इंटरनेट, सिनेमा और कपड़ाफार ऑडियंस

Posted by Mayank Jha in Art, Hindi
July 4, 2018

सिनेमाघरों में जाने से पहले ही ईद पर आपको सोशल मीडिया पर काफी हिदायतें मिल चुकी होंगी। ज़ाहिर है इंटरनेट वाले कलयुग में लोगों के लिए प्रतिक्रिया देना और खुद को अभिव्यक्त करना बेहद आसान हो गया है।

इस बतकही के दौर में सिनेमा देखना भी अपने आप में एक संघर्ष है। आपको लगता है कि फलां फिल्म अच्छी होगी, आप टिकट के पैसे जोड़कर इंतज़ार कर ही रहे होते हैं कि बुधवार को टिकट के दाम सस्ते होंगे कि तभी फर्स्ट डे फर्स्ट शो वाले बुद्धिजीवी इंटरनेट पर चरस बो देते हैं।

आप भी सोचते होंगे कि छोड़ो यार टोरेंट पर अच्छी क्वालिटी आएगी तो डाउनलोड कर लेंगे, और इस तरह हॉल में बैठकर सिनेमा देखने की वो चेतना मर सी जाती है। इत्तफाक से कुछ दिनों पहले बिहार के मुज़फ्फरपुर जाना हुआ। ईद का दिन था और भाई की पिक्चर लगी थी। सिनेमा के बारे में लोग चरस बो चुके थे इसलिए सिनेमा से उम्मीद थी भी नहीं। मगर 30 रूपये का टिकट और ईद के दिन भाई की मूवी देखने के उस बकेट लिस्ट चैलेंज की वजह से मजबूर होकर ब्लैक में 40 रूपये की एक बालकनी टिकट खरीद ली।

हॉल के अंदर घुसते ही खड़-खड़ करते पंखे की आवाज़ और शर्ट उतारकर हवा में लहराते ऑडियंस को देखकर रियलिटी चेक मिला कि पटना की मल्टीप्लेक्स वाली दुनिया थोड़ी पीछे रह गयी है। किसी तरह सीट मिली मगर सिनेमा के परदे की बजाय लोगों के उठते गिरते गर्दनों की झलक ज़्यादा स्पष्ट थी।

चूंकि सिनेमा अपने ट्रेलर की तरह ही लाजवाब थी तो ऑडियंस को ऑब्ज़र्व करना ज़्यादा बेहतर लगा। काफी कुछ जानने और समझने को मिला उन तीन घंटो में। मसलन, भले ही इंटरनेट पर फेमिनिज़्म आ चुका हो मगर आज भी हीरो-हीरोइन के आलिंगन मात्र से लोगों की सांसें चढ़ जाती हैं और रंग बिरंगी महिला विरोधी गालियां अपनी छटा बिखेरने लगती हैं।

हम कितना भी 2001 स्पेस ओडिसी देखकर खुद को दिलासा दे लें कि हां इक्कीसवीं सदी आ चुकी है मगर आज भी ज़्यादातर लोग भाई के डायलॉग्स पर सिक्के उछालते हैं। इसमें कुछ गलत तो नहीं है मगर रियलिटी चेक ज़रूर मिल जाता है कि ज़्यादातर आबादी अभी भी अच्छे साहित्य और अच्छी फिल्मों से महरूम है। बेशक ये इंटरनेट का दौर है मगर चलाने वाले आज भी हम और आप ही हैं।

मगर ये उम्मीद है कि वो दिन के जिसका वादा है, जो लौह-ए-अज़ल में लिखा हो या नहीं मगर हम सबके मानसपटल पर अंकित है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अच्छा साहित्य और अच्छा सिनेमा पहुंचेगा। और हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे।

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