धड़क रिव्यू: सैराट को भूलकर मूवी देखने जाइए, जाह्ववी और ईशान आपका दिल जीत लेंगे

Posted by Shikhrani Raghvendra in Art, Hindi, Media
July 21, 2018

जब से फिल्म धड़क का ट्रेलर जारी हुआ था, तब ही से इसकी तुलना मराठी फिल्म सैराट से की जाने लगी थी। हैरानी की बात तो ये है कि धड़क पहली बॉलीवुड फिल्म नहीं है जो किसी दूसरी भाषा की हिट फिल्म का हिंदी रीमेक हो। लेकिन, सोशल मीडिया के ज़माने में फिल्म की रिलीज़ से पहले ही सैराट के प्रेमियों ने हाय-तौबा मचाई दी। मैंने सोचा था कि धड़क से पहले सैराट देख ली जाए लेकिन, बाद में एहसास हुआ कि वो धड़क के साथ नाइंसाफी होगी।

फिल्म की कहानी उदयपुर की खूबसूरती से शुरू होती है और मुंबई से होते हुए कोलकाता की गलियों में खत्म हो जाती है। अगर आपने फिल्म का ट्रेलर देखा है तो आपको फिल्म के पहले भाग में कुछ नयापन नज़र ही नहीं आएगा। क्योंकि गानों से लेकर डायलॉग तक जो कुछ भी आपने ट्रेलर में देखा वो सभी इंटरवल से पहले की झलकियां हैं। दूसरा भाग दिलचस्प तो है लेकिन, उसमें मनोरंजन की कमी खलने लगती है, क्योंकि धड़क जिस गति से पहले भाग में दिलों को धड़काती है, दूसरे भाग में धीमी पड़ जाती है।

कहानी में कुछ नया नहीं है। अमीर लड़की और गरीब लड़के के बीच प्रेम कहानी बॉलीवुड में सदियों पुरानी है लेकिन, यहां “ऊंची जाति की लड़की और नीची जाति का लड़का” वाला फॉर्मूला अपनाया गया है। हालांकि इसका एहसास आपको फिल्म में मधुकर बगला के पिताजी के डायलॉग से ही हो पाता है। इस तरह की कहानियां आप आये दिन अखबारों में पढ़ने के साथ-साथ छोटे पर्दे पर क्राइम-पेट्रॉल और सावधान इंडिया जैसे शोज़ में देखते रहते हैं।

शशांक खेतान ने फिल्म की कहानी भी लिखी है तो निर्देशन की कमान भी संभाली है। लेकिन इस बार दोनों ही जगह वे कहीं ना कहीं दर्शकों का दिल जीतने में कामयाब नहीं हो पाए। फिल्म की यूएसपी है बॉलीवुड में कदम रखने वाले दो नए चेहरे। जहां श्रीदेवी की बेटी जाह्नवी कपूर ने पार्थवी सिंह का किरदार निभाया है तो वहीं मधुकर बागला के रोल में शाहीद कपूर के छोटे भाई ईशान खट्टर नज़र आये हैं।

अदाकारी की बात करें तो दोनों ने ही अपने किरदारों को जिस मासूमियत से निभाया है वो दर्शकों का मन जीत लेती है। फिल्म में जितनी खूबसूरती से उदयपुर को दिखाया गया है, उतनी ही खूबसूरत जाह्नवी लगी हैं और अमीर बाप की खूबसूरत घमंडी बेटी पार्थवी के किरदार में उन्होंने जान फूंक दी है। जाह्नवी में स्टार क्वालिटी है, यदि उन्होंने सही फिल्मों का चयन किया तो अदाकारी के मामले में उन्हें श्रीदेवी बनने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा।

ईशान अपनी अदाकारी का लोहा अपनी पहली ही फिल्म ‘बियॉन्ड दी क्लाउड्स’ में मनवा चुके हैं और प्यार में पागल-मजनू मधुकर के रोल को भी उन्होंने बखूबी निभाया है। लेकिन वो आपको बार-बार शाहिद कपूर की याद दिलाएंगे और ये उनके फिल्मी सफर के लिए भारी पड़ सकता है।

शाहिद कपूर ने भी अपने करियर की शुरुआत में बहुत सारी टीनएज लव स्टोरीज़ वाली फिल्में ही की थी और वो टाइपकास्ट हो गए थे। उस छवि को बदलने में उनको सालों लग गए थे। ठीक उसी तरह जब धड़क की कहानी पांच साल आगे बढ़ती है, तो जिस मेच्योरिटी की ज़रूरत किरदार को थी वो ईशान के चेहरे पर दिखाई नहीं पड़ती है। यहां जाह्नवी बाज़ी मार जाती हैं, क्योंकि भले ही फिल्म देखने जाते समय आपके दिमाग में श्रीदेवी की बेटी का ख्याल आये लेकिन, धड़क के ज़रिये वो एक अलग छाप छोड़ती हैं।

सह-कलाकारों में आशुतोष राणा अपनी दमदार अदाकारी से आपका ध्यान खींचते हैं और उनके किरदार के ज़रिये जो फिल्म में राजनीति दिखाई गयी है वो दिलचस्प है। अंकित बिष्ट और श्रीधर वत्सर ने मधुकर के दोस्तों के किरदारों को अच्छे से निभाया है और बाकी कलाकारों ने भी अपने किरदारों को ईमानदारी से निभाया है।

मैंने सैराट तो नहीं देखी लेकिन, फिर भी इतना ज़रूर कह सकता हूं कि सैराट को धड़क बनाने के लिए जितने भी प्रयोग किये गए वो शायद सफल नहीं हो पाए। उदहारण के तौर पर, सैराट मराठी पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसे मराठियों ने खूब पसंद किया। यहां धड़क को महाराष्ट्र से उठाकर राजस्थान तो ले आया गया लेकिन, कोई भी राजस्थानी इस कहानी से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता। मैं खुद एक राजस्थानी हूं और जिस तरह की राजस्थानी भाषा का प्रयोग फिल्म में किया गया है, वह भाषा राजस्थान के किसी भी क्षेत्र में नहीं बोली जाती।

यदि फिल्म में राजस्थान ही दिखाना था तो उदयपुर जैसे बड़े शहर को छोड़कर किसी छोटे कसबे को चुना होता तो शायद राजस्थान के दर्शक फिल्म से जुड़ाव महसूस कर पाते। इस मामले में मेरी पसंद फिल्म पार्च्ड रहेगी, जिसने पिछले कुछ सालों में अपनी फिल्म के ज़रिये राजस्थान के एक क्षेत्र रंग को बखूबी दिखाया था।

दूसरा जिस बेबाकी से सैराट में ‘जाति के आधार पर समाज में भेदभाव’ के मुद्दे को उठाया है, विवादों से बचने के लिए धड़क के निर्माता-निर्देशकों ने उसे प्राथमिकता ही नहीं दी है और शायद इसीलिए लोग सही कह रहे हैं कि ‘धड़क कभी सैराट’ नहीं बन सकती। मेरा मानना है कि धड़क को सैराट बनने की ज़रूरत भी नहीं है, क्योंकि काफी समय बाद एक ऐसी फिल्म आयी है, जिसे आप पूरे परिवार के साथ बैठकर सहजता से देख सकते हैं। ये फिल्म आपको हंसाएगी, रुलाएगी और आपका मनोरंजन करने के साथ-साथ एक अहम सन्देश भी देगी।

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