“कुंवारापन परीक्षा” की मांग करने वाले समाज, तुम घटिया सोच से ग्रसित हो

“कुंवारापन परीक्षा” आखिर क्या है ये बला ? इसको अगर योनि परीक्षा भी कहा जाए तो कोई गलत नहीं होगा। आज भी भारत में कई जगहों पर संक्रीर्ण मानसिकता और तथाकथित पुरुषवादी मानसिकता से ग्रसित लोग योनि परीक्षा जैसे घटिया चीज़ों को बढ़ावा दे रहे हैं।

इसमें लड़की को शादी की रात यानी सुहागरात के दिन उसके कुंवारेपन की परीक्षा देनी पड़ती है। परीक्षा ये होती है कि पहली रात लड़का-लड़की के बेड पर सफेद चादर बिछाया जाता है, संबंध बनाने के दौरान खून के धब्बों का पता लगाने के लिए। अगर लड़की की योनी से खून ना निकले तो ये मान लिया जाता है कि लड़की ने शादी से पहले किसी मर्द के साथ संबंध बनाया है।

इस दौरान तथाकथित समाज के साथ ही लड़की का बाप और भाई भी ये सोच कर परेशान रहता है कि उनकी बहन, बेटी इस कुंवारेपन की परीक्षा में खरी उतरती है या नहीं ?

पूरा समाज चीख-चीख कर पूछता है माल खरा है या खोटा ? किसी लड़की के लिए ‘माल’ कितना गलीच शब्द है ना ? जिसने भी इस घटिया रिवाज़ को बनाया होगा और जिन ग्रंथों का हवाला देकर इस रिवाज़ को आगे बढ़ाया जा रहा है उसकी मानसिकता कितनी नीच है इसका अंदाज़ा आप लगा ही सकते हैं।

बाद में खून के धब्बे वाली चादर को पूरे समाज में दिखाकर लड़की को परीक्षा में पास होने का पदक दे दिया जाता है।

चादर में खून के धब्बे नहीं पाए जाने पर कई जगहों पर लड़की के शुद्धिकरण का ढकोसला किया जाता है और पूरे समुदाय के सामने कपड़े उतारकर उसे मारा जाता है और फिर दूध से नहलाया जाता है।

मैं इस ढकोसले वाले समाज से पूछती हूं कि तुम्हें कब अक्ल आएगी कि पहली बार संबंध बनाते समय लड़की की योनि से खून आने या ना आने का संबंध किसी और के साथ सेक्स करने या ना करने से है ही नहीं। और अगर ऐसा होता भी तो तुम ये सवाल या ये परीक्षा पुरुषों के साथ क्यों नहीं करते ?

कभी आपने सुना है कि लड़के को शादी के बाद अपने कुंवारेपन की परीक्षा देनी पड़ी हो। एक तरफ तुम लिंग की, योनि की पूजा करते हो, शिवलिंग की पूजा करते हो, देवियों के मासिक धर्म का उत्सव मनाते हो और दूसरी तरफ इस तरह के चोंचले करते हो। जिस योनि से निकले तुम उसी पर सवाल खड़ा करते हो।

कहां से आई तुम्हारे अंदर इतनी नीचता, अरे भगवान ने भी मनुष्य निर्माण के दौरान स्त्री पुरुषों में अंतर नहीं देखा। उसने एक ही मिट्टी से दोनों को बनाया है।

जो लोग सोचते हैं मैं स्त्रीवादी हूं तो हां हूं मैं स्त्रीवादी। स्त्री के साथ अगर अन्याय होगा तो मैं ज़रूर उसके खिलाफ लिखूंगी। और हां, अगर कभी किसी पुरुष के साथ अन्याय होगा तो मैं उसके खिलाफ भी लिखूंगी।

मेरा दिमाग महसूस करता है, मेरे हाथ लिखते हैं और मेरी कलम आवाज़ उठाती है। गलत चीज़ों के खिलाफ, अन्याय के खिलाफ।

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