सहूलियत को जकड़ती प्रथाए

Posted by Vibha Dewangan
April 12, 2018

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एक भारतीय हिन्दू होने के नाते हमारे समाज में ना जाने कितने ही रिवाज है. रीति रिवाज और प्रथा हमारे पूर्वजों ने बनाए थे जो उस समय के हिसाब से कुछ सोच कर ही बनाए होंगे और मैं इसे गलत नहीं मानतीं हूँ. लेकिन एक बात यह भी है कि चीज़ों में बदलाव वक्त की मांग है.

मैं यहां बात कर रही हूँ घूँघट प्रथा की. एक बहु से आज भी हमारे समाज में उम्मीद की जाती है कि वो अपने जेठ और ससुर के सामने घूँघट करे, क्यों ये मेरी समझ ना आ पाया. हमारे यहां सर पे साड़ी का पल्लू रखने का रिवाज है, सर के बाल छुपाने से क्या फायदा होगा ये तो नहीं पता. कुछ लोगों का तर्क है कि ये सम्मान देने का तरीका है, मेरा सवाल ये है कि क्या सम्मान देना सिर्फ बहू का फर्ज़ है दामाद का नही.

रिवाजों को मानना अच्छी बात है पर ऐसे रिवाज जो आपकी कम्फर्ट छनती हो उसका क्या फायदा. औरत अपने रोजमर्रा के काम करे या ससुर के सामने पल्लू संभाले. सुनाने में बड़ा ही साधारण सा लगता है कि पल्लू संभालना कौन सा बड़ा काम है पर जनाब तकलीफ उस लड़की से पूछो जिसे साड़ी बांधना तक नही आता. वो पुरुष जो इस प्रथा का समर्थन करते है आप से विनती है कि बस एक दिन आप इस प्रथा को अपनाए और बताए कि कितनी सहूलियत थी आपको.

महिलाएं जो गाँव में रहती है वो कभी सोचती भी नहीं इन बातों का विरोध करने का और पढ़ी लिखी शहरी लड़कियाँ जो विरोध करती है उनका मुँह ये कह कर बंद कर दिया जाता है कि पढ़ लिख गयी हो तो नखरे करने लगी हो. पुराने लोगो से ये बात सुनने की उम्मीद की जा सकती है पर गुस्सा तो मुझे तब आया जब मेरे अच्छे खासे पढ़े लिखे होने वाले पति ने मुझ से कहा कि विदेश में रहने वाली लड़कियां भी यहाँ आने पर इन रिवाजों का पालन करती है तो तुम्हे क्या दिक्कत है, तुम अगर बड़े शहर ना रहती, जॉब ना करती तो तुम भी कभी विरोध ना करती. मैं आपकी बात समझती हूं पर अगर आप मेरे कम्फर्ट को समझे तो मैं भी गलत नही हूँ. मेरे हिसाब से ये अपने सहूलियत की बात है और ये एक औरत की इच्छा होनी चाहिए कि वो मानना चाहती है या नही. शायद मेरे होने वाले पति और उनकी तरह बाकी लोग विरोध करने पर मजबूर हो कर मान भी जाए लेकिन अपनो से टकराव किसी को पसंद नही इसलिए विरोध से बेहतर हम रिवाजों को अपना लेने में ही अपनी भलाई समझते हैं.

इस आर्टिकल से मेरा मकसद सिर्फ महिलाओं की इस छोटी तकलीफ को उजागर करना था जो जरूरी नहीं है कि हर महिला पर लागू हो. बहुत से लोगों को मेरी इस सोच से एतराज होगा पर मैं जानती हूँ कि कुछ लोग मेरे जैसे भी होंगे और मेरी सोच से सहमत होंगे.

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