किसान मुश्किल में हैं, उन्होंने शौक से बंद नहीं बुलाया है

पूरे देश के सात राज्य मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में आज किसानों के “गांव बंद” कहे या “किसान अवकाश” का दूसरा दिन है। किसानों ने कर्ज़ माफी के साथ, अनाज की कीमत का भुगतान स्वामीनाथन आयोग के सिफारिश के हिसाब से किया जाने, किसानों की ज़मीन कुर्क के जो नोटिस भेजे गए हैं वो वापस लिए जाने, दूध के लिए कम से कम 27 रुपये प्रति लीटर का भुगतान और फलों व सब्ज़ियों का न्यूनतम मूल्य तय किए जाने की मांग की है। इन मांगों के साथ किसानों ने केंद्र की किसान विरोधी कथित नीतियों के खिलाफ इस “गांव बंद” या “किसान अवकाश” आंदोलन की शुरुआत की है।

किसानों का दस दिनों का “गांव बंद” सिरे से मीडिया के बहसों से गायब है, कल सारा दिन मीडिया और सोशल मीडिया सीता माता पर टेस्ट ट्यूब बेबी, अधेड़ प्रोफेसर के डांस, कैराना के हार पर गलत बयानी को वायरल बनाता रहा।

नींद तब टूटी जब मंडियों में फलों, सब्ज़ियों और दूध के कम आवक से एक ही दिन के भीतर इनके दामों में बढ़ोतरी हुई। कमोबेश सारे न्यूज़ बेवसाइट और मुख्यधारा के अख़बार, चैनल सबों में एक सी ही छवी दिखाई जा रही है, किसान सड़कों पर दूध फेंक रहे है, किसान अपनी सब्ज़ियां फेंक रहा है।

यह एक नैरेटिव सेट किया जा रहा है आंदोलन के खिलाफ कि आपके बच्चे दूध के लिए मोहताज हैं और किसान दूध सड़क पर बहा रहा है? आगे रहकर यह बताने का प्रयास तक नहीं है कि ऐसा किसान कर क्यों रहा है? ज़ाहिर है किसान की बात या मांगों पर बहस सिरे से गायब है। कहीं भी यह सवाल नहीं है कि किसानों को इस तरह सड़कों पर क्यों आना पड़ा? क्यों “गांव बंद” आंदोलन करना पड़ा? और “गांव बंद” आंदोलन क्या है?

पिछले दफे जब महाराष्ट्र के किसान पैदल मार्च करते हुए मुबंई में जमा हो रहे थे तब घिसी हुई, मरम्मत की हुई चप्पलें, फटी हुई एड़ियां, सूखे खेतों की धूल, बदरंग होते कपड़े, माथे पर गहरी पड़ती लकीरें, धीमी चाल चलता आसमान की ओर ताकता किसान सोशल मीडिया पर हैशटैग के साथ खूब दिखाया गया था पर इस दफा वो भी खामोश है। क्या सच में किसान की तकलीफ हमारे आधुनिक समाज में महत्व नहीं रखती?

आधुनिक समाज में मुंह फेर कर खड़े रहने के कारण “गांव बंद” आंदोलन पर कृषि मंत्री ने “पब्लिसिटी स्टंट” का बयान ज़रूर दिया “मीडिया में आने के लिए अनोखे काम करने पड़ते हैं, देश में करोड़ों किसान है मीडिया में आने के लिए अनोखे काम करने पड़ते हैं।” यह बेहद शर्मनाक है किसानों की बदहाली का भद्दा मज़ाक बनाने की कोशिश भी है। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने कहा कि “उनके पास कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए वो इसतरह का रास्ता अपना रहे हैं। सामान ना बेचकर किसान अपना ही नुकसान करेगें।” गौरतलब हो, कि मुंबई में किसानों के जमावड़े पर शहरी समाज के समर्थन में उतर जाने से महाराष्ट्र सरकार घुटने पर आ गई थी।

किसानों की मांगों को समझने की कोशिश करें तो उनकी प्रधान मांग है कि उनको अपनी पैदावार का उचित दाम मिले जिसकी बातें स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें भी करती हैं। गौरतलब है कि 2006 में सरकार को सौंपी गई स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट, फसल उत्पादन मूल्य से पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम, अच्छे गुणवता वाले बीज कम दामों पर मिले, किसानों के लिए चौपाल, महिला किसानों के लिए क्रेडिट कार्ड, प्राकृतिक आपदा के लिए कृषि जोखिम फंड, खेतीहर ज़मीने और वनभूमि को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए ना दिए जाने की सिफारिश के साथ, खेती करने के लिए कर्ज़ की व्यवस्था कम ब्याज़ दरों पर उपलब्ध कराने की बात करता है।

इन सिफारिशों से यह समझ में आता है कि ये ऐसी मांगे है जिनके पूरा होने के बाद अन्य मांगे मसलन, “कर्ज़ माफी” का महत्व खत्म हो जाता है। क्योंकि इन सिफारिशों के सही तरीके से ज़मीन पर उतरते ही किसान खुद ही कर्ज़ चुकाने में समर्थ हो जाएंगे। वैसे भी देश के बैंकों की 13 खरब डॉलर की पूंजी डूबने के बाद देश किसानों की कर्ज़ माफी के स्थिति में है भी नहीं।

हां, किसानों की “कर्ज़ माफी” के मामलों का एक राजनीतिक जुमला अगले चुनावों के लिए ज़रूर बन सकता है कि जब जिओ सीम के आने से एयरटेल, आइडिया और वोडाफोन को नुकसान हुआ है, तो उन्हें स्पेकट्रम शुल्क माफ किया जा सकता है, लेकिन किसानों का कर्ज़ा माफ नहीं किया जा सकता है।

वास्तव में, किसानी के लिए ज़रूरत इस बात को समझने की भी है कि किसानों को खेती से कोई न कोई तरीका इंजाद करना ही पड़ेगा जिसमें कर्ज की जरूरत ही नहीं पड़े। क्योंकि कैश क्रॉप(नगदी फसल, जिस जगह की जमीन है, उस जगह की प्रकृत्ति के विपरीत फसलों को पैदा करने का तरीका) के नाम पर जो व्यवस्था कायम की जा रही है वह किसानों को कर्ज़ की तरफ ढकेल रही है।

इस वक्त किसानों की सबसे बड़ी ज़रूरत है कि उनको फसलों के उत्पादन का उचित भाव मिले। जो भी भाव तय हो, उस भाव पर फसल बाज़ार में बिके। उसको बाज़ार में व्यापारी फायदा उठाकर कम दाम पर बेचने के लिए मजबूर न करें।

सरकारों को यह भी समझना ज़रूरी है कि पशुधन के धीरे-धीरे खत्म होने पर, पशुधन पर आधारित किसानी जीवन-यापन भी चौपट हो चुका है। इसलिए अनाज पर उचित मूल्य ही उनके जीवन-यापन का मुख्य ज़रिया मात्र है।

प्रकृति के मिज़ाज से लड़ता किसान, क्योंकि प्रकृति कभी भी उसके नियम से नहीं चलती, सरकारों की बनाई व्यवस्था भी उसके प्रतिकूल नहीं रहती, किसानों को किसानी के लिए इससे भी लड़ना-भिड़ना पड़ता है, किसान की मौजूदा परिस्थितियों को दुरुस्त करने के लिए सरकारों को स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को गंभीरता से लागू करना होगा, क्योंकि यही एक मात्र विकल्प किसानी की समस्या को फौरी राहत दिला सकता है।

खेती पर लगातार बढ़ते बोझ और लागत से कम मुनाफा, बदलते मौसम की चुनौतियों और आर्थिक नीतियों में निजी क्षेत्रों को प्राथमिकता मिलने वाले दौर में किसानों के हितों को समझना भी जरूरी है। देश को यह महसूस करना ज़रूरी है कि किसानी और किसान दोनों ही मुश्किल में है।

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