“ऋषिकेश मुखर्जी जिन्होंने बताया भव्य लोकेशन फीचर फिल्म को प्रभावी नहीं बनाते”

मध्यवर्गीय मनोदशाओं के संवेदनशील व अग्रणी प्रवक्ता ऋषिकेश मुखर्जी हिंदी सिनेमा में विशेष महत्व रखते हैं। सामान्य मुख्यधारा से एक स्तर ऊंचा मुकाम रखती है ऋषिदा की फिल्में। उनका सिनेमा एक रचनात्मक संवाद का दस्तावेज सा मालूम होता है, जिसमें मानवीय आचरण व व्यवहार की अनदेखी मीमांसा व्यक्त हुई है। उनके पात्र व कहानियां जीवन की एक विवेचना होकर भी उससे काफी निकट हैं। बनावटी प्रसंगों एवं तत्वों से प्रेरित कथानक यहां दिखाई नहीं देते।

30 सितंबर 1922 को जन्मे ऋषिदा की फिल्में आंखों में खुशी और गम के आंसू सींच सकती है। आज के हिंसक-बर्बर एवं दिशाहीन समुदाय ने शायद ऐसी फिल्में कभी नहीं देखी हैं। वहां आपको वो सबकुछ मिलेगा, जो आज बड़ी मुश्किल से पर्दे पर दिखाई पड़ता है।

ऋषिदा की दुनिया दरअसल उस स्वर्णिम दौर का जहान रही, जब मुख्यधारा का स्वरूप बाज़ार द्वारा उतना अधिक तय नहीं हो रहा था। उनके सिनेमा में ‘मनोरंजक’ प्रस्तुति एक स्तर के अनुशासन के अधीन थी। उन्होंने बताया कि फीचर फिल्मों में ‘मनोरंजन’ से क्या आशय होना चाहिए। उनकी फिल्मों में लोक-समाज को कुछ देने की काबिलियत थी। उनकी कहानियों में लोग अपनी ज़िन्दगियों का अक्स देख सके थे। आनंद सहगल (आनंद) का ही उदाहरण ले लीजिए जिनकी जीवनी से ना जाने कितने लोगों को सार्थक ज़िन्दगी की प्रेरणा मिली।

ऋषिदा ने बताया कि भव्य लोकेशन व सेट्स फीचर-फिल्म को प्रभावी नहीं बनाते। फिल्मों की विवेचना ‘उपयोगी संवाद’ नज़रिए से करने पर हमें यह मर्म समझ में आता है।

सितारों की पॉपुलर छवियों को चुनौती देकर ऋषिदा ने अच्छा काम किया। इस पहल से स्टार का दर्जा रखने वाले कलाकारों को शिल्प का रुतबा समझ आया। लाइमलाइट की दुनिया में अमरता का मार्ग अर्थपूर्ण प्रस्तुतियों से मिलता है। 60 और 70 के दशक में बेशुमार फिल्में बनी। समझदार सितारे भव्य से अधिक ‘महत्त्वपूर्ण’ फिल्मों पर ज़ोर देते रहे हैं। इस स्तर की प्रस्तुतियों में निभाया गया किरदार स्मृतियों में काफी समय तक रहता है। कभी-कभी दर्शक इसे आजीवन भुला नहीं पाते।

ऋषिदा ने चोटी के कलाकारों को लीक से हटकर किरदार दिए, जो आगे चलकर उनके लिए काफी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं साबित हुईं। इस तरह उन्हें सितारों की छवि से हटाकर किरदार का महत्त्व बताया। इस खासियत की वजह से ऋषिदा को काफी सम्मान मिला। राजेश खन्ना, अमिताभ, धर्मेन्द्र, शर्मिला टेगोर और रेखा के संपूर्ण फिल्मी सफर में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों का बहुत महत्त्व है।

विज्ञान के छात्र होने के नाते उन्होंने स्वयं को भावी विज्ञान शिक्षक के तौर पर देखा होगा लेकिन कौन जानता था कि एक अलग ही मंज़िल उनका इंतज़ार कर रही है। रसायन में स्नातक ऋषिकेश ने कुछ समय के लिए गणित और विज्ञान भी पढ़ाया लेकिन उन्हें जाना तो कहीं और ही था। फोटोग्राफी में रुचि ने उन्हें कोलकाता  में ‘न्यू थियेटर्स’ के साथ काम करने का एक छोटा अवसर दिया।

उन्हें लैब सहायक का काम मिला। काम करते हुए फिल्म उद्योग के बारे में बहुत कुछ सीख लिया। एक करीबी मित्र इसी कंपनी में ‘संपादक’ का काम भी देख रहे थे। खाली समय मित्र के पास बैठकर ज्ञान में इजा़ाफा करने का शौक हुआ। संगत में संपादन प्रक्रिया के बारे में समझ हुई। संयोग से ऋषिदा की काबलियत ने बिमल राय का ध्यान केन्द्रित किया और जल्द ही उन्हें ‘तपीश’ के लिए साईन कर लिया गया। अपनी क्षमता को लेकर ऋषिदा में हांलाकि आत्मविश्वास की थोडी कमी थी, फिर भी अवसर की चुनौती को स्वीकार किया। इस क्षेत्र में सफल होने बाद वह एक बार फिर शिक्षा की ओर आकर्षित हुए और उच्चशिक्षा के लिए स्टुडियो छोड़ने का अप्रत्याशित निर्णय लिया लेकिन बिमल दा ने उन्हें रोक लिया।

बिमल राय उन दिनों कलकत्ता से बंबई जाने की योजना बना रहे थे। बाम्बे टॉकीज से उन्हें बुलावा भी था। उन्होंने ऋषिकेश को भी चलने के लिए कहा। मुंबई आने बाद ऋषिकेश ने फिर कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। बिमल राय ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘बिमल राय प्रोडक्शन’ को कायम कर उसके बैनर तले ‘दो बीघा ज़मीन’ का निर्माण किया। इस फिल्म को देश-विदेश में ज़बरदस्त सराहना मिली।

कम ही लोग जानते हैं कि ‘दो बीघा ज़मीन’ सलील चौधरी की एक रचना पर आधारित है। ऋषिकेश मुखर्जी फिल्म के मुख्य सहायक निर्देशक व संपादक हैं। बिमल राय के सान्निध्य में रहते हुए फिल्म बनाने का ख्वाब दिल में पल रहा था। ऋषिदा एक आत्मनिर्भर निर्देशक की पहचान बनाने के लिए अग्रसर हुए। बिमल राय की ‘दो बीघा ज़मीन’ के निर्माण के वक्त उनका ध्यान पास के एक मकान ओर आकर्षित हुआ। इससे उनकी कल्पना आंदोलित हुई, दिन गुज़रने के साथ उस दुनिया के जादू में खुद को गिरफ्त पाया। यह सिलसिला ‘मधुमती’ तक जारी रहा। फ़िल्म ‘मुसाफिर’ इसी संक्रमण की एक अभिव्यक्ति के तौर पर देखी जा सकती है ।

ऋषिकेश मुखर्जी जो ‘मधुमती’ का संपादन दायित्व निभा रहे थे, अक्सर उस मकान को जिज्ञासा से निहारा करते। उन्हें उन लोगों का ख्याल कौंध जाता, जो कभी वहां आबाद थे । उस मकान से दिलीप कुमार एवं ऋषिदा को फिल्म का आइडिया मिला। इससे प्रेरित ‘मुसाफिर’ तीन परिवारों की दास्तान को बयान करती है। यह परिवार उस चारदीवारी में एक के बाद आकर रहे। हिंदी सिनेमा में इस मिजाज़ की कहानी को अब तक नहीं आजमाया गया था। ऋषिदा को विश्वास था कि यह प्रोजक्ट बॉक्स-ऑफिस पर नहीं कारगर होगा लेकिन दिलीप कुमार आश्वस्त रहे कि यह एक सफल उपक्रम है। नतीजतन दिलीप साहब ने ऋषिदा को इसके लिए हिम्मत व प्रोत्साहन दिया।

जैसा कि ऋषिदा का पूर्वानुमान था ‘मुसाफिर’ बाक्स-आफिस पर नहीं चल सकी लेकिन फिर भी गुणवत्ता के स्तर पर फिल्म अपने समय से काफी आगे थी। निश्चित ही यदि ‘मुसाफिर’ पर पुनर्विचार किया जाए तो यह एक क्लासिक फिल्म साबित होगी। इसकी गैर-पारंपरिक थीम हर समय में प्रशंसा बटोरेगी। फिल्म ने ऋषिकेश मुखर्जी को राष्ट्र्पति का पदक दिलाया और राष्ट्रीय पुरस्कार निर्णायक मंडली का विशिष्ट प्रशस्ति पत्र भी मिला।

ऋषिदा को पहली बड़ी सफलता राजकपूर-नूतन अभिनीत ‘अनाड़ी’ से मिली। बॉक्स-ऑफिस पर ज़बरदस्त कामयाब हुई इस फिल्म का निर्माण एल.बी. लक्षमण ने किया था। उस वर्ष अधिकतर अवॉर्ड्स ‘अनाड़ी’ की झोली में गए।

ऋषिकेश मुखर्जी की अच्छी फिल्मों में ‘बावर्ची’ का भी नाम आता है। यह कहानी एक बंगाली फिल्म की रीमेक थी। मूल संस्करण में शीर्षक भूमिका रवि घोष ने जीवंत की। कहानी एक रसोईए के सदगुणों को प्रस्तुत करती है। वह परिवार में सदभाव व सामंजस्य भाव की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। कहा जाता है कि ‘बावर्ची’ के मुख्य पात्र में हृषीदा ने अपने पिता का अक्स देखा था।

अभिनेत्री बिंदू को एक नई छवि देने का श्रेय भी ऋषिकेश मुखर्जी को जाता है। फिल्म ‘अभिमान’ में उन्हें एक नया जीवनदान मिला। अभी तक वह केवल ‘वैंप’ तक सीमित थीं। कटी पतंग, जंजीर और इम्तिहान के साथ स्वयं को स्थापित करने बाद बिंदू परिवर्तन के लिए बेचैन थीं। सौभाग्य से उन्हें यह ब्रेक ‘अभिमान’ में मिला। हृषीदा ने उन्हें एक कोमल दिल छवि का किरदार दिया। इसके बाद फिल्मकारों ने बिंदू में एक अलग छवि को पाया।

निर्देशक बनने से पहले ऋषिदा ने संपादन व पटकथा लेखक का काम किया। बिमल राय की मां, दो बीघा ज़मीन, बिराज बहू, देवदास, मधुमती जैसी यादगार फिल्मों की पटकथा लेखन व सहायक निर्देशन किया। ऋषिदा के संदर्भ में एक दिलचस्प पहलू उनकी टीम भावना से जुड़ा है। इस मामले में वह बेहद संवेदनशील रहे। यूनिट सदस्यों की निरंतरता को दूर सफर तक कायम रखा। यह परिवार एक संयुक्त परिवार सा मालूम होता था। अंत समय तक यूनिट में ‘परिवार भाव’ जीवित रखने के लिए प्रयासरत रहे ।

आज ऋषिदा का महत्त्व पहले से कहीं ज्यादा है। उनकी फिल्में व किरदार एक कोमल स्पर्श हैं। कड़वे अनुभवों की दु:खद व त्रासद दुनिया में इस तरह के सकारात्मक प्रयासों की बहुत ज़रुरत है। सिनेमा के माध्यम से समाज को विमर्श की ओर आकर्षित किया जा सकता है। इस संदर्भ में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्में उपयोगी हो सकती हैं ।

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