“जिस विश्वविद्यालय में ‘द्रोह’ ना हो, वह ‘देश’ के लिए खतरनाक है”

भारत में ‘विश्वविद्यालय’ और ‘एंटी-नेशनल’ हर जगह डिबेट का मुद्दा बना हुआ है। यह सफर एफटीआईआई (पुणे) और हैदराबाद(एचसीयू) से शुरू होकर, जाधवपुर और जेएनयू से होते हुए, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज; जामिया(नयी दिल्ली) और अब अलीगढ़ विश्विद्यालय तक पहुंच चुका है। ‘एंटी-नैशनल’ पर हो रही राजनीति से अलग, ये समझने की ज़रूरत है कि एंटी-नैशनल (देश-द्रोह) क्या है? उससे भी पहले, हमें यह भी समझना चाहिए कि नेशन (देश) क्या है? विश्वविद्यालय क्या है? फिर यह सवाल होना चाहिए कि विश्वविद्यालय का एंटी-नेशनल होना गलत है या सही है?

‘देश’ अर्थात नेशन की समझ राजनीति विज्ञान में ‘सांस्कृतिक’ है। प्रसिद्द विद्वान बेनडिक्ट एंडरसन ने देश को “इमेजिन कम्युनिटी” कहा। मतलब यह है कि कोई अनजान बिहारी व्यक्ति अगर फोन पर आपसे पंजाबी भाषा में बात करे तो आप निश्चित रूप से यह मान बैठते हैं कि वो आदमी पंजाब से होगा, बड़े बाल-दाढ़ी होंगे, भांगड़ा करता होगा, तो जो कुछ भी पंजाब की संस्कृति में है वो सब उसके साथ आप जोड़ देते हैं।

यह सही है कि नेशन एक ‘कल्चरल यूनिट’ होता है इसमें तमाम तरह के सांस्कृतिक पक्ष के साथ-साथ, रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वास भी होता है। ‘देश’ की समझ वहां के खान-पान, पहनावा-ओढ़ावा, भाषा-बोली, रीति-रिवाज़ से बनती है। ऐसे में भारत में हर 50-100 किलोमीटर पर एक अलग भाषा, रहन-सहन, खान-पान, पहनावा-ओढ़ावा, रीति-रिवाज़ मिल जाता है। इस तरह भारत में ही हर 50-100 किलोमीटर पर एक अलग ‘देश’ मिल जाता है।

परन्तु, हर ‘देश’ अपने-अपने ढंग से रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वास की जंज़ीरों में जकड़ा हुआ है। तो क्या भारत ‘देश’ नहीं है? यह सवाल बहुत गंभीर है। भारत में सांस्कृतिक विविधता है और इसके मद्देनज़र भारत को ‘देशों का देश’(नेशन ऑफ नेशंस) कहा जा सकता है। अगर भारत को ‘एक नेशन’ कहेंगे तो यह सवाल लाज़िमी होगा कि वो कौन सा ‘देश’ है जो भारत है।

भारत की संविधान-सभा जिसे संविधान रचने का ज़िम्मा मिला, संविधान की प्रस्तावना लिखने के समय “हम भारत के लोग(वी द पीपल ऑफ़ इंडिया)” के बदले “हम भारत देश के लोग(वी द नेशन ऑफ इंडिया)” मानने पर बहस हुई लेकिन बहस के दौरान भारत को एक ‘देश’ नहीं बल्कि कई देशों का संगम माना गया। यह समझा गया कि ‘लोग’ के बदले ‘देश’ होने से बाकि ‘देशों’ के लोगों को शायद प्रताड़ित या उनकी अनदेखी भी हो सकती है। ‘लोग’ होने से वो नागरिक मात्र ही माने जायेंगे और संविधान हर नागरिक के लिए बराबर का व्यवहार करेगा।

‘देश’; ‘राज’; एवं ‘राज्य’ को राजनीति विज्ञान में अलग-अलग समझा गया है। ‘देश’ एक सांस्कृतिक पक्ष है तो, ‘राज’ सरकार है या फिर उसका गवर्नेंस है वहीं ‘राज्य’ एक संप्रभु संस्था है जो एक भू-सीमा के अन्दर अपनी नीतियां लागू करने के लिए स्वतंत्र है तथा किसी और ‘राज्य’ को आंतरिक मामले में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से रोकता है। ‘देश’ तो किसी सीमा के अन्दर नहीं, पंजाब एक ‘देश’ है जो भारतीय-राज्य (इंडियन स्टेट) की भू-सीमा के अन्दर है तो वही ‘पंजाब एक देश की तरह’, कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी जैसे तमाम जगहों पर है। असल में ‘देश’ किसी भी ‘भू-सीमा’ से आज़ाद होता है।

अब यह समझना ज़रूरी है कि विश्वविद्यालय क्या होता है? विश्वविद्यालय एक ऐसी जगह होती है जहां आकर छात्र किसी भी तरह की पहचान की सीमाओं से परे, एक ऐसा ब्रह्माण्ड बनाना चाहते हैं जिसकी आत्मा ‘मानवीयता’ का सिद्धांत होता हो। हालांकि, यहां आने वाले लगभग हर छात्र एक अलग-अलग ‘नेशन (देश)’ का प्रतिनिधित्व करते हैं। विश्वविद्यालय उस छात्र के ‘देश’ में विद्यमान तमाम रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, अवैज्ञानिकता पर सवाल उठाने के लिए, उसे पहचानने के लिए, छात्रों में वैज्ञानिकता, तर्कशीलता का संचार करता है।

ऐसा आमतौर पर होता है कि हम अपने देश में रहते हुए भी, उस अमानवीयता को पहचान नहीं पाते हैं। जैसे एक अवैज्ञानिक व्यक्ति जातिय-उत्पीड़न को अपना भाग्य मान लेता है। उसके लिए यह समझना शायद मुश्किल होता है कि जाति प्राकृतिक नहीं बल्कि ब्राह्मणवाद की उपज है। विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकता को आत्मसात कर, छात्र वापस अपने ‘देश’ में जाते हैं और विश्वविद्यालय चाहता है कि, अर्जित किये हुए वैज्ञानिकता को प्रचारित-प्रसारित किया जाना चाहिए। अवैज्ञानिकता, रुढ़िवादिता, अंधविशवास से जकड़ा हुआ ‘देश’, इसे द्रोह की नज़र से देखने लगता है। विश्वविद्यालय जब ‘तर्क और वैज्ञानिकता’ की बात करता है तो शुरुआत में छात्र को भी असहजता होती है लेकिन तर्कशील होने पर वह खुद के ‘देश’ में फल-फूल रही कुरीतियों के खिलाफ ‘द्रोह’ कर देता है।

‘देश-द्रोह’ क्या है? ‘देश-द्रोह’ तो ‘देश’ में फैले अवैज्ञानिकता, रूढ़िवादिता और अंधविश्वास के खिलाफ होने वाला ‘संघर्ष’ है। ऐसे में भारत के पहला ‘देश-द्रोही’ तो महात्मा बुद्ध थे, जिन्होनें समाज में फैली कुरीतियों, अन्धविश्वास, जड़ता, अवैज्ञानिक के खिलाफ ‘द्रोह’ किया था। ग्रीक दार्शनिक सुकरात के ऊपर भी, युवाओं को भड़काने का तथा ‘देश-द्रोह’ का आरोप लगाकर उसे प्राणदंड दिया गया। युवाओं में ज्ञानशीलता, तर्कशीलता का संचार उसे भड़काना तो नहीं हो सकता। फिर कोई अपने बच्चों को विश्विद्यालय क्यूं भेजता है? क्या छात्रों को विश्वविद्यालय से वैसा ही भेज दिया जाना चाहिए जैसे वो आये थे?

शायद किसी की भी उम्मीद विश्वविद्यालय से यही होती है कि छात्र में वैज्ञानिक सोच, उसका सर्वांगीण विकास किया जाए। छात्र को लोग विश्वविद्यालय इसलिए भेजते हैं ताकि वह ‘द्रोह’ कर सके, गरीबी के खिलाफ, शोषण के खिलाफ, किसी भी तरह के अत्याचार के खिलाफ, एक बेहतर समाज के लिए विद्रोह करे, जातिवाद के खिलाफ, रूढ़ीवाद के खिलाफ, अन्धविश्वास के खिलाफ, धर्मान्धता के खिलाफ। वो अगर असल में न भी हो पाए तो कम से कम कल्पना भी करे ताकि वो कल्पना, कल हकीकत बन सके।

लेकिन सत्तावर्ग बड़ी चालाकी से ‘देश-द्रोह’ एवं ‘राज-द्रोह’ और ‘राज्य-द्रोह’ को अलग-अलग देखने के बजाय, एक ही चश्में से देखने लगा जबकि ये तीनों अलग-अलग विधाएं हैं। ‘देश-द्रोह’ ‘देश’ में फैली रुढिवादिता और अवैज्ञानिकता इत्यादि के खिलाफ संघर्ष है; तो वहीं ‘राज-द्रोह’ सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष है; और ‘राज्य-द्रोह’ सीमा के सिद्धांत से जन्में राज्य के खिलाफ संघर्ष होता है। ‘स्टेट’ व् राज्य के खिलाफ संघर्ष को, राजनीति सिद्धांत में कोई खास सहमति प्राप्त नहीं है। इसे अराजकता के दृष्टि से देखा जाता है। ‘राज-द्रोह’ पर अच्छा-खासा वैचारिक द्वन्द है। उदारवादी राज्य में भी सरकार के खिलाफ ‘द्रोह’ की मान्यता है। लेकिन ‘देशद्रोह’ न तो ‘राज-द्रोह’ है, न ही ‘राज्य-द्रोह’ है। यह वह ‘द्रोह’ है जिसकी ज़रूरत इसी समाज को है, उसी ‘देश’ को है। वर्तमान राजनीति ने इन तीनों को, एक ही नज़र से देखना शुरू कर दिया है क्यूंकि यह दिशाहीन राजनीति के लिए एक ढाल की तरह काम करने लगा है। देश से नीचे भी एक यूनिट होता है जिसे ‘देस” कहते हैं। बहरहाल, हम देस की संकल्पना को यहां नही ले रहे हैं।

अगर हम ऊपर वर्णित विचार को देखें और थोडा गंभीर होकर सोचें तो हमें आभास होगा कि विश्वविद्यालय और ‘देश-द्रोह’ को असल में एक दूसरे का पर्याय ही होना चाहिए। विश्वविद्यालय में ‘देश-द्रोह’ का मतलब देश में जड़ता, अवैज्ञानिकता, रुढिवादिता, अंधविशवास इत्यादि जैसी कुरीतियों को खत्म करने से ही है। अब अगर ऐसा होगा, तो देश में सत्ता-वर्ग का आहत होना लाज़मी है। शायद इसलिए भी कि किसी भी सत्ता-वर्ग के लिए समाज में फैली रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, संजीवनी की तरह काम करता है।

वर्तमान समय में विश्वविद्यालयों पर लग रहे आरोप, विश्वविद्यालय के स्थापना के सिद्धांत के दृष्टिकोण से सही हैं लेकिन ‘देश’ की छिछली समझ और ‘देश’ के राजनीतिकरण ने विश्वविद्यालय को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। विश्वविद्यालय तो विभिन्न ‘देशों’ के छात्रों के अलग-अलग पहचान के खिलाफ, ‘हम भारत के लोग’ अर्थात ‘नागरिक’; बनाने की प्रक्रिया में लगातर प्रयत्नशील रहता है। वही ‘नागरिक’ जो संविधान की प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ हैं न कि “हम भारत ‘देश’ के लोग।” विभिन्न ‘देशों’ के लोगों को एक जगह, एक संविधान के अंतर्गत लाने का काम कर रही है, एक मानवीय पहचान देने का काम कर रही है, यह ‘द्रोह’ भी तो उसी के लिए है। फिर यह कहना कि विश्वविद्यालयों में देश को तोड़ने की शिक्षा दी जा रही है, अनुचित है, तर्कविहीन है।

लोगों को विश्वविद्यालय के इस ‘द्रोह’ कार्य के लिए खुश होना चाहिए, तमगा देना चाहिए क्यूंकि तालाब का पानी स्थिर होता है तो पानी का गन्दा होना लाज़मी है। इसलिए किसी भी ‘देश’ को नदी के पानी तरह, गतिमान होना चाहिए, गतिशीलता ही तो जीवन है। विश्वविद्यालय में अगर ‘द्रोह’ नहीं हो रहा तो वह विश्वविद्यालय ‘देश’ के लिए सबसे खतरनाक है। ‘देश’ अगर बेहतर होना चाहता है तो ऐसे विश्वविद्यालयों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। मूल रूप से, विभिन्न ‘देशों’ में फैली कुरीतियों के खिलाफ ‘द्रोह’ होना चाहिए। दूसरे अंदाज में कहिये, तो विश्वविद्यालयों को ‘देश-द्रोही’ ही होना चाहिए। फिर से कह रहा हूं, गंभीरता से सोचिये तो ‘देश-द्रोह’; ‘राज्य-द्रोह’ या ‘राज-द्रोह’ तो कतई नहीं है।

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