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तेल की बढ़ती कीमत पर सरकार के बचाव में दिए जा रहे तर्क की सच्चाई

Posted by Akash Awasthi in Hindi, Politics
May 25, 2018

पिछले कई दिनों से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिसके फलस्वरुप भारत में डीज़ल और पेट्रोल की कीमत में वृद्धि होना तय है। पेट्रोल की कीमत 84 रुपये और डीज़ल की कीमत 70 के आसपास हो गई है। अब इस बीच अगर कोई सरकार पर प्रश्न उठाये तो उसे कम्युनिस्ट और अगर कोई सरकार का बचाव करे तो उसे भक्त घोषित कर दिया जाता है।

लोग अलग-अलग तरह के तर्क दे रहे हैं कि मोदी सरकार ने ईरान को 43000 करोड़ का कर्ज़ चुकाया है। यह कैसे हो सकता है क्योंकि सरकारी कंपनियों ने अगर तेल खरीदा तो बेचा भी होगा तो यह पैसा कहां गया ? आप इसे कर्ज़ तो बिल्कुल नहीं मान सकते हैं। दूसरी बड़ी बात यह कर्ज़ सरकारी कंपनियों ने चुकाया है ना कि सरकार ने।

अब ये भी कहा जाता है कि सब्सिडी को खत्म किया जाए, तो भारत कोई विकसित देश नहीं है, यहां की अधिकतर जनसंख्या खेती करती है, अगर उसे आप डीज़ल भी सब्सिडी पर उपलब्ध नहीं कराएंगे तो आप कैसे कह सकते हैं कि उसकी आय दोगुनी होगी। आपका प्लान तो 2022 तक का है, तब तक ना जाने कितने किसान आत्महत्या कर चुके होंगे।

अगला बचाव कि सरकार ने तेल की कीमतों पर नियंत्रण रखा, लेकिन यह किस तरह का नियंत्रण था कि तेल कंपनियां लगातार कीमतों में वृद्धि कर रही हैं और सरकार कैबिनेट की बैठक में इस पर चर्चा तक करना उचित नहीं समझती।  2014 के मुकाबले कीमत में ज़्यादा वृद्धि नहीं हुई, भाईसाहब उस समय तेल की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कीमत 138 बैरल थी जो आज 80 के आसपास है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में रुपया भी कमज़ोर हुआ है ।

तेल GST में नहीं आता है इसलिए केंद्र सरकार इस पर कोई फैसला नहीं ले सकती है। आप सुई से लेकर सैनेटरी  नैपकिन तक GST में ला सकते हैं, मगर तेल नहीं क्योंकि यह आपको 28% से ज़्यादा टैक्स प्रदान करता है।

अब इन बातों के बाद मुझे वामपंथी घोषित करने से पहले एक बार विचार कर लें और हां भक्त तो बिल्कुल भी नहीं हूं।

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