सिर्फ ठोस कानून नहीं ठोस कार्रवाई से बदलाव होगा संभव!

Posted by Ashish Kumar
April 16, 2018

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क्या बदल रहा है कुछ भी तो नहीं…बस बदल जाते हैं दरिंदे और बदल जाती है जगह… हैवानियत वही की वही रहती है… फर्क बस इतना होता है कि किसी दिन सूरत, किसी दिन कठुआ, किसी दिन उन्नाव, किसी दिन सासाराम तो किसी दिन असम से आती है ख़बर… किसी दिन दरिंदा पुजारी होता है, किसी दिन मौलवी होता है, किसी दिन पादरी होता है, किसी दिन पड़ोसी होता है तो किसी दिन अपना ही कोई रिश्तेदार… अपराध वही हमेशा की तरह जघन्यतम, क्रूरतम और हैवानियत की सारी हदें पार करते हुए होता है… कोई भी ऐसा दिन नहीं होता जब सुबह अख़बार या टेलीविजन खोलो और हैवानियत की ख़बर न हो…

हैवानियत हो जाती है, मासूम इस वहशी दुनिया से हमेशा के लिए रुख्सत हो जाती है उसके बाद शुरु होता है राजनीति का घिनौना खेल… इस खेल के शुरु होते ही दरिंदा, दरिंदा नहीं रहा जाता है वो हिन्दू हो जाता है या फिर मुसलमान… वो सवर्ण हो जाता है या फिर दलित… खेल शुरु होता है इस बात का कि कैसे इस घटना के सहारे अपने सारे हित साध लिए जाएं…अपनी पुरानी दुश्मनी निकाल ली जाए… इस खेल को खेलने वाले खिलाड़ियों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि पीड़िता को इंसाफ मिल रहा है या नहीं…हालांकि उनका सारा ताना-बाना पीड़िता को इंसाफ दिलाने के इर्द-गिर्द ही बुना रहता है…

कुछ लोगों का कहना होता है कि महिलाओं को अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं खड़ा होना होगा… उन्हें इन वहशी दरिंदों को मुंहतोड़ जवाब देना होगा… अपने को कमजोर समझना बंद करना होगा… लेकिन वो ये नहीं बताते कि ये मासूम कैसे करें इनका मुकाबला… मासूमों के साथ होने वाली रेप की घटनाओं में 8 महीने के नवजात से लेकर 4, 5, 6, 7… 11-12 साल की मासूम शामिल हैं…कैसे करें ये इनका मुकाबला… कैसे लड़ें इनसे जबकि कई बार तो इनका कोई अपना ही होता है जो इन्हें अपनी हवस का शिकार बना लेता है…

मुझे लगता है कि ऐसे मामलों के बढ़ने के पीछे सामाजिक चेतना की कमी के अलावा जो सबसे अहम मुद्दा है वो है लचर, ढीली और कमजोर कानून व्यवस्था… ये इसलिए क्योंकि रेप के बाद लोगों में गुस्सा आता है वो प्रदर्शन करते हैं फिर कानून में जरूरत के अनुसार बदलाव होता है( जैसे- निर्भया कांड के बाद, मध्य प्रदेश में नाबालिग के साथ रेप के संदर्भ में, हरिय़ाणा में नाबलिग से रेप के संदर्भ में)… कानून बदल भी जाते हैं नया कानून आ भी जाता है लेकिन उसका सही इस्तेमाल नहीं हो पाता है… निर्भया केस के आरोपी दोषी साबित भी हो गए और उन्हें फांसी की सजा भी सुना दी गई लेकिन वो आज भी जिन्दा हैं…

निर्भया कांड के बाद फास्टट्रैक कोर्ट की व्यवस्था होने के बाद भी तकरीबन 6 साल होने को हैं लेकिन वो अभी भी जिंदा हैं… शायद यही वजह है कि लोगों में अब कानून का डर नहीं है… ये सिर्फ निर्भया केस की बात नहीं है ऐसे न जाने कितने केस हैं… कुल मिलाकर ठोस कानून बनाने से ही कुछ नहीं होगा… उसका सही तरीके से सही समय पर इस्तेमाल भी होना चाहिए… जिससे अपराधियों में ये संदेश जाए कि ऐसे जघन्य अपराध करके वो बच नहीं सकते… शायद डर की वजह से ही अपराध में कुछ कमी आए… ये शायद इसलिए क्योंकि जिन हैवानों को मासूमों की प्यारी शक्ल देखने के बाद भी रहम नहीं आता उनसे किसी और बात की उम्मीद बेइमानी है…

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