“लिंचिंग पर चुप्पी साधने वालों को राहुल की झप्पी गलत लग रही है”

Posted by Bhavesh Trivedi in Hindi, Politics
July 21, 2018

राहुल गांधी का प्रधानमंत्री को गले लगना या गले पड़ना बिलकुल भी गलत नहीं है। नासमझी और भक्ति से भरे तर्कों की आंधी ने राहुल गांधी की झप्पी के असल मर्म को कहीं उड़ा फेंका। लोग उसे बचकाना कह रहे हैं, ड्रामा कह रहे हैं, प्रधानमंत्री की गरिमा के खिलाफ कह रहे हैं, यहां तक कि लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन तक इसे संसद की मर्यादा के खिलाफ बताकर प्रधानमंत्री पद की तौहीन करार दे रही हैं।

मेरी नज़र में राहुल गांधी की झप्पी सार्थक है। इसमें कहीं पर भी अपमान, ड्रामा या बचपना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों से देश में जो सामाजिक और राजनैतिक रूप से घृणा का माहौल बना है और इस माहौल को दुरुस्त करने में जो सरकार नाकाम रही है, ये झप्पी उसकी कार्यशैली पर करारा तमाचा है।

ये झप्पी बचकानी नहीं, गांधीवादी है। घृणा को घृणा के बदले कभी खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन, घृणा को प्रेम और अपनत्व से ज़रूर खत्म किया जा सकता है। राजनैतिक द्वंद्व जायज है लेकिन, उस द्वंद्व में मर्यादा को भूलते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी पर निजी हमला करना बिलकुल जायज नहीं है।

राहुल गांधी को पप्पू कहना कहीं से भी सही नहीं है। यह सत्तादल का घृणा से भरा तर्क है। इसका जवाब राहुल ने घृणा से ना देते हुए प्यार की झप्पी से दिया है। यह राहुल गांधी के व्यक्तित्व को ज़रूर महान बनाता है। इसको बचकाना कहने वाले लोगों को खुद देखना चाहिये कि वो किस भक्ति के चलते ऐसे परम अंधत्व को प्राप्त हो चुके हैं कि उन्हें घृणा और प्रेम में फर्क तक करना नहीं आ रहा है।

ये लोग नृशंस लिंचिंग्स पर तो चुप्पी साधकर उसके सही होने का प्रमाण देते हैं लेकिन, ऐसे प्रेम से गले लगाने को गलत कहते हैं। इनका अपना ही एक एजेंडा है इस कारण ये ऐसा करते हैं।

लेकिन राहुल गांधी ने इतनी महानता का कार्य करके भी लगे हाथ अपनी अपरिपक्वता का प्रमाण दे दिया। बेशक, राहुल गांधी की झप्पी प्रशंसनीय है लेकिन, आंख का करतब आलोचना का विषय है। उन्होंने ये करतब दिखाकर अपने सारे किये धराये पर पानी फेर दिया।
अविश्वास प्रस्ताव जैसे मुद्दे पर देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के अध्यक्ष से जो गंभीरता अपेक्षित थी, राहुल गांधी में उसका पूर्णतया अभाव था।

आंख मारना भारतीय समाज में किसी को छलने का प्रतीक माना जाता है। आंख मारना छिछोरेपन का आभास कराता है। प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार जब ऐसी हरकत करें तब देश की जनता का उनपर से विश्वास हटने लगता है।

आंख मारकर राहुल गांधी ने जितने भी बड़े मुद्दे संसद में उठाये उन पर पानी फेर दिया। इससे लोगों में यह संदेश जाएगा कि राहुल ने मोदी की घेरेबंदी हमारे लिए नहीं खुद के स्वार्थ के लिए की है। वो मोदी को गलत बताकर हमें छलना चाहते हैं और हमारे वोट पाना चाहते हैं। इस हरकत से लोगों के मन में राहुल गांधी के खिलाफ खलनायक की छवि बन सकती है।

ये दोनों घटनाएं राहुल की अपरिपक्वता को तो नकारती है लेकिन, परिपक्वता को भी स्वीकार नहीं करती है।

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