मौजूदा समय में समाजवाद की ज़रूरत और इसको लेकर कंफ्यूजन

Posted by Atul Anjaan in Hindi, Politics, Society
April 18, 2018

एक नया विश्लेषण आजकल कुछ लोगों में समाजवाद को लेकर उभरा है कि चूंकि समाजवाद का प्रयोग रूस-चीन आदि देशों में सफल नहीं हो सका इसलिए समाजवाद अपने आप मे एक फेल अवधारणा है। इस विश्लेषण का समर्थन ज़्यादातर उन्हीं लोगों द्वारा किया जाता है जो समाज के गति विज्ञान और उसके ऐतिहासिक विकास के पैटर्न को सही ढंग से व्याख्यायित नहीं कर पाए हैं। लेकिन मेरा यह मानना है कि समाजवाद ही पूंजीवादी समाज की अगली मंज़िल है।

अगर हम एक सामान्य नियम पर गौर करें तो यह बात सीधी तरह से स्पष्ट हो जाएगी कि वर्तमान पूंजीवादी समाज ऐसे अंतर्विरोधों में फंस गया है जिनका हल सिर्फ समाजवाद द्वारा ही सम्भव है। और चूंकि मानव समाज हमेशा से ही विकासशील रहा है इसलिए वह इन अंतर्विरोधों को अवश्य हल करेगा।

उत्पादन का अधिकतम संभव समाजीकरण

अगर आज के दौर में हम देखे तो उत्पादन का अधिकतम संभव समाजीकरण हो चुका है। यदि आप किसी कार फैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूर से पूछेंगे की वह क्या करता है, तो उसका जवाब यह नहीं होगा कि वह कार बनाता है बल्कि उसका जवाब होगा कि वह तो इंजन के किसी हिस्से में मात्र एक बोल्ट कस कर उसे आगे बढ़ा देता है। इसी उदाहरण की तरह उत्पादन के हर छेत्र में हर वस्तु का उत्पादन पूरी तरह किसी व्यक्ति द्वारा नहीं वरन एक पूरे मानव समूह द्वारा किया जाता है। इस प्रकार उत्पादन का तो अधिकतम समाजीकरण हो रहा है।

उत्पादन के साधनों/मुनाफे का केंद्रीकरण

इसके एकदम विपरीत उत्पादन के साधनों/मुनाफे का लगातार केंद्रीकरण हो रहा है। किसी भी फैक्ट्री में उत्पादन कई सौ मज़दूरों द्वारा किया जाता है लेकिन उत्पादन के साधनों पर एक व्यक्ति(मिल मालिक) का स्वामित्व होता है। आधुनिक युग मे भी, जब वित्तीय पूंजी का जमाना आ गया है , तब भी किसी फर्म के आधे से ज्यादा शेयर दो या तीन लोगों के ही पास होते हैं। बड़ी कंपनियों का मर्जर (Merger) भी इस बात को उजागर करते हैं कि उत्पादन के साधनों/मुनाफे का लगातार केंद्रीकरण होता जा रहा है ।

इस अंतर्विरोध का हल

उपरोक्त दोनों स्थितियों को देखकर हम इस अंतर्विरोध को समझ सकते हैं। समाज मे ये अंतर्विरोध लगातार बढ़ रहा है। इनके दो हल हो सकते हैं:-
1. या तो उत्पादन का केंद्रीकरण हो जाये ( जो कि आज के वैश्वीकरण के दौर में बिल्कुल भी संभव नहीं है चूंकि आप अकेले किसी वस्तु का उत्पादन नहीं कर सकते। आपको वेंडर फर्मों या कच्चे माल की ज़रूरत अवश्य पड़ेगी)।
2. दूसरा विकल्प यह है कि उत्पादन के साधनों/ मुनाफे का समाजीकरण कर दिया जाए( यह काफी हद तक संभव प्रतीत होता है)।

मानव समाज का विकल्प:समाजवाद

अब सोचने की बात यह है कि मानव समाज इस अंतर्विरोध को कैसे हल करेगा। चूंकि पहले हल की ओर देखें तो यह हमें एक पुरातन व्यवस्था की ओर ले जाएगा जिसमे मनुष्य अपनी आवश्यकता की चीज़ों का उत्पादन स्वयं करता था( यही उत्पादन का केन्द्रीयकरण था)।
चूंकि मनुष्य हमेशा से एक बेहतर विकल्प को चुनता आया है तो यह बात तो तय है कि वो पहले विकल्प (जोकि मानव समाज को पीछे की ओर धकेल देगा) का चुनाव निश्चित तौर पर नहीं करेगा। अतः मानव समाज निश्चित तौर पर दूसरे विकल्प को चुनेगा और समाजवाद अपरिहार्य हो जाएगा।
स्पष्ट रूप से देखा जाए तो पूंजीवाद के बाद मानव समाज की दो ही गतियां होंगी :-
1. समाजवाद।

2.या तो इन अंतर्विरोधों में फंस कर समाज का विनाश ( जो कि मनुष्य होने नहीं देंगे)।

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