यौन हिंसा को जड़ से खत्म करने के लिए उसके समाधान पर बात करनी ज़रूरी है

बलात्कार, रेप, यौन शोषण जैसे तमाम शब्द पढ़ने और सुनने में भले आसान लगते हैं, लेकिन इनकी पीड़ा उतनी ही कठोर होती है। जिस लड़की को इस पीड़ा का दंश झेलना पड़ा हो, केवल वही इसे समझ सकती है। बाकियों के लिए तो ये शब्द बस एक खबर बन कर रह जाते हैं।

मीडिया से लेकर समाज तक हर कोई इसके बारे में ‘अंदर की बात’ जानने को बेताब होता है। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं जिसने यह दंश झेला है, उसके मन-मस्तिष्क पर क्या बीतती होगी। सचमुच कितने स्वार्थी, कितने संवेदनहीन हो गये हैं हम सब ना। हर बार जब ऐसी कोई घटना घट जाती है, तो हम सब अपने-अपने तरीके से उसके पीछे के कारणों की पड़ताल करने में जुड़ जाते हैं। कुछ लोगों को लड़कियों के छोटे कपड़ों में बलात्कार की वजह नज़र आती है, तो कुछ उनके रात में अकेले घर से निकलने को इसकी वजह करार देते हैं। हर किसी की इस बारे में अपनी-अपनी राय होती है। इनमें से कौन सही है और कौन गलत, यह कहना मुश्किल है। फिर भी सच्चाई तो यह है कि तमाम बंदिशों के बावजूद ऐसी घटनाएं रुकने के बदले लगातार बढ़ती ही जा रही हैं।

वर्तमान में देश का ऐसा कोई राज्य, ज़िला, गांव, कस्बा या मोहल्ला शायद ही बचा हो, जहां किसी लड़की के साथ बलात्कार ना हुआ हो। अभी हाल ही में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन द्वारा हुए सर्वे में महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न और उन्हें सेक्स वर्कर के धंधे में जबरन धकेलने के कारण भारत को सबसे असुरक्षित देश माना गया है। 2011 में इसी सर्वे में भारत चौथे स्थान पर था, जबकि इस बार भारत का पहले पायदान पर पहुंच गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2007 से 2016 के बीच महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध में 83 फीसदी का इज़ाफा हुआ है। यहां हर घंटे में 4 रेप के मामले दर्ज किये जाते हैं।

मुझे लगता है अब तक इस तरह की घटनाओं के कारणों के बारे में काफी चर्चा हो गयी। अब वक्त है इसके समाधान के बारे में सोचने का, ताकि इसे जड़ से खत्म किया जा सके।

दरअसल, शोषण किसी भी तरह का और किसी के भी साथ हो, उसकी मूल वजह एक विशेष प्रकार की मानसिकता होती है। जिससे वशीभूत होकर एक इंसान दूसरे इंसान को अपने अधीन या अपने नियंत्रण में करना चाहता है। अब तक भारतीय समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे का स्थान दिया जाता रहा है (ऋगवैदिक काल के अपवादों को छोड़कर)। ऐसे में जब-जब महिलाओं ने अपनी स्वतंत्रता का आनंद लेना चाहा या फिर अपने अधिकारों का उपयोग किया, तब-तब उसे इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ा। फिर चाहे वह द्वापर युग की द्रौपदी हो या फिर कलयुग की निर्भया।

आखिर इस पुरुषवादी समाज के तथाकथित ठेकेदार यह बर्दाश्त कैसे कर सकते हैं कि जिस स्त्री को अब तक वे ‘अबला’,  ‘कमज़ोर’, ‘निर्भर’ और ‘अपने पैरों की जूती’ के तौर पर ट्रीट करके अपने पुरुष होने का दंभ भरते आये हैं, वह आज उनके सामने उससे आगे कैसे निकल सकती है? कैसे वह अपने दम पर अपनी एक नयी पहचान बना सकती है? अपनी इस ‘क्षोभ’ और ‘कुंठा’ को दूर करने का उन्हें बस एक ही उपाय नज़र आता है और वह है- स्त्री की अस्मिता पर प्रहार करना।

क्योंकि इस ‘तथाकथित बुद्धिजीवी’ समाज की इज्ज़त उसके परिवार की महिलाओं के निजी अंगों पर जो टिकी होती है। तभी तो एक पुरुष चाहे जितनी भी अय्याशी कर ले, उससे परिवार की इज्ज़त नहीं जाती, लेकिन एक स्त्री के सिर पर ढंका पल्लू अगर सरक कर कंधे पर भी आ गया, तो इसमें उसकी बदनामी हो जाती है।

यही वजह है कि जिस महिला के साथ रेप होता है, वह खुद को ‘अशुद्ध’, ‘अनुपयोगी’ और ‘बेकार’ समझने लगती है, मानों उससे ही कोई पाप हो गया है। जबकि सच तो यह है कि उसकी कोई गलती होती ही नहीं है।

अगर सबसे ज़्यादा ज़रूरत किसी चीज़ की है, तो वह है ऐसी मानसिकताओं को बदलने की। यह समझने और इस बात को स्वीकार करने की कि घर की इज्ज़त का जितना दारोमदार घर की बेटियों के कंधे पर टिका है, उतना ही बेटों पर भी इसकी जबावदेही बनती है। इसलिए बेटियों के साथ-साथ बेटों को भी संस्कारवान बनाने की ज़रूरत है। उन्हें अपने विपरीत लिंग का सम्मान करने और उनके प्रति संवेदनशील बनाने की ज़रूरत है। उन्हें सेक्स एजुकेशन देने के साथ-साथ सेक्स सेंसेटिव बनाने की भी ज़रूरत है, ताकि वे एक-दूसरे की फीलिंग्स और इमोशन्स को भली-भांति समझ सकें और उनका सम्मान कर सकें।

चाहे लड़का हो या लड़की, मां-बाप को चाहिए कि बचपन से ही उन्हें एक-दूसरे से इंटरैक्ट करने का पूरा मौका दें, ताकि उन्हें एक-दूसरे को समुचित रूप से जानने का अवसर मिले। जैसे-जैसे उनके बीच की जिज्ञासाएं अौर झिझक दूर होती जायेंगी, वैसे-वैसे वे एक-दूसरे को नॉर्मल ह्यूमन बींग की तरह ट्रीट करेंगे।

रेप और यौन शोषण के मामलों के प्रति एक ओर जहां हमारे समाज में संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है, वहीं  मीडिया ने तो संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही लांघ दी है। कितनी निर्ममता से वह ऐसी खबरों को चटपटा और मसालेदार बनाकर पेश करने में लगा रहता है, ताकि उसकी टीआरपी या फिर सर्कुलेशन बढ़ें। माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जिस लड़की के साथ रेप होता है, उसकी तस्वीर या उसकी असली पहचान उजागर करना मना है, लेकिन इसके अलावा बाकी वह सब कुछ उजागर कर दिया जाता है, जो आये दिन उसके ज़ख्मों पर नमक छिड़कने का काम करता है। जबकि होना तो यह चाहिए कि पीड़िता के बजाय आरोपी के अगले-पिछले जन्म का कच्चा चिट्ठा उजागर किया जाना चाहिए, ताकि लोग उसके कुकृत्यों से वाकिफ हो सकें और उसे अपना मुंह छिपाने की ज़रूरत पड़े ना कि पीड़िता को।

महिलाओं के साथ होनेवाले अत्याचार के खिलाफ भले अब तक सैकड़ों तरह के कानून बन चुके हों, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कड़ाई से उनका पालन आज भी नहीं हो पा रहा है। देश के किसी भी कोर्ट की फाइलें पलट लीजिए, वहां आपको रेप, यौन-उत्पीड़न, दहेज-हत्या/प्रताड़ना, शोषण आदि से संबंधित हज़ारों ऐसे केसेज़ मिल जायेंगे, जो सालों से पेंडिंग पड़े हैं। निर्भया केस इसका एक ताज़ातरीन उदाहरण है। ज़रूरत है ऐसे मामलों की तत्काल सुनवाई करने की, ताकि पीड़िता को समुचित न्याय मिल सके और समाज को एक सीख।

कई लोगों का कहना है कि फांसी की सज़ा देना दुष्कर्म की समस्या का अंतिम समाधान नहीं है। इससे समाज में अराजकता का माहौल कायम हो सकता है, लेकिन मेरा मानना है कि ‘आंख के बदले आंख’ का नियम भले सही नहीं है, लेकिन जिन मामलों में अारोपी ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी हों और उसकी वजह से पीड़िता को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा हो (उदाहरण के तौर पर,अरूणा शानबाग मामला, निर्भया केस, कठुआ कांड, मंदसौर रेप कांड आदि), उसमें भी दया बरतने की कोई गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिए।

मनोवैज्ञानिक जेम्स कोल के अनुसार, “बलात्कार एक मानसिक यानी कि मनोरोगी समस्या भी है, जिसके सूत्र अपराधी के बचपन में छिपे हुए होते हैं।” हालांकि कुछ विद्वानों की राय इससे अलग भी हैं। उनके अनुसार यह एक मनोविकार है, जो दबी हुई कुंठा, दंभ, हिंसा एवं प्रतिशोध के मिली-जुली प्रतिक्रिया से उपजती है। परिवेश इसका ईंधन और परिस्थितियां इसकी उत्प्रेरक का कार्य करती हैं। नशे की लत के कारण लोगों की सोचने की क्षमता खत्म हो जाती है, इसलिए ऐसे लोग गलत कार्यों के बारे में सोचने लगते हैं और कुछ लोग अपने रास्ते से भटक जाते हैं।

बलात्कार के बढ़ते मामलों के संबध में मनोरोग चिकित्सकों का कहना है कि मानसिक रूप से बीमार लोग ही ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। बलात्कारी की मानसिक स्थिति बाइपोलर डिसऑडर की श्रेणी में डाली जा सकती है। ऐसे कुछ लोग उन्माद के शिकार होते हैं और कुछ हद तक मानसिक अवसाद के। अगर लक्षण साथ-साथ हों, तो उसे बाइपोलर डिसऑडर नामक मानसिक रोग कहा जाता है। एक अध्ययन में कहा गया है दुनिया की 2.4 फीसदी आबादी इससे ग्रस्त है।

इस समय पूरे देश में मनोरोगियों की तेज़ी से बढ़ती संख्या चिंता का बड़ा  कारण है। इस प्रकार के मनोविकारों से ग्रस्त व्यक्ति की सोच को अगर हम सकारात्मक दिशा में बदल सकें, तो बलात्कार जैसे अनेक मनोरोगों की समस्या कुछ हद तक हल हो सकती हैं। ज़्यादातर लोगों को अपनी इस मानसिक बीमारी के बारे में पता ही नहीं होता।

मानसिक रोगियों के प्रति परिवार व समाज की बढ़ती बेरूखी एकाकी ज़िन्दगी और असहयोग कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। आज बलात्कार या दुष्कर्म काफी हद तक इन दबी हुई यौन कुंठाओं का परिणाम भी है। अपने घर से दूर बड़े शहरों में अकेले रह रहे प्रवासी लोगों में इन कुंठाओं को संतुष्ट ना कर पाने के कारण ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यह बलात्कार को मानसिक रोग के रूप में परिभाषित कर रही है। लोगों की नैतिकता और निजी जीवन में आयी गिरावट भी इसका एक महत्वपूर्ण कारण साबित हो रहा है।

देश में बढ़ते बलात्कार के मामलों को देखते हुए और यौन कुंठाओं को महिला उत्पीड़न का कारण बनने से रोकने के लिए इसे नज़रअंदाज करना कहां तक ठीक होगा, इसे भविष्य में चर्चा का गंभीर विषय बनाना होगा। कुछ लोगों की राय है कि दबे-छिपे यौन उन्मुक्तता की तरफ अग्रसर देश में कुछ हिस्सों में सेक्स वर्क को कानूनी मान्यता देने से इसका हल निकल सकता है। यह विचार कहां तक सही है, इसके बारे में भी गंभीरता से सोचना होगा।

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