वो शेल्टर होम हमारे समाज जैसा ही तो है जहां लड़कियां बस शोषण का मौका हैं

मुज़फ्फरपुर की घटना में जितना दिख रहा है, मामला उससे कहीं ज़्यादा खतरनाक है। ऐसा नहीं है कि रेप की शिकार सिर्फ 34 लड़कियां ही थीं। ये लड़कियां सैकड़ों भी हो सकती हैं, शेल्टर होम में लड़कियां आती-जाती रहती हैं। ये वहां की परमानेंट निवासी नहीं थीं। सरकार के आंकड़ों पर भरोसा नहीं कर सकते, सरकार का वश चले तो इन लड़कियों को भी बांग्लादेशी कहकर डिपोर्ट करा दे।

ये लड़कियां समाज के ही नहीं, दुनिया के सबसे कमज़ोर तबके से आती हैं। एक सात साल की मूक बधिर बच्ची, जिसका कोई नहीं है, सामाजिक रूप से उससे कमज़ोर इस दुनिया में और कौन है? इन लड़कियों को पुलिस ने किसी रस्ते से, किसी चौराहे से या किसी ट्रेन से उठाया होगा और यहां पहुंचा दिया होगा। हो सकता है किसी और ने पहुंचाया हो। इन लड़कियों से अभी तक ये नहीं पूछा गया है कि शेल्टर होम में आने से पहले उनके क्या अनुभव रहे हैं। लोगों ने क्या किया है उनके साथ, शोषण तो किया ही होगा।

कल्पना कीजिए कि दिन-रात एक मर्द 10-15 लड़कियों की रखवाली करते हैं। इन लड़कियों का कोई नहीं है, ये अनपढ़ हैं, समाज की नज़र में इनका कोई अधिकार नहीं है। और ये मर्द इन सबके खाने-पीने रहने का इंतज़ाम करते हैं। इन लड़कियों को अपना अधिकार तो नहीं पता है, इन्हें मीडिया, सिनेमा, लिट्रेचर या फिर सामान्य घरों की बात भी नहीं पता है। जो लाया, वो क्या कह रहा है, वही फाइनल है उनके लिए। जिस पुलिसवाले ने यहां तक पहुंचाया, उसका विरोध करना भी असंभव ही रहा होगा। तो ये लड़कियां इन मर्दों के सामने क्या बोल पाएंगी?

फिर उस मर्द के सामने क्या बोल पाएंगी जो दस-दस गनर ले के आता हो इनसे मिलने? TISS की टीम के सामने भी ये लड़कियां बस ‘गंदा काम’ ही बोल पा रही थीं। उनके बयान पढ़ के लगा कि मारने-पीटने से उनको दर्द तो हुआ, पर गंदा काम एक ही था। शायद बाकी से वो एडजस्ट भी कर लेतीं। उनके पास कोई चुनाव नहीं था, अभी तक समझ नहीं आया कि इन लड़कियों को उन मर्दों को अंकल बुलवाना किसने सिखाया।

इनकी परिस्थिति ऐसी थी कि किरण कुमारी, जिनका घर-परिवार भी है, जो इनकी केयरटेकर थीं, वो भी इनका शारीरिक शोषण करने लगीं। उनके कपड़े उतरवा कर साथ सोती थीं। किसी को नहीं पता कि उनमें लेस्बियन ट्रेट थे कि नहीं, अगर थे भी तो ये डिस्कवर करने की जगह नहीं थी। सच तो यह है कि शोषण का स्तर इतना ज़्यादा था कि जिसको कोई मतलब नहीं था, वो भी खूंखार रेपिस्ट हो गया। एक महिला ने कम उम्र की लड़कियों का खुद शारीरिक शोषण किया और दूसरे मर्दों से करवाया।

ऐसी वल्नरेबल स्थिति वाली लड़कियों के लिए किसी सामाजिक अध्ययन की ज़रूरत नहीं है। अपने आस-पास के घरों में देख लीजिए, कमज़ोर आर्थिक सामाजिक स्थिति वाली लड़कियों के साथ क्या होता है? मामा के घर जाती है, तो वहीं के लोग शोषण करते हैं, बुआ के घर गई तो वहां के लोग। कहीं काम पर लग गई तो पूरी व्यवस्था के लिए वो खिलौना बन गई, कहना ना होगा कि इसमें उम्र का कोई बंधन नहीं होता। अभी कुछ दिन पहले ही एक 10 साल की लड़की का 22 लोगों ने रेप किया था महीनों तक। उसमें 15 साल से लेकर 66 साल तक के पुरुष शामिल थे।

प्रशासन पता नहीं क्यों आंख बंद कर के रहता है, समाज भी। जहां भी ऐसी वल्नेरेबल लड़कियां हैं, वहां उनका शोषण होता है, चाहे वो हमारे घर हों, स्कूल-कॉलेज हों, नौकरी संस्थान हों या फिर शेल्टर होम्स। इस चीज़ में किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, ममता कालिया ने आउटलुक के ताज़ा अंक में लिखा है कि धिक्कार से, मक्कार से और जयकार से प्रबुद्ध लोगों ने ‘नारी की देहमुक्ति’ की बात की। जब पढ़ी-लिखी लड़कियों का शोषण करने से बाज़ नहीं आते लोग, तो ये लड़कियां तो बिल्कुल ही कमज़ोर थीं। इनके पास तो प्रतिरोध करने की बातें भी नहीं थी।

सोचने में अजीब लगता है, ये लड़कियां आपस में क्या बातें करती होंगी, क्या कहती होंगी अपने अनुभवों के बारे में ? कोई आता होगा तो क्या गुज़रता होगा इनके मन पर, क्या गुज़रता होगा इनके शरीर पर, आपस में क्या कहती होंगी ये! कैसे दिलासा देती होंगी। 15 साल की लड़की ने 7 साल की बच्ची से क्या कहा होगा! 19 साल वाली ने 15 साल वाली से क्या कहा होगा, 7 साल वाली से किसी ने बात भी की होगी या नहीं? या सब चुपचाप इग्नोर कर रहे होंगे, जैसे कुछ हुआ ही ना हो!

ब्रजेश ठाकुर की हंसी बताती है कि ना तो वो अकेला है, ना ही बस 34 लड़कियां हैं, अगर उसका हाथ नहीं होता इस मामले में तो वो हंसता नहीं। एक साधारण निर्दोष इंसान पैनिक तो ज़रूर करता, उसे पता है कि बिहार के शीर्ष लोग भी शामिल हैं इस मामले में। छोटी बच्चियों के शोषण की फेटिश बढ़ती ही जा रही है। सबसे बड़ी बात कि उसकी पहचान करनेवाली लड़की गायब करा दी गई है, वो भी तब जब कि सीबीआई इसकी जांच कर रही है। ब्रजेश ठाकुर के खिलाफ सबूत नहीं मिलेंगे, वो छूट जायेगा, बाकी तो कोई पकड़ा ही नहीं जायेगा।

ये मामला राम-रहीम और आसाराम वाले मामलों के टक्कर का है। इनमें भी जब तक चार-पांच लोग अपनी जान नहीं देंगे, प्रशासन कुछ नहीं करेगा। धीरे-धीरे सारे सबूत गायब कर दिये जायेंगे, अंत में यही आ जायेगा कि गलत रिपोर्ट आ गई। सेक्शुअली एक्टिव होने की आशंका जताई गई थी, रेप की नहीं। छह महीने बाद इस केस को कौन पूछेगा? अगर पूछना ही होता तो देश के बाकी बालिका गृहों पर अब तक छापे पड़ चुके होते। कौन कह रहा है कि ऐसी जगहों पर शोषण नहीं होता? सबको पता है कि ‘कोशिश’ की टीम हर जगह नहीं जा सकती। जहां गई, वहां का बवाल काट लो, बस!

किरण कुमारी के मानस की जांच कराई जानी चाहिए, इस पूरे प्रकरण के दौरान क्या चल रहा था इनके मन में।

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