गणित और विज्ञान में 50% से अधिक अंक पाने वाले छात्रों का प्रतिशत क्रमशः 24% और 14% है। विडम्बना ही है की राज्य के 37% प्राइमरी स्कूल ऐसे हैं, जहाँ सभी विषयों के शिक्षक तक नहीं हैं। प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों के स्वीकृत 592541 पदों के मुकाबले 388607 शिक्षक ही कार्यरत हैं। सर्व शिक्षा अभियान के मानकों के मुताबिक राज्य में एक तिहाई से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं। परिणामस्वरुप बिहार के प्राइमरी स्कूल में छात्र शिक्षक अनुपात 50:1 है, जो देश में सर्वाधिक है। विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक नहीं होने की वजह से स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। साल 2016-17 में प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्तरों पर बीच में पढाई छोड़ने वाले बच्चों का प्रतिशत बढ़कर क्रमशः 9.7 और 13.5 हो जाना निहायत ही चिंता की बात है।

सर्व शिक्षा अभियान केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इस योजना के तहत हुए खर्च 60:40 के अनुपात में केंद्र और राज्य सरकार द्वारा उठाये जाते हैं, पर बिहार में संसाधनों के अभाव के बावजूद सर्व शिक्षा अभियान के तहत दी जाने वाली राशि में लगातार कटौती की जा रही है। साल 2017-18 में 6335 करोड़ के मुकाबले2505 करोड़ का ही आवंटन केंद्र सरकार द्वारा किया गया, जो कुल शेयर का 39% है। पिछले पांच वर्षों में इस योजना के तहत बिहार को मिलने वाली राशि में 12541 करोड़ रूपये की भारी कटौती की गयी। जिसका असर इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, पर्याप्त एवं स्थायी शिक्षकों का अभाव, वेतन, पढाई की सामग्रियों की किल्लत के रूप में देखा जा सकता है। सर्व शिक्षा अभियान का अगर यही हाल रहा तो “सब पढ़ें, सब बढें” के सपने को साकार किया जाना मुमकिन नही लगता।

वित्तीय वर्ष

मंजूर की गयी राशि

केंद्र द्वारा दिया जाना था

रिलीज़ की गयी राशि

कटौती

रिलीज़ की गयी राशि का %

2013-14

6935.82

3893.38

2610.13

1283.25

67.04

2014-15

8021.58

4583.53

2163.36

2420.17

47.20

2015-16

7387.15

4432.29

2515.57

1916.72

56.76

2016-17

9665.27

5799.16

2706.88

3092.28

46.68

2017-18

10558.59

6335.15

2505.74

3829.41

39.55

कुल

42568.41

25043.51

12501.68

12541.83

 

(करोड़ में)

अभी तक सरकार की प्राथमिकता बच्चों को स्कूली शिक्षा से जोड़ना था, अब जब यह लक्ष्य करीब-करीब हासिल कर लिया गया है, राज्य सरकार को एक कदम आगे जाकर प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना होना चाहिए।

एक ऐसे राज्य में जहाँ लड़कियों को घर के दहलीज़ से बाहर जाने की इज़ाज़त नहीं होती थी, वहां उन्हें स्कूल तक पहुँचाना यक़ीनन सरकार और समाज की उपलब्धि है। अब इन्हें साक्षर और समर्थ बनाकर नये समाज की नींव रखने की जरुरत है।

राज्य में शिक्षा सुधार की उपलब्धि और सुशासन के कार्य तभी सार्थक माने जायेंगे जब एक अभिभावक के लिए अपने बच्चों को सरकरी स्कूल में भेजना मजबूरी नहीं रह जाएगी। अभी हाल में ही नीति आयोग ने देश के सर्वाधिक पिछड़े जिलों को चिन्हित किया है, जिसमें केवल बिहार के 13 जिले हैं। यानी की बिहार का एक तिहाई जिला देश के सर्वाधिक 100 पिछड़े जिलों में हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को बिहार को दिए जाने वाली राशि में कटौती करना हकमारी ही कहा जायेगा।

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