मोदी सरकार की 4 सालों से पाकिस्तान कूटनीति क्यों विफल हो रही है

Posted by Chandan Bharadwaj in Hindi, Politics
June 18, 2018

2014 के लोकसभा चुनाव में चुनावी मंचो से जब नरेंद्र मोदी पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात करते थे तो उनकी चुनावी जनसभा में मौजूद हुजूम पूरे जोश के साथ उनका समर्थन करता था। “एक सर के बदले दस सर” लाने की बात करके मोदी देश की जनता के बीच अपना 56इंच का सीना लेकर देश के प्रधानमंत्री बने।

अपने शपथग्रहण समारोह में सार्क देशों के शासकों को निमंत्रण देकर उन्होंने अपनी कूटनीति का परिचय देने का काम किया। गर्मजोशी के साथ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का स्वागत करते हुए उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी जी की कूटनीति को अपनाने का प्रयास किया लेकिन आदत से मजबूर पाकिस्तान ने विश्वासघात के रूप में पठानकोट के आर्मी बेस पर आतंकवादी हमला कर दिया।

भारत ने पाकिस्तानी एजेंसी को पठानकोट में बुलाकर उनके द्वारा पाले-पोसे आतंकवादियों की करतूत के सबूत देने का काम किया लेकिन देश में मोदी सरकार के इस कदम की जमकर आलोचना हुई और इसी घटनाक्रम के साथ सरकार ने निर्णय लिया कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ संभव नहीं है और इसी के साथ दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार की औपचारिक वार्ता पर तात्कालिक तौर पर पूर्ण विराम लग गया।

2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से सरकार द्वारा लोकसभा में दिये गये आधिकारिक आंकड़ो के हिसाब से वर्ष 2014 में कुल 153 बार पाकिस्तान की तरफ से संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया है। वही 2016 में 449 बार जिसमें 13 सुरक्षाबल के जवान और 15 आम नागरिकों की जान गई है। वही वर्ष 2017 में संघर्ष विराम के उल्लंघन में बीते 10 सालों में रिकॉर्ड वृद्धि यानि 230 प्रतिशत का इज़ाफा देखा गया है। मतलब की 771 बार।

ये आंकड़े इस बात की पुष्टि करने के काफी हैं कि एक सर के बदले 10 सर की बात चुनाव के दौरान शायद केवल चुनावी जुमला था। पाकिस्तान के साथ संबंधों पर देश के पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी जी ने शत-प्रतिशत सही कहा था, “आप अपने दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं “

भारत के साथ बीते 4 वर्षों में जब भी बातचीत की कोशिश की गयी है तब पाकिस्तान का हुर्रियत प्रेम और पाकिस्तान हाई-कमीशन का हुर्रियत के नेताओं से वार्ता से पहले मिलने का भारत ने शुरू से विरोध किया है और कारण स्वरुप वार्ता टलती गयी है। मोदी सरकार के पुरज़ोर विरोध के बावजूद पाकिस्तान चीन के साथ मिलकर भारत के कश्मीर का वो हिस्सा जो पाकिस्तान ने कब्ज़ा कर रखा है उससे होते हुए “चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर” बनाने का निर्णय ले लिया और इसने दोनों देशों के रिश्तों में आग में घी डालने के काम किया।

परंतु यहां मोदी सरकार ने भी अपनी कूटनीतिक योग्यता का परिचय देते हुए ईरान के छाबहार में अपने लिए पोर्ट बनाने का काम शुरू कर पाकिस्तान की घेराबंदी का प्रयास किया। शंघाई सहयोग संगठन की वार्षिक बैठक में जब दोनों देशों के प्रधानमंत्री मिले तो दोनों के बीच सम्बन्ध सुधारने की एक गर्मजोशी देखी गयी परंतु आदत से मजबूर पाकिस्तान ने गुरदासपुर में फिर हमला कर दिया और प्रस्तावित वार्ता फिर टल गई।

वर्ष 2015 में काबुल में अफगानिस्तान की संसद का उद्घाटन करने के बाद पूरे विश्व को चौंकाते हुए मोदी बिन बुलाए मेहमान की तरह एक नई शुरुआत के इरादे से 25 दिसंबर को नवाज़ शरीफ के पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल हुए और ऐसा लगा सब ठीक करने की शुरुआत में ये ऐतिहासिक कदम होगा। परंतु एक बार फिर पाकिस्तान ने धोखा देते हुए सीमा पर जवानों की हत्या कर दी।

हम यह नहीं कह सकते कि मोदी सरकार ने सम्बन्ध सुधारने के प्रयास नहीं किये परंतु जिस तरह सीमा पर पाकिस्तान के द्वारा लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन होता रहा है यह यह ज़रूर दर्शाता है कि पाकिस्तान को लेकर सीमा के मोर्चे पर कूटनीति द्वारा स्थिति को शांत करने में सरकार के हाथ विफलता अवश्य लगी है।

पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि अभी तक के कार्यकाल में “सर्जिकल स्ट्राइक” रही है। पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक कर भारत ने विश्व में यह संदेश देने का काम किया है कि बर्दाश्त की भी एक सीमा होती है और देश अपने दुश्मनों को उनकी भाषा में जबाव देने के लिए पूरे तौर पर सक्षम हैं। कश्मीर के मसले को किसी भी स्थिति में भारत पाकिस्तान के संबंधों से हटाया नहीं जा सकता और सत्य यह भी है कि विगत 4वर्षो में कश्मीर में स्थिति सुधरने की बजाये समय-समय पर बिगड़ते रहे हैं।

घाटी में जिस तरह पत्थरबाज़ी, हिंसा, आतंकवादी घटना बढ़ी है, इसमें कोई दो राय नहीं की सरकार जब तक पाकिस्तान के साथ बातचीत का कोई रास्ता नहीं निकालती है तब तक कश्मीर में शांति भी पूर्ण रूप से संभव नहीं है। हालही में सरकार द्वारा कश्मीर के लिए दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार के रूप में नियुक्त करना कश्मीर की स्थिति को सुधारने के लिये अच्छे कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

सारांश यह लिखा जा सकता है कि भारतीय नेतृत्व पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर एक दुविधा की स्थिति में है और वो उस रास्ते को विगत 4वर्षों में तलाशने में विफल रहा है, जिससे बातचीत को शुरू किया जा सके और दूसरा व सबसे महत्वपूर्ण कि जब-जब देश की तरफ से नई पहल की गयी है तब-तब पाकिस्तान की तरफ से जबाव के रूप में आतंकवादी हमला या सरहद पर संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया है जिससे बातचीत के सभी द्वार बंद हो गए हैं।

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