“जामिया ‘तथाकथित हिंदुओं’ के लिए सिर्फ कॉलेज होगा, मेरे लिए वो मोहब्बत का दूसरा नाम है”

DU के खालसा कॉलेज में अच्छी खासी पढ़ाई चल रही थी। उस समय पढ़ने का तो नहीं, पर लिखने का शौक था। ठीक-ठाक कवितायें और शेर-ओ-शायरी लिख भी लेता था। कॉलेज के भी राइटिंग कम्पटीशन में हिस्सा लेता रहता था। इसी दौरान एक बार इंटर यूनिवर्सिटी कम्पटीशन के लिए चला गया, पता नहीं कैसे पर एक अजूबा हो गया, गलती से कम्पटीशन में पहला प्राइज़ आ गया। कॉलेज में प्रोफेसरों में इज्ज़त बढ़ गई। क्लास में अक्सर हरकतें करने के बावजूद प्रोफेसर कुछ नहीं कहते थे। पर एक प्रोफेसर से कुछ खास लगाव था, या ऐसा समझ लीजिये कि प्रोफेसर हिंदी के थे इसलिए उनसे कुछ ज़्यादा पटती थी। प्रोफेसर का नाम ‘हरनेक सिंह गिल’ था। उन्होंने जर्नलिज़्म के बारे में बताया कि यहां लिखने के अच्छे खासे पैसे मिलते हैं।

सुनने में बड़ा अच्छा लगा कि लिखने के पैसे मिलेंगे और ऊपर से प्रेस का कार्ड भी मिलेगा, जिससे पुलिस वाले भी डरते हैं। सोचा अब तो यही करना है। पर इसके बारे में कुछ पता नहीं था कि इसमें एडमिशन कैसे मिलता है? क्या पढ़ना पड़ता है। घर-परिवार में ऐसा कोई नहीं था, जिससे गाइडेंस मिलती, पर प्रोफेसर साहब ने पूरा साथ दिया। उन्होंने बताया कि दिल्ली में कई ऐसी यूनिवर्सिटी है जो ये कोर्स करवाती है। सर ने जितनी यूनिवर्सिटी के बारे में बताया था सबके फॉर्म भर दिए।

एग्ज़ाम के बाद एक बार फिर अजूबा हो गया। DU, IP से लेकर जामिया तक सभी के एंट्रेंस एग्ज़ाम क्लियर हो गये और सब में ऐसी रैंक भी आ गई कि किसी भी कॉलेज में मुझे आराम से एडमिशन मिल सकता था। घर पर सब खुश थे, पर एक रिश्तेदार ने बताया कि ये बहुत महंगा कोर्स है, इसमें लाखों लग जाते हैं। ये सब सुनकर हमारे भी पसीने छूट गये थे। दाल-रोटी खाने वाले घर में लाखों की छोड़िये हम कभी हज़ारों की बातें भी नहीं करते थे। हम सबके सामने नई परेशानी ये थी कि कॉलेज की फीस के लिए पैसे कहां से लायेंगे? बैंक से लोन की बात करने गये, तो इतने सारे कागज़ों के बारे में बता दिया, जो पापा के पास तो, क्या दादा जी के पास भी नहीं थे।

आखिर में हम सभी कॉलेजों कि फीस देखने लगे IP की फीस करीब 40 हज़ार के आस पास थी, जिसे देख कर एक बार तो पढ़ने का ख्याल ही छोड़ दिया। ऐसा लग रहा था जैसे नाउम्मिदगी के बादलों ने घेर लिया हो। थक कर जामिया की फीस के बारे में देखने लगे, जो 2011 में शायद 4700 के आस-पास थी। फीस देखकर थोड़ी राहत मिल चुकी थी। पत्रकार बनने का ख्वाब पूरा होता हुआ दिखाई देने लगा था, आखिरकार दोस्तों-रिश्तेदारों से उधार लेकर 4700 रुपये का जुगाड़ किया और एडमिशन ले लिया।

पहले दिन कॉलेज में हर तरफ बुर्का पहनी हुई लड़कियां, दाढ़ी और टोपी पहने हुए लड़के दिखाई दिए। हालांकि इनमें बहुत से ऐसी वेशभूषा में नहीं भी थे, पर दिमाग ने सिर्फ मुल्लों को ही देखा। (मुल्ला इसलिए कहूंगा क्योंकि उन दिनों मैं जिस जगह और समाज से निकलकर आया था, वहां आज भी मुसलमानों कों मुल्ला ही कहा जाता है।)

खैर मुल्लों के बारे में अपनी पहले से एक राय बनी हुई थी कि ये लोग आतंकवादी होते हैं, छोटी-छोटी बात पर लोगों को मार देते हैं। कॉलेज का पहला हफ्ता इसी सोच के साथ बीता। इस बीच कुछ मुस्लिम दोस्त बनने लगे, पर उनके साथ एक दायरा होता था, जो उनके जाते ही मुल्ला हो जाता था। धीरे-धीरे टाइम बीतने लगा, दायरे वाले दोस्त अब जिगड़ी यार बनने लगे थे। इन सब के बीच कुछ ऐसे हिन्दू दोस्त भी थे, जिनकी नज़र में मुसलमान अब भी मुल्ले ही थे। उनके सामने वो बेशक फलाना भाई, ढिमकाना भाई करके बात करते थे, पर उनके जाते ही फिर से मुल्ले वाली बात शुरू कर देते थे।

इस बीच एक लड़की से इश्क हो गया। खुद की नामसझी और बेवकूफी की वजह से ये इश्क ज़्यादातर इश्क कि तरह मुक्कमल नहीं हुआ। ऐसा लगा जैसे इश्क की इस नाकाम कहानी के पीछे लड़की का मुसलमान होना है। एक बार फिर मुसलमान मेरे लिए मुल्ले हो गये थे। जब भी मौका मिलता फेसबुक से लेकर अपने हिन्दू दोस्तों के बीच मुल्लों को खूब बुरा-भला कहता।

कॉलेज का सेकंड इयर खत्म होने वाला था। पर मुल्लों के लिए नफरत पहले से ज़्यादा बढ़ चुकी थी। खैर छुट्टियों के बाद नया सेशन शुरू हुआ। कॉलेज फिर से जाना शुरू हुआ। इस बीच कॉलेज थिएटर ज्वाइन कर लिया। नए लोग मिलने लगे, नए दोस्त बनने लगे। नए दोस्तों में ज़्यादातर मुसलमान थे, जो जुम्मे के दिन नमाज़ पढ़ने चले जाते थे और रमज़ान में रोज़े भी रखते थे। पर न जाने क्यों! अब किसी के अंदर जो मुल्ले की परिभाषा मैं सीखकर आया था वैसे कोई चीज़ दिखाई ही नहीं दे रही थी।

शायद मैं मेच्योर हो गया था या चीज़ों को समझने लगा था। थिएटर वाले गुरु जी भी मुसलमान थे, पर उनका घर हम जैसे बेगार लौंडों का अड्डा हुआ करता था, जहां चाय पर चाय और सर के चले जाने पर उन्हीं की जेब से चुराई हुई सिगरेट का दौर चला करता था। उन दिनों फ्राइड चिकन और बिरयानी खाने का चस्का भी चढ़ चुका था, पर अपनी जेब में शायद ही कभी पैसे हुआ करते थे। पर दोस्तों के रहमों-करम पर हर दूसरे दिन बिरयानी और चिकन खाने को मिल जाता था।

इन सब के बीच कब फाइनल इयर के एग्ज़ाम आ गये और हम ग्रेजुएट हो गये पता ही नहीं चला। ग्रैजुएशन के बाद मीडिया लाइन में करियर नहीं है इसका अंदाज़ा सेकंड ईयर में ही हो चुका था, तो IIMC और FTII का सपना देखने लगे। FTII का सपना तो खैर पूरा नहीं हुआ, पर IIMC का एग्ज़ाम दे दिया। जब रिज़ल्ट आया, तो अपना नाम देखकर खुशी हुई। पर दिक्कत ये थी कि इसके बाद एक इंटरव्यू भी होना था। और जिस कोर्स का एग्ज़ाम क्लियर हुआ था वो यहां का सबसे High-फाई कोर्स ADPR था। इस कोर्स के बारे में कहा जाता है कि ये कोर्स बड़े-बड़े घर के बच्चों के लिए ही बना है।

शुरुआत में गुरु जी को जब पता चला कि इस कोर्स में एडमिशन होने वाला है, तो सारी दुनिया में जैसे वो ही सबसे खुश वही थे। पर जब उन्हें मेरी हालात का पता चला, तो घरवालों के साथ-साथ वो भी टेंशन में रहने लगे। खुद मेरे साथ कई बार जामिया से IIMC आये, अपने एक प्रोफेसर दोस्त से बात की मुझे उनसे मिलवाया ताकि मुझे इंटरव्यू के लिए तैयार करवा सकें।

इंटरव्यू का दिन आ गया मुझे नज़फगढ़ से आना था, पर गुरु जी मुझसे पहले जामिया से IIMC पहुंच गये। मुझे साहस बंधाने की हर कोशिश करते, पर अंदर से वो खुद भी डरे हुए थे, जो उनकी सिगरेट से दिख जाता था। आखिरकार इंटरव्यू दिया और गुरु जी के पास पहुंचा। उन्होंने सब पूछा कि कैसा रहा? क्या-क्या सवाल पूछे? कई बार डांटा भी कि इतना समझाया फिर गुड़-गोबर करके चले आये। कई दिनों बाद एडमिशन लिस्ट आई, उसमें मेरा भी नाम था।

पर अब दूसरी तरह कि टेंशन थी कि फिर से फीस के पैसे कहां से लायें? यहां 2-4 हज़ार कि बात नहीं थी, क्योंकि फीस शायद 40 हज़ार के आस-पास थी, जो मेरे लिए एक बार फिर पहाड़ तोड़ने जैसा थी। गुरु जी और बाकि दोस्तों को मेरे दिवालियेपन के बारे में अच्छे से पता था। खैर गुरु जी ने बाकि लौंडों को बोला कि थोड़ी कोशिश तुम करो थोड़ी ये कर रहा है। लड़के के एडमिशन में पैसों कि वजह से कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए।

एक बार फिर दोस्तों और रिश्तेदारों का साथ मिला और पैसा इकट्ठा किया। आखिरकार IIMC में एडमिशन मिल गया, बाद में पता चला रैंक भी अच्छी थी, तो स्कॉलरशिप भी मिल गयी, तो काफी दोस्तों का पैसा उतार दिया। IIMC के बाद एक कंपनी में ठीक-ठाक पैसे पर जॉब भी मिल गई। काफी टाइम पहले पुरानी कंपनी छोड़कर एक बड़ी कंपनी ज्वाइन की थी। जिसके साथ कई महीनों से देश की अलग-अलग जगहों में घूम रहा हूं। बड़े-बड़े होटलों में देश के बड़े-बड़े लोगों से मिल रहा हूं, पर कहीं भी घूमते हुए या किसी भी मिलते हुए वो खुशी महसूस नहीं होती, जो संडे वाले दिन टाइम निकाल कर जामिया पहुंचने में होती है। ऐसा लगता है जैसे जामिया का पत्ता-पत्ता मुझसे बात करने कि कोशिश कर रहा हो।   

इन दिनों जो “तथाकथित हिन्दू” जामिया में जिस तरह से माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें बस यही कहना चाहूंगा कि हमारे हिन्दू धर्म में किताबों को मां की तरह पूजा जाता है। गलती से अगर वो नीचे भी गिर जाए, तो उसे चूम कर माथे से लगाया जाता है। पर तुम लोग तो कॉलेज का माहौल बिगाड़ कर विद्या माता पर ही पैर रखने को उतावले हो, थोड़ी शर्म करो और कॉलेज को कॉलेज ही रहने दो।
(संघ और उसकी विचारधारा को मानने वाले को हिन्दू नहीं कहा जा सकता इसलिए उन्हें तथाकथित हिन्दू कहना ज़्यादा सही है)

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