जो खबर अखबार के पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी उसे दबा दिया गया, इसलिए मैं लिखता हूं

Posted by Prince Mukherjee in #WhyIWrite, Hindi
May 6, 2018
Editor's note: Youth Ki Awaaz has turned 10, and this post is a part of #WhyIWrite, a campaign to celebrate Youth Ki Awaaz users who have spoken up about issues that matter to them. If you'd like to share what motivates you to write, publish your story here!

बात साल 2012 की है जब मेरी एक कज़न IIMC से मास कम्युनिकेशन करने के दौरान ‘Youth Ki Awaaz’ से इंटर्नशिप कर रही थीं। तब मैनें YKA पर उनके द्वारा लिखी गई अंग्रेज़ी आर्टिकल्स पढ़े और जाना कि क्या है YKA और किस तरह से यहां यूज़र्स अपने आर्टिकल्स को पब्लिश कर सकते हैं।

यह वो दौर था जब साल 2011 में अन्ना हज़ारे का आंदोलन खत्म होने के बाद से केन्द्र में काँग्रेस की सरकार को लेकर लोगों में आक्रोश था। अन्ना के आंदोलन की तर्ज पर ‘आम आदमी पार्टी’ की नींव रखी गई जिसने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को सीएम का पद दिलाया। यहां तक कि योगगुरू बाबा रामदेव भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों पर जमकर आलोचना करने में लगे थे। और दूसरी तरफ 26/11 हमले के ज़ख़्म भी ताज़ा थे। कुल मिला कर देश का माहौल कुछ ठीक नहीं था।

ऐसे में पत्रकारिता जगत में कुछ कर गुजरने की चाह रखने वाले मुझ जैसे इंसान के ज़हन एक गुबार उत्पन्न हो रहा था और शायद यहीं वो वजह थी कि मैं कुछ ही दिनों में दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई करने लग गया।

सब कुछ ठीक-ठाक ही रहा। पढ़ाई खत्म हुई और फिर एक मीडिया हाउस में मुझे नौकरी मिल गई। लगभग 2 वर्ष तक वहां कार्य करने के बाद सेहत में कुछ दिक्कत हुई और मुझे नौकरी छोड़ कर वापस झारखंड आना पड़ गया।

इस दौरान ‘Youth Ki Awaaz’ हिन्दी की ओर से अगस्त 2017 – अक्टूबर 2017 बैच के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम में अप्लाई करने की तारीख का ऐलान किया गया। और चयन प्रक्रियाओं से गुज़रने के बाद मैं भी उन 20 कैंडिडेट्स में से एक रहा जिन्हें ‘YKA राइटर्स ट्रेनिंग प्रोग्राम’ के लिए चुना किया गया।

मैं सच कहूं तो आज जिस आत्मविश्वास के साथ अपने आस-पास के मुद्दों को YKA पर लिखता हूं, उसका श्रेय भी उसी ‘YKA ट्रेनिंग प्रोग्राम’ को जाता है जिससे न सिर्फ मेरी लेखनी में निखार आया बल्कि आत्मविश्वास के स्तर में भी काफी बढ़ोतरी हुई। ट्रेनिंग प्रोग्राम के दौरान मुझे बताया गया कि आर्टिकल लिखने के दौरान किन चीज़ों का ध्यान रखना चाहिए।

मैं मानता हूं कि मैनें अपने शहर के जिन मुद्दों को YKA पर उठाया उन्हें स्थानीय अखबारों, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों या फिर किसी वेबसाइट्स में जगह नहीं दी गई। ये मुद्दें शायद ऐसे थे जिन्हें अखबार के फ्रंट पेज पर जगह मिलनी चाहिए थी। सबसे हैरानी की बात तो ये है कि अभी हाल ही में मैनें अपने शहर के एक प्रतिष्ठित अखबार के संपादक से कहा कि ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत जो शौचालय बनवाए जा रहे हैं उनमें बहुत घोटाले हो रहें हैं। बतौर संपादक उनका जवाब बेहद हैरान कर देने वाला था। वो कहते हैं कि – प्रिंस करप्शन कहां नहीं है। करप्शन तो हर जगह है।

मुझे उम्मीद थी कि जब मैं उन्हें ये बताऊंगा तब वे मुझसे इस विषय पर तथ्य रखने को कहेंगे और शायद अपने अखबार में स्टोरी को प्रकाशित भी करेंगे। वरिष्ठ संपादक के तौर पर उनका जवाब अटपटा ज़रूर लगा, लेकिन पत्रकारों के द्वारा राजनीतिक दलों की चाटुकारिता करना और विज्ञापनों के आड़ में ख़बरों को मौत की नींद सुलाना तो आज की तारीख में एक रिवायत सी बन गई है। खैर मैनें ठान लिया कि इस एक्सक्लूसिव स्टोरी को ‘‘Youth Ki Awaaz’’ पर ही पब्लिश करूंगा।

जब मैनें ‘यूथ की आवाज’ पर लिखना शुरू किया तो जो चीज़ मुझे सबसे अच्छी लगी वो ये कि यहां फैक्ट्स तो सटीक होते ही हैं साथ ही साथ हिन्दी की लेखनी में नुक्ते का प्रयोग भी किया जाता है, जो लगभग मेन स्ट्रीम मीडिया से विलुप्त होती जा रही है।

मैं ‘Youth Ki Awaaz’ को सबसे सशक्त प्लेटफॉर्म मानता हूं और खासकर मेरे लिए ‘YKA’ इसलिए भी मददगार साबित हुआ क्योंकि साल 2011 से लेकर साल 2018 तक जब भी मुझे 2-3 महीने का गैप मिलता था, चाहे अपनी पढ़ाई से या फिर जॉब से तो मैं सरकारी योजनाओं जैसे नरेगा, मनरेगा, जनगणना, पशुगणना और शौचालय जांच जैसे कार्यों के सिलसिले से झारखंड के दुमका ज़िले के 10 प्रखंडों के ग्रामीण इलाकों में जाया करता था। कभी पहाड़ों पर 2 घंटे चढ़ाई कर के सुदूर ग्रामीण इलाकों में जाता तो कभी ऐसे गांव से भी वास्ता पड़ता था जहां शराब ही सब कुछ है। वहां के लोग नशा पर ही नर्भर हैं। मैं समझता हूं कि भारत के ग्रामीण इलाकों या फिर समाज के अंतिम पंक्ति पर खड़े लोगों की समस्याओं को समझने और परखने का अनुभव भी मुझे इन्हीं ग्रामीण इलाकों से मिला।

अब बात आई कि इन गांवों में जीवन यापन कर रहे लोग जिन परेशानियों का सामना कर रहे हैं या फिर मेरे शहर में कुछ गड़बड़ी है, तो इन मुद्दों को कहां पर उठाया जाए। क्योंकि मैं किसी अखबार का संपादक भी नहीं हूं कि जो मर्ज़ी वो छाप दूं। ऐसे में ‘YKA’ मेरे लिए सबसे मददगार साबित हुआ, चाहे ग्रामीण स्तर की कोई समस्या हो या फिर मेरे शहर की, उसे मैं बेबाकी से यहां रख पा रहा हूं। मेरा मानना है कि भारत की आधी से भी ज्यादा आबादी जो गांवों में रहती है और यदि आप इन्ही लोगों के नब्ज़ को नहीं पकड़ पाए फिर तो आप सच से कोसों दूर हैं।

मैं ‘YKA’ पर इसलिए भी लिखता हूं कि मेरे द्वारा लिखी गई बातें न सिर्फ देश के लाखों व्यूवर्स तक पहुंचती है, बल्कि लोग मेरी लेखनी पर अपनी प्रतिक्रियाएं भी देते हैं जिससे आगे और बेहतर करने का हौसला मिलता है। और दूसरी बड़ी बात ये कि वो मुद्दे जिन्हे अख़बारों या नयूज़ चैनल में जगह नहीं दिए जाते हैं, जब मैं उन्हें YKA पर उठाता हूं तो वाकई दिल को सुकून मिलता है। और जो सबसे बड़ी बात कि यदि मैं इन्ही मुद्दों को अपने किसी निजी ब्लॉग में लिखूंगा तो जितने व्यूअर्स YKA पर मुझे मिलते हैं, वो शायद नहीं मिल पाएंगे। और एक राइटर के लिए ये चीज़ें बहुत मायने रखती हैं कि क्या लोग आपकी स्टोरी को पढ़ रहे हैं? यदि पढ़ रहे हैं तो क्या उस पर प्रतिक्रियाएं आ रही हैं? और यदि रिएक्शंस नकारात्मक भी आ रहे हैं और बतौर राइटर आपने तथ्यों की सही से पुष्टि की है, फिर आपको निर्भीकता से अपने स्टैंड पर खड़ा रहना चाहिए।

मैं समझता हूं कि देश का हर वो युवा जो गरीबी, बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद, महिला सुरक्षा, बेरोज़गारी और किसानों की दुर्दशा जैसे हालातों से देश को निजाद दिलाना चाहता है, उसे बेबाकी से अपनी बात रखनी चाहिए। हर झिझक को तोड़ते हुए सोच के सागर में डूबकर लिखना शुरू करना चाहिए। क्योंकि आज आप लिखेंगे और क्या पता आपकी लेखनी से प्रेरित होकर आपका कोई दोस्त भी लिखेगा और फिर एक दिन ऐसा भी आएगा जब देश का हर युवा अपने आस-पास की समस्याओं पर खुलकर बात करना और लिखना चाहेगा।

यकीन मानिए यदि आप अपने समाज को बदलना चाहते हैं फिर लेखनी ही सबसे सशक्त माध्यम है। और बहुत मुश्किल नहीं है अपने दिमाग में चल रही बातों को शब्दों में बयां करना। बस एक वो कड़ी चाहिए होती है, वो कॉंसेप्ट कि आपको लिखना किस विषय पर है। यदि वो सब्जेक्ट आपके दिमाग में क्लियर है, फिर तो आप लिखते ही चले जाएंगे। और यकीन मानिए धीरे-धीरे आपकी लेखनी के स्तर में भी ज़बरदस्त सुधार आएगा।

लेखनी के संदर्भ में मैं आपके साथ अपने कुछ बेहद ही निजी अनुभव साझा करना चाहता हूं कि कोई भी स्टोरी लिखने से पहले ऐसी बात नहीं है कि मैंने महीने भर रिसर्च की हो। और इस उम्मीद के साथ यह अनुभव साझा कर रहा हूं कि आप भी मुझसे प्रेरित होकर लिखना शुरू करें।

YKA पर मैंने एक स्टोरी की थी जिसका शीर्षक है –तो बस यादों में ही रह जाएगी कोलकाता की पीली टैक्सी।” इस स्टोरी को मैनें क्यों और कैसे की थी। क्या सोच थी मेरी उस वक्त ये मैं आपके साथ शेयर कर रहा हूं। मैं जब भी कोलकाता जाया करता था, खास कर तब जब OLA और UBER का युग आ चुका था, तब पीली टैक्सी ड्राइवर्स को देखकर बहुत दया आती थी। क्योंकि कोलकाता के औसत इलाकों में आज की तारीख में बहुत मुश्किल सा हो गया है पीली टैक्सी ड्राइवर्स के लिए अपना जीवन यापन करना। और इसके अलावा ‘हिन्दुस्तान मोटर्स’ कंपनी द्वारा एंबेसडर कार मैन्युफैक्चरिंग बंद कर देना और सरकार के द्वारा 15 साल से अधिक पुरानी गाड़ियों पर रोक लगाने जैसे फैसले को दिमाग में रखते हुए मैनें एक चिंता प्रकट की थी कि आने वाले वक्त में शायद पीली टैक्सी न दिखे। मैं समझता हूं कि जो बातें पीली टैक्सी को लेकर मेरे ज़हन में आई, वैसी ही बहुत सारी बातें अलग-अलग विषयों पर देश के युवाओं के ज़हन में भी आती होंगी। बस ज़रूरत है एक प्रॉपर स्टोरी एंगल के साथ उसे लिखने की।

‘YKA’ पर मेरे द्वारा लिखी गई स्टोरीज़ में एक ऐसी भी स्टोरी है जो मेरे दिल के बेहद करीब है और एक भावनात्मक सा रिश्ता जुड़ा है उस स्टोरी के साथ। उस स्टोरी का शीर्षक है – मैं पंचायत के सामने गिड़गिड़ाती रही और वो मेरे पति पर कोड़े बरसाते रहें।”

आपके साथ मैं साझा करने जा रहा हूं कि कैसे मुझे ये स्टोरी मिली और बात सिर्फ स्टोरी लिखने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि जहां की घटना है वहां के थाना प्रभारी को सफाई भी देनी पड़ी और जल्द न्याय की भी उम्मीद है।

मेरे एक अज़ीज मित्र झारखंड के गोड्डा ज़िले के महगामा ब्लॉक अंतर्गत गांव सरभंगा में रहते हैं। एक दिन बातचीत के दौरान उन्होंने मुझसे कहा कि प्रिंस भाई मेरे पास वाले गांव में कुछ माह पहले एक बड़ी अज़ीब घटना घटी है। फिर उसने बताया कि कैसे सरपंचों ने एक महिला के पति पर कोड़े बरसाए और फिर कुछ दिनों के बाद डिप्रेशन में आकर उस महिला के पति ने अपने शरीर पर किरासन तेल उड़ेलकर आग लगा ली। और फिर सरपंचो की दबिश के आगे नतमस्तक हो गई स्थानीय पुलिस।

कुछ पल के लिए अपने आप को मेरी जगह पर रखकर देखिए, यदि आपको आपके दोस्त ने ये बात बताई होती तो आप क्या करते। बहुत गुस्सा आता न, सरपंचों और पुलिसवालों पर। मुझे भी बहुत गुस्सा आया। और सच कहूं तो कई स्टोरीज़ तो आपको आपके दोस्तों और रिश्तेदारों के माध्यम से सुनने को मिलती है और जब बात लिखने की आती है तब करनी होती है तथ्यों की पुष्टि। और फिर जाकर बनती है एक कहानी।

इस स्टोरी को करने के लिए मुझे लगभग 10 दिन का समय लग गया और वो इसलिए क्योंकि कई बार मृतक की पत्नी से संपर्क साधने की कोशिशें नाकाम रहीं। वो बात करना नहीं चाहती थीं। उन्हें लग रहा था कि उनकी मुश्किलें और तेज़ हो जाएंगी। लेकिन हमने उन्हें हमसे बात करने के लिए राज़ी कर लिया। और फिर जो बातें उन्होंने बताई उसके आधार पर मैंने स्टोरी की और YKA को सेंड कर दिया। हालांकि उस दौरान मैं YKA के ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा था। स्टोरी प्रकाशित होने से पहले ‘YKA’ हिन्दी के एडिटर का कॉल आया और उन्होंने मुझे बताया कि मैनें स्टोरी लिखने के क्रम में कहां-कहां पर गलतियां की हैं। फिर मैनें अपनी स्टोरी में करेक्शन कर पुन: सेंड कर दिया। अब दूसरी बार फिर कॉल आया और उन्होंने मुझसे कहा कि इस मामले में आपको पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंचार्ज का स्टेटमेंट लेना चाहिए। अब मैंने वहां के पुलिस स्टेशन कां नंबर जुगाड़ किया और स्टेटमेंट लेकर स्टोरी सेंड कर दिया।

और सबसे बड़ी बात ये रही कि अब तक इस गंभीर मुद्दे को स्थानीय अखबार और पुलिस वालों ने दबाने की कोशिश की थी, अब जब ऑफिसर इंचार्ज महेन्द्र यादव से बात हुई तो उन्होंने बताया कि इस प्रकरण को लेकर केस दर्ज हो चुका है और मामला कोर्ट में पहुंच चुका है। साथ ही उन्होंने बताया कि वरीय पदाधिकारी से कुछ आदेश प्राप्त होने हैं जिस कारण विलंब हो रहा है, हालांकि कार्रवाई चल रही है। मामलें में 5 लोगों को अभियुक्त बनाया गया है। यहां तक कि उन्हें कहना पड़ा हम हर संभव मृतक की पत्नी की मदद के लिए तैयार हैं।

अंत में मैं यहीं कहना चाहूंगा कि आप भी मेरी तरह बहुत सारी कहानियां ‘YKA’ पर लिख सकते हैं। बशर्ते आपको अभी से ही आपके आस-पास क्या हो रहा है, इसे ऑवज़र्व करने के लिए अपनी आंखें खुली रखनी होंगी। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि एक दिन न सिर्फ आपकी लेखनी में निखार आएगा, बल्कि समाज के मुद्दों पर आपकी पकड़ भी मज़बूत बनेगी।

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