“देशभर में महिलाओं के साथ हो रहा यौन शोषण आने वाली तबाही का संकेत है”

क्या समाज बनाया है हम लोगों ने। शादी के 9 महीने पूरे होने के पहला बच्चा पैदा हो गया तो सवाल उठायेंगे कि इतनी जल्दी बच्चा कैसे पैदा हो गया। लोग चटखारे ले लेकर बात करते हैं, किस्से सुनाते हैं। गर्भ का पता चला तो कैसे भी करके गर्भपात का दबाव बनाया जाता है। महज़ सिर्फ इसलिए कि लोग क्या कहेंगे।

“लोग क्या कहेंगे” इस बात की परवाह के सामने गर्भवती का स्वास्थ्य कोई मायने नहीं रखता। परवाह नहीं होती कि इस दौरान वह किन-किन शारीरिक और मानसिक तनाव से गुज़रती है। वहीं अगर किसी विवाहिता को बच्चा नहीं हो पा रहा है, तो उसे बांझ कहकर अपमानित किया जाता है। कदम-कदम पर ताने मारे जाते हैं, जीना मुहाल कर दिया जाता है।

आखिर हमारे समाज में इतना अधिक संतान मोह है ही किसलिए? और यह मोह सिर्फ अपनी संतान के लिए ही क्यों, आखिर जिसे बहू बनाया वह भी तो किसी की बेटी ही है। समय के पहले बच्चा हुआ तो दिक्कत, समय पर ना हुआ तो दिक्कत, इन सबका ठीकरा मातृशक्तियों के ऊपर फोड़कर ये मर्दवादी समाज अपने आपको सभ्य समझता है।

मैं पिछले कुछ महीनों से बहुत अधिक मानसिक अस्थिरताओं से गुज़र रहा हूं। समझ नहीं पा रहा हूं कि इसकी वजह क्या है? कहीं यह अपनी ज़िम्मेदारियों को समझने की कला तो नहीं या जागरूक नागरिक होने की सज़ा है। मेरी उम्र के कई युवा सबकुछ दरकिनार करके नौकरी पाने की जुगत में अपने-अपने स्तर पर अंधाधुंध पढ़ाई कर रहे हैं। नौकरी पेशा लोग नौकरी और परिवार में व्यस्त हैं। बेरोज़गार और बेकार युवा गली नुक्कड़ों में इकट्ठे होकर नफरत की राजनीति की बातें करते हुए, मवालियों की भांति नुमाइश करते हुए, मोहल्ला पड़ोस और आती जाती लड़कियों/महिलाओं के बारे में अश्लील बातें करते हुए और उनपर छींटाकशी करते हुए दिख जाते हैं। इन्हें बहुत कम ही मतलब होता है कि देश प्रदेश में चल क्या रहा है।

हाल ही में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन द्वारा किये गए सर्वे में (जिसमें 193 देश शामिल थे) भारत को 10 ऐसे देशों में सबसे ऊपर रखा है जो  लड़कियों/महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित है। महिलाओं की सुरक्षा के मामले में भारत, अफगानिस्तान, सीरिया, सोमालिया जैसे देशों की कैटेगरी में आ खड़ा हुआ है जो शर्मनाक तो है ही चिंताजनक भी है। और एक तबका ऐसा भी है भारत देश का जिसे इन आंकड़ों से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता है। जैसे, जापान जैसे  देश में भूकम्प का आना आम बात है, वैसे ही इन तबकों के लिए बलात्कार, गैंगरेप की घटनाएं होना आम बात है।

नेता और जनप्रतिनिधियों की असंवेदनशीलता उनके शर्मनाक बयानों से समझ आ जाती हैं। भाजपा और संघ से जुड़े कोई ना कोई नेता अपनी घटिया मानसिकता का परिचय देने के साथ-साथ इन जघन्य घटनाओं और विभिन्न केसों में लिप्त पाए जा रहे हैं।

किन हाथों में यह देश है? क्या इस देश के मतदाताओं की मति मारी गयी है, जिन्हें आने वाली तबाही दिखाई नहीं दे रही है। ऐसा कौन सा जादू है जिसने इस देश के मतदाताओं को अंधा-गूंगा और बहरा बना दिया है।

इन नफरती पॉलिटिशियनों ने ऐसी भीड़ को जन्म दे दिया है, जो कानून को हाथ में लेकर नफरत और हिंसा फैलाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। शक के आधार पर जाति विशेष के लोगों को पीट-पीटकर मार डालना, आगजनी, बलात्कार, नग्न कर घुमाना, मल मूत्र पीने को विवश करना और ना जाने क्या क्या। क्या यह मानव का जन्मजात स्वभाव है? या इसे बहुत ही कुटिलता पूर्वक सुनियोजित रूप से गढ़ा जा रहा है? युवाओं को धर्म और संस्कारों की आड़ में नफरती और साम्प्रदायिक रंग दिया जा रहा है।

इस देश की शिक्षा व्यवस्था इसे रोकने में नाकामयाब क्यों है? यह सवाल अब युवाओं को पूछना पड़ेगा। आए दिन घटने वाले जघन्य और शर्मनाक बलात्कारों, गैंगरेप और तेज़ाब डालने की घटनाओं से रूह कांप जाती है। इन दिनों आंकड़े देखकर और अधिक पीड़ा हो रही है। मैं इन हालात को और अधिक बेहतर तरीके से महसूस कर पा रहा हूं, क्योंकि मेरी बहन भी अश्लील हरकतों का शिकार हुई थी। उस वक्त उसने अपनी पूरी ताकत के साथ विरोध दर्ज किया था। जब मुझे इस घटना के बारे में बताया गया तो मेरे ऊपर खून सवार हो गया था। जिसने ये शर्मनाक हरकत की थी, वह शादीशुदा आदमी था, जिसकी एक साल की बच्ची भी थी।

मैंने अपने गुस्से को किसी तरह काबू में किया, मैं उसकी जान तो नहीं लेता लेकिन हाथ या पैर जरूर तोड़ देता। उसके बूढ़े मां-बाप बीवी और नन्हीं सी बच्ची को देखकर सख्त लहज़ें में सिर्फ हिदायतें और उसे अपनी गलतियों का अहसास ही करा पाया। किसी के लिए भी अपने मां-बाप बीवी और नन्हीं सी बच्ची के सामने उसके किये का पर्दाफाश होना उसके लिए मौत के समान होता है। फिर उसने आंख उठाकर सामने से चलने की हिम्मत नहीं की।

एक साल बाद पता चला कि उस लड़के की बहन अपने पति के द्वारा शराब पीकर मारने-पीटने की घटना से तंग आकर ससुराल छोड़कर एक बेटी के साथ मायके आकर रहने लगी। उस लड़के की बहन की बेटी, अक्सर मेरी छोटी बहन जो अभी सातवीं कक्षा में है से मिलने, बात करने, खेलने गाने के लिए हमारे घर आया करती है और उसे भी मेरे घर में बेटी के जैसे ही ट्रीट किया जाता है।

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