“शर्म आती है कि इस देश में रेपिस्ट को समाज का हिस्सा बनाया जा रहा है”

रोहतास (बिहार) में एक 6 साल की की बच्ची का रेप हुआ, कठुआ (जम्मू) में एक 8 साल की बच्ची का गैंगरैप कर उसे बेरहमी से मार दिया गया। ये पढ़कर अपने देश की हालत पर अफसोस हो रहा होगा, लेकिन ये जानने के बाद कि दिल्ली में एक 11 महीने की बच्ची का रेप हुआ है, आपको अपने देश पर शर्म आएगी। और अगर शर्म नहीं आई है तो आप अभ्यस्त हो चुके हैं। आप अभ्यस्त हो चुके हैं अखबार में आने वाली रेप की खबरों से। आपके लिए अब रेप देश में हो रहे बाकी अपराधों की तरह है, जिसे आप चाय की चुस्की खत्म होते ही भूल जाते हैं।

अब आपके पास रेप का औचित्य साबित करने के लिए बेतुके तथ्य नहीं होंगे। किसी लड़की या महिला का रेप हुआ होता तो अभी तक आपने उसके कपड़ों से लेकर उसके शारीरिक ढांचे, उसके पुरुष मित्र की संख्या, उस लड़की का इतिहास और भूगोल सब निकाल लिया होता। अच्छा, आज कल मैरिटल स्टेटस को भी इस सूची में एक दर्जा दे दिया गया है, क्या समाज है? हम अपने ही लोगों को समाज में बराबरी का दर्जा नहीं दे पा रहें, यहां रेपिस्ट को समाज का हिस्सा बना रहे हैं, गज़ब!

अब क्या करेंगे आप? 11 महीने, 6 साल और आठ साल की बच्ची का चरित्र हनन कैसे करेंगे? तो अब आप शांत रहेंगे, नज़रअंदाज़ करेंगे, एक और अपराध हुआ, आपके सारे बेतुके तथ्यों का कत्ल। अब आपको तथ्यों का कत्ल अपराध लगेगा, हमारे देश में पत्रकारों की हत्या का चलन है। लेकिन आप तब भी चुप थे, आज भी हैं और जब तक आपके साथ ऐसी कोई अनहोनी न हो जाए तब तक चुप रहना ही पसंद होगा आपको।

लेकिन अगर कुछ आपके बेतुके तथ्यों से ज़्यादा चिंताजनक है तो वो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो(NCRB) की रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट के अनुसार, इस देश में 95% रेपिस्ट जान पहचान वाले होते हैं। इसकी पूरी संभावना है कि किसी दिन जब आप अपने पड़ोसी या मित्र से बैठ कर किसी स्त्री का चरित्र हनन कर रहे थे, उसकी गन्दी नज़र आपकी घर की स्त्रियों पर थी। पढ़कर हलक सूख गया क्या? अभी तो तथ्यों पर बात होनी बाकी है। तो सुनिए, NCRB के अनुसार 2015 में 1,08,54 और 2016 में 1,97,65 बच्चों के साथ रेप हुआ।

आपने लड़कियों को अपने घर के सम्मान से तो जोड़ दिया, लेकिन सम्मान नहीं दे पायें। हमने अपने समाज की, देश की और राज्य की लड़कियों का सम्मान कभी किया ही नहीं। यहां लड़कियों या महिलाओ के चरित्र हनन में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है।अगर एक महिला किसी पुरुष के साथ बात कर रही हो या अपनी समझ के हिसाब से कपड़े पहन रही हो या 25 की हो गयी हो शादी न कर रही हो या रात दिन एक कर काम कर रही हो और उसके बाद प्रमोट हो रही हो- इस देश का हर चौराहा, नुक्कड़, ऑफिस कैंटीन, घर का दालान महिलाओं के चरित्र हनन का गवाह है। बिडम्बना यह है कि इस चरित्र हनन में कई बार महिलाएं भी शामिल होती हैं जो दुभाग्यपूर्ण है।

जब हम चरित्र हनन कर रहे होते हैं तो हम किसी भी महिला को इस समाज के लिए ‘आसानी से उपलब्ध’ वस्तु बना देते हैं। लेकिन हम सोचते कहां हैं कि हमारी बातों का प्रभाव कितना होता है समाज पर। अगर आज ये नहीं लिखती तो बहुत छोटा महसूस करती खुद को। महिला, घर की चौखट के अन्दर हो या बाहर, उसे सुदृढ़ करने का समय है, नीचा दिखाने का नहीं।

भारत में किशोरावस्था में सेक्स एजुकेशन की ज़रुरत है। क्यूं? क्यूंकि हमारे यहां ‘कंसेंट’ का कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं है। वैवाहिक रेप आज भी एक बहस का मुद्दा है इस देश में। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के सहमति का सम्मान करना दुर्लभ है। बच्चों की सोच की नींव या यूं कहें कि समझ घर के अनुसार होती है तो अगर घर में न सही, स्कूल में तो ‘कंसेंट’ का सम्मान करना सिखाया जाए। और अगर आप कुछ नहीं सिखा पा रहे हैं तो बच्चों को महिलाओं का सम्मान ही करना सिखा दे। आधी जंग हम जीत लेंगे। वक्त है एक नए शुरुआत की, वरना हम अंत की तरफ तो अग्रसर हैं ही।

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