70 साल के आरक्षण इतिहास पर एक झलक

Posted by Ravindra Mina
April 14, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

वर्तमान में आरक्षण विरोधी मंचो द्वारा  विरोध केवल शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण तक सीमित है जिसकी शुरवात संविधान लागू होते ही चम्पकं दूरेराजन vs स्टेट ऑफ़ मद्रास 1951 से ही शूरू होकर मंडलवाद सन 1992 में विकराल रूप लेती हैं जो आज भी अबाध रूप से जारी है। यह सर्वविदित है की जब जब आरक्षण कोर्ट गया  है तब तब इसके पर काटे गए है।

परन्तु विरोध की परिधि में राजनीतिक आरक्षण शामिल नहीं होता है। न्यायालयों में भी विधायिका में दिए गए आरक्षण को चुनौती नहीं दी जाती है। पहली बार सन 2000 मे राजनीतिक आरक्षण को राजस्थान के एक वाद से कोर्ट में चुनोती पेश हुए जिस पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने 2015 में संविधान पीठ बनाई । 2020 को खत्म होने वाले राजनीतिक आरक्षण पर संविधान पीठ क्या फैसला लेती है ? यह भी देखने मे आता है कि SC/ST वर्ग के जन-प्रतिनिधि केवल पार्टी के टीकितार्थी रह जाते है । लोकसभा की कुल 543 सीटों में SC/ST वर्ग की क्रमश 79 एवम 41 सीट है तथा  राज्यसभा में आरक्षण लागू नही है ।

 

आजाद भारत में आरक्षण की शुरुआत 21 सितंबर 1947 को हुई थी, जब अनुसूचित जातियों के लिए सीधी भर्तियों में 12.5% रिक्तियां आरक्षित करने का आदेश जारी हुआ था। संविधान लागू होने के बाद गृह मंत्रालय ने 13 सितंबर 1950 के अपने संकल्प में अनुसूचित जातियों के लिए निर्धारित आरक्षण के अलावा अनुसूचित जनजातियों के लिए भी 5% आरक्षण प्रदान किया। 1961 की जनगणना के आधार पर 1970 में उपरोक्त आरक्षण प्रतिशत में जनसंख्या अनुपात में परिवर्तन 15% और 7.5% प्रतिशत में किया गया। संविधान में लोकसभा एवं विधानसभा में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण प्रारंभ के दस वर्ष के लिए किया गया था । परंतु वर्तमान मीडिया में यह धारणा बना दी गई है की सरकारी नौकरियों में दिया गया आरक्षण भी मात्र 10 साल के लिए था जो मीडिया का पूर्वाग्रह मात्र है। इन बीते सालों में मीडिया राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक आरक्षण के अंतर को न समझ पाई है । ओर राजनीतिक आरक्षण बढ़ोतरी के नाम पर आरक्षित जनप्रीतिनिधि भी जनता की  भावनावो को भड़काते है ।

 

धारणाएं बनाई गई हैं उनमें जिनके द्वारा कभी भी राजनैतिक आरक्षण का विरोध नहीं किया गया बल्कि शैक्षणिक एवं सामाजिक आरक्षण जिसको नौकरियों में प्रतिनिधि के रूप में जाना जाता है को ही न्यायालयों में ,सड़क से संसद तक चुनौती मिलती रही है । जैसा आप सभी जानते हैं संविधान में प्रथम संविधान संशोधन सन 1952 में उपरोक्त वाद के कारण किया गया था । इसी तरह मंडल आयोग की अनुशंसा लागू होने के बाद   इंद्रा साहनी वाद में मिली आरक्षण की चुनौती से निपटने के लिए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने  3-3 संविधान संशोधन किये थे । अतः इस तरह देखने में आता रहा है कि माननीय उच्चतम न्यायालय को आरक्षण की व्यवस्था से कभी  भी विधि रुप से स्वीकार नहीं किया है जबकि वह मूलभूत अधिकार का अंग है ।

जैसा हम जानते हैं माननीय उच्चतम न्यायालय किसी के भी प्रति उत्तरदायित्व नहीं है जब की विधायिका जनता के प्रति उत्तरदाई है  ओर हर 5-5 साल में जनप्रतिनिधि अपने वादों पर चुन कर आते हैं इसी तरह सरकारी नोकर , विधायिका एवं जनता के प्रति उत्तरदाई है ,उनके गलत आचरण पर सरकार कार्यवाही करती है । परन्तु भारत मे अमेरिका की तरह  भारत मे जजो का उत्तरदायित्व तय करने की कोई व्यवस्था नही

देश की न्याय व्यवस्था ग्रामीण भारत  एवम पिछड़ों के लिये एक दुर्लभ जीव की तरह है जो मिलना मुश्किल इसी लिये जो कोर्ट-कचहरी के लिय “राम बचाये रूप ”में उदघोषित होता है ।

सन 1953 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने  संविधान के प्रावधानों के तहत पिछड़े वर्ग की दशाओं के अन्वेषण के लिए प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन काका कालेलकर की अध्यक्षता में किया। जिसका कार्य पिछड़े वर्गों की पहचान करना तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में छूट गए वर्गों एवं समूह को अनुसूचित करना था, परंतु दुर्भाग्यवश काका कालेकर की अध्यक्षता में गठित आयोग खुद अपनी रिपोर्ट को खारिज कर दिया। इस आयोग की रिपोर्ट पर संसद में बहस नहीं हुई, जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को दिए जाने वाला आरक्षण का प्रावधान लागू नहीं हो पाया। केंद्र सरकार में अन्य पिछड़ा वर्ग के सामाजिक और शैक्षिक आरक्षण की जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ दी। जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची राज्य अनुसार बनाई गई और राज्य अनुसार उनमें आरक्षण दिए गए। जनता पार्टी के प्रधामनंत्री मोरारजी देसाई  ने दूसरे सन 1978 में BP मंडल की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया, दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग ने 31 दिसंबर 1980 को पिछड़े वर्गों की पहचान की रिपोर्ट सरकार को सौंपी । पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार के फैसले के बाद 13 अगस्त 1990 में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए नौकरियों में 27% आरक्षण के प्रावधान का आदेश जारी हुआ। जिसको माननीय उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई— जिसे मंडलवाद के नाम से जाना जाता है। नई सरकार प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सत्ता में आई ने ,अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण में और 10% आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग आरक्षण का प्रवधान जोड़कर 25 सितंबर 1991 को नए आदेश जारी किए । इंद्रा साहनी केस (मंडलवाद) में उच्चतम न्यायालय  ने दिनाँक 16 नवंबर 1992 को PV राव की सरकार के आर्थिक आधार पर दिए गए 10% आरक्षण को असंवैधानिक घोषित कर दिया तथा 27% की वैद्यता पर मुहर लगा दी । इस तरह आरक्षण पर बनी सबसे बड़ी 9 सदस्य संवैधानिक बेंच ने आर्थिक आधार पर आरक्षण को खारिज कर दिया था, अतः वर्तमान में आर्थिक आधार पर आरक्षण संभव नहीं है, जिसे मीडिया और जनमानस भूल गया है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.