“मेरी माँ मुझे अबॉर्ट नहीं करवा पाई क्योंकि इसका हक तो समाज को है औरतों को नहीं”

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अकसर घर के छोटे बच्चों से मज़ाक में कहा जाता है, “तुम तो गलती से आ गए/आ गई” लेकिन मज़ाक में कही गई इस बात के पीछे कई बार एक गंभीर सच्चाई भी होती है। एक सामाजिक दबाव की सच्चाई, औरतों के अपने शरीर पर अपने अधिकार को मारे जाने की सच्चाई, उसके बच्चे पैदा करने या ना करने के चुनाव के कत्ल किए जाने की सच्चाई।

इस बात को समझने के लिए मैं आपको अपनी और अपनी मां की कहानी सुनाती हूं। मेरी मां को एक तय समय में बच्चा पैदा करने या ना करने का अधिकार ना मिलने की वजह से ही मेरा जन्म हुआ। शायद आपको यह बात अजीब लगे कि मैं अपने ही जन्म को गलत या सही क्यों ठहरा रही हूं।

लेकिन यहां मेरे जन्म के गलत या सही होने के सवाल से ज़्यादा मेरी मां के चुनाव के अधिकार का मारा जाना है। दो बच्चियों के बाद उन्हें सिर्फ इसलिए ऑपरेशन (उस वक्त पुरुषों की नसबंदी के बारे में जागरूकता की कमी थी) नहीं करवाने दिया गया क्योंकि मां का कोई बेटा नहीं था। समाज को इस बात की चिंता थी कि बिना बेटे के मेरे मां-पापा अपना जीवन कैसे गुज़ारेंगे, शायद उस ढकोसले वाले समाज को इस बात की चिंता थी कि उनके बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा।

इस फैसले में मां की डॉक्टर भी शामिल थीं, जिन्होंने मां के कहने पर भी उनका ऑपरेशन टाल दिया। डॉक्टर ने मां से कहा, “तुम्हारी अभी दो बेटियां हैं, कोई बेटा नहीं, तुम अभी ऑपरेशन कैसे करवा सकती हो।” मां की कई कोशिशों के बाद भी उनका ऑपरेशन नहीं किया गया। यहां मां द्वारा बच्चे पैदा करने या ना करने के चुनाव का कोई विकल्प ही नहीं रखा गया।

मेरी छोटी दीदी के जन्म के तकरीबन डेढ़ साल बाद मां का अपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ। ऑपरेशन के ठीक बाद ही मां के पीरियड्स का वक्त था लेकिन दस दिन गुज़र जाने के बाद भी मां को पीरियड नहीं हुआ। मां को शक हुआ और वो डॉक्टर के पास चेकअप के लिए पहुंची। तब पता चला कि मां ने महीने-डेढ़ महीने पहले ही मुझे कंसीव कर लिया था।

मतलब साफ था, मां के अपेंडिक्स के ऑपरेशन के वक्त मैं ऑलरेडी पेट में महीने भर की थी। अब यहीं हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़ा होता है। ऑपरेशन के वक्त महीने भर का बच्चा पेट में है लेकिन डॉक्टर को इसका कुछ पता नहीं। इस लापरवाही का खामियाज़ा आगे मुझे और मेरी मां दोनों को ही भुगतना पड़ा।

डॉक्टर के अनुसार,

मां के पेट में घूमते हुए मेरा सर मां के अपेंडिक्स के टांके में फंस गया था जिसकी वजह से पेट में मेरी कंडीशन काफी बुरी हो चुकी थी। मैं बुरी तरह फंस चुकी थी, सर टांके में फंसा हुआ था, मेरी एक एड़ी बच्चेदानी से बाहर निकल गई थी और एक पैर बाईं ओर चला गया था। मेरा अपनी जगह से मूव करना संभव नहीं था और शायद मेरा सांस लेना भी कुछ समय बाद मुश्किल हो जाता। इस वजह से 8 महीने में ही मां का ऑपरेशन करना पड़ा।

मां तीसरे बच्चे के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थीं। ना ही मेरी मां को और ना ही मेरे पापा को किसी बेटे का इंतज़ार था। उनके लिए दो बच्चियों का परिवार ही काफी था। इस बात को सोचते हुए मां ने मुझे अबॉर्ट कराने का फैसला किया लेकिन मां के अपेंडिक्स के ऑपरेशन को सिर्फ 10 दिन ही हुए थे इसलिए डॉक्टर ने अबॉर्शन करने से मना कर दिया। कारण, मां के टांके टूटने का डर था।

डॉक्टर ने मां को महीने भर बाद आने को कहा लेकिन तब तक मैं लगभग 3 महीने की हो चुकी थी, जिसकी वजह से अबॉर्रशन नहीं किया जा सका। हालांकि उस वक्त भी डॉक्टर के मन में यह बात थी, “तुम्हारे लिए बेहतर ही हुआ, इस बार शायद बेटा हो जाए।”

बिलकुल इस केस में मेरी मां का अबॉर्शन करना खतरे से कम नहीं था लेकिन अगर शुरुआत में ही मां को बच्चा पैदा करने या ना करने के फैसले का अधिकार दिया जाता तो उन्हें उन तमाम शारीरिक यातनाओं से गुज़रना नहीं पड़ता।

घर की बुरी आर्थिक स्थिति में दो बच्चों को पालना ही मेरे मां-पापा के लिए एक बड़ा टास्क था। उसमें तीसरे बच्चे की परवरिश संभव ही नहीं थी। इसी वजह से ना ही मेरे पेट में रहते हुए मां ने कोई पौष्टिक आहार खाया और ना ही मेरे जन्म के बाद। जबकि उनका शरीर बाकि दो प्रेग्नेंसी के मुकाबले इस बार ज़्यादा कमज़ोर था। प्रेग्नेंसी के दौरान अपेंडिक्स का ऑपरेशन उनके शरीर को वैसे ही कमज़ोर कर चुका था लेकिन इन सबसे उबरने के लिए मां के पास पैसे नहीं थे।

मां की कमज़ोरी और खाने-पीने में कमी का ही शायद कारण रहा कि मेरे जन्म के बाद उन्हें दूध नहीं हुआ। जिस वजह से मुझे मां का दूध नहीं मिला और आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने की वजह से बाहर से दूध खरीद कर पिलाना मां के लिए काफी मुश्किल था। जबकि प्रीमैच्योर बच्ची होने की वजह से मेरे खाने-पीने में एक्ट्रा केयर की ज़रूरत थी, जो मां-पापा के चाहते हुए भी संभव नहीं हो सका।

समाज का अगर प्रभाव रहता तो शायद मेरे जन्म के बाद भी वो मां पर बेटे का दबाव बनाते। क्योंकि मेरे जन्म के बाद कई लोगों ने मेरी मां को दिलासा देते हुए का था, “फिर बेटी हो गई, कोई बात नहीं…”।

मां बताती हैं,

डिलीवरी के समय ऑपरेशन थियेटर जाने से पहले ही मैंने डॉक्टर को कड़े रूप में कहा था कि इस बार मेरे बच्चे दानी का ऑपरेशन हो जाना चाहिए वरना मैं बच्चा पैदा करने ही नहीं जाऊंगी। तब जाकर मेरी मां का ऑपरेशन किया गया।

बेटे की चाहत में समाज एक महिला पर बच्चा पैदा करने का दबाव बनाता जाता है लेकिन उसका खामियाज़ा सबसे ज़्यादा मां और उस बच्चे पर पड़ता है।

समाज उस वक्त यह देखने भी नहीं आता कि उसने एक औरत से बच्चा ना पैदा करने का अधिकार तो छीना लेकिन उसके बाद वो किन मुश्किलों से गुज़र रही है, क्या उसका शरीर इस काबिल था कि वो 9 महीने बच्चे को अपने पेट में रख सके, क्या उसके आर्थिक हालात ऐसे थें कि वो खुद की और उस बच्चे की अच्छी केयर कर सके।

कई बार बच्चे पैदा ना करने के फैसले पर कहा जाता है कि आज कल की लड़कियां तो बस फैशन में बच्चे पैदा करने से भागती हैं। बिलकुल अगर आप इसे फैशन ही मानते हैं तो मानिए लेकिन ये किसी का अपने शरीर पर अधिकार का सवाल है, उसके भविष्य के फैसले का सवाल है। क्योंकि वो महिला तब तक मां बनने को तैयार नहीं होती जब तक वो खुद को मां बनने के लिए मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से तैयार ना समझे। हमारा समाज अबॉर्शन को किसी गुनाह की श्रेणी में डालने से पीछे नहीं रहता है, कई लोग तो बकायदा इसे पाप भी घोषित कर देते हैं।

इसका ही कहीं ना कहीं नतीजा है कि इन दिनों गर्भनिरोधक गोलियों का भी ट्रेंड बढ़ा है। हालांकि पूरी तरह से यह नहीं कहा जा सकता है लेकिन इसके भी दो पहलू हैं, पहला-गर्भनिरोधक गोली के बाद अबॉर्शन के केस कम हुए हैं (खासकर अनमैरेड लड़कियों के) साथ ही इसका दूसरा पहलू ये भी है कि अबॉर्शन की प्रक्रिया मुश्किल होने और समाज का इसके प्रति नकारात्मक रवैये के कारण महिलाएं इसके रिस्क तक पहुंचना ही नहीं चाहतीं और इसके विकल्प के रूप में गर्भनिरोधक गोलियां लेना ज़्यादा मुनासिब समझती हैं।

हालांकि गर्भनिरोधक गोलियां लेना कहीं से भी गलत नहीं लेकिन सामाजिक दबाव के कारण कई बार महिलाएं/लड़कियां बिना सही जानकारी के गोलियां लेती हैं, जिसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ने का खतरा बना रहता है।

लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल की गाइनोकोलॉजिस्ट डॉक्टर अंकिता श्रीवास्तव ने एक केस के बारे में बताते हुए कहा, “मेरे पास अपनी मां के साथ 18-19 साल की एक लड़की आई थी। उसे पेट में काफी दर्द था। वो अपनी मां के सामने खुलकर कुछ बोल नहीं रही थी, फिर हम उसे अलग कमरे में लेकर गए। उसका पेट छूते ही मुझे शक हुआ कि केस कुछ और ही है। मैंने उसे काफी समझाया कि इलाज के लिए तुम्हें खुलकर बात करनी पड़ेगी। तब उसने बताया कि उसने गर्भनिरोधक गोली खाई थी।

डॉक्टर अंकिता ने बताया कि गोली खाने के बाद उसका अंडा बच्चा दानी में ही फूंट कर रह गया था। वो बाहर नहीं निकल पाया, जिसकी वजह से उसके पेट में खून भर गया था। डॉक्टर के अनुसार कई बार ऐसे केस हो जाते हैं, खासकर आपको गर्भनिरोधक गोलियों के इस्तेमाल की सही से जानकारी ना हो तो।

ज़ाहिर सी बात है उस लड़की को डर रहा होगा कि वो समाज को क्या बोलेगी, अपने घर वालों को क्या बोलेगी। जबकि वो 18 साल की उम्र सीमा पार कर चुकी थी, उसे अधिकार था अपने शरीर के बारे में फैसला लेने का। लेकिन सामाजिक रूढ़िवादिता की वजहों से उसने बिना सही जानकारी के दवा लेना सही समझा, जिसका खामियाज़ा उसकी जान पर भी पड़ सकता था।

क्यों हमारे शरीर पर किसी समाज का दबाव हो? जब कानून हमें एक निश्चित उम्र के बाद अपने फैसले का अधिकार देता है तो सेक्स और बच्चे के फैसले में दकियानूस समाज का दबाव क्यों? समाज को ये समझना होगा कि शरीर मेरा, तो इसपर अधिकार भी मेरा ही होगा।

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