“राजनीति में महात्मा गांधी एक खूबसूरत मिथक बन चुके हैं”

ज़िन्दगी में जब भी हम ऐसी परिस्थिति में होते हैं जहां हमें ज़बरन कोई कदम उठाना पड़ता है, तब हम अपनी मजबूरियों का बोझ मोहनदास कर्मचंद गांधी पर डालते हुए कहते हैं, “मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी” । वैसे इतिहास उन्हें और भी कई नामों से याद करता है। उन्हें महात्मा की उपाधि साल 1915 में रविन्द्र नाथ टैगोर ने दी जिससे आज उन्हीं के हमवतनों को गुरेज़ है, जबकि राष्ट्रपिता की उपाधि उन्हें नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दी और कई लोग तो उन्हें बापू के नाम से भी पुकारते हैं ।

यहां तक कि अमित शाह जैसे राजनेता को महात्मा गांधी के लिए “चतुर बनिया” जैसे शब्द का प्रयोग करना पड़ जाता है।  लेकिन यह सोचने योग्य है कि अपनी मृत्यु के 70 साल बाद आज भी महात्मा गांधी सभी राजनीतिक दलों की मज़बूरी बने हुए हैं। राजनीति के रंगमंच पर ऐसे कोई दल नहीं हैं जो गांधीवादी विचारधारा पर अग्रसर हो, परंतु ऐसी क्या आवश्यकता है जो उन्हें गांधी का चोला ओढ़ कर अभिनय करने को विवश कर रही है। हम आए दिन सभी राजनेता को गांधी के चरखे , खादी और पहनावे के प्रति अपार श्रद्धा का अभिनय करते देखते हैं, जबकि उनके अन्तःस्थल में गांधीवाद की जगह अवसरवाद की मौजूदगी भरपूर होती है।

ये मज़बूरी अवसरवाद की है जो सभी राजनेता को गांधी के छवि में रच बस जाने को प्रेरित करती है और गांधीवाद से उतनी ही दूर ले जाती है। देश मे अधिकतम अवधि तक सत्ता पर काबिज़ पार्टी उनके नाम को अपनी राजनीतिक हित साधने में इस्तेमाल करती आई हैं।

मगर अगर हम सोशल मीडिया से इतर इतिहास के पुस्तकों में गांधीवाद का अध्यन करते हुए इन 70 सालों में सत्ता पर काबिज़ हुए नेताओं की उनसे तुलना करें, तब पता चलेगा कि धारा का वेग गांधीवाद की उल्टी दिशा में बह रहा था। सत्ता पर काबिज़ होने से पहले जो दल उनकी मुखालफत करता रहा, सत्ता हांसिल होने के बाद वहीं दल अवसरवाद से भी ग्रसित हो गया।

अगर हम तथ्यात्मक बातों पर गौर करें तब ये चीज़ें पाएंगे कि आज समाज और व्यापक राजनीति में गांधी एक खूबसूरत मिथक के रूप में स्थापित हो चुके हैं। शायद इसकी कल्पना स्वयं गांधी ने भी नहीं की होगी कि उनके विचारों की हत्या करके वहीं समाज उनपर माल्यार्पण करेगा। मनुष्य को खत्म करना आसान है, लेकिन उसके विचारों को खत्म नहीं किया जा सकता।

ये कहना गलत नहीं होगा कि गोडसे की गोलियों से गांधी की हत्या नहीं हुई, बल्कि हमारा समाज प्रतिदिन उनकी हत्या कर रहा है। हिंसा को हमने बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया, “अहिंसा परमो धर्म” वाले नारे को हृदय से विरक्त कर दिया है। “जब ईश्वर अल्लाह तेरो नाम” का जाप करने वाले गांधी के ही देश मे नेता ईश्वर और अल्लाह में द्वंद कराते नज़र आते है, तब यह कहना उचित है कि उनको सन्मति दे भगवान। ‘वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीड़ पराई जाने रे” अर्थात वैष्णव जन उनको कहिए जो दूसरों की पीड़ा को महसूस कर पाएं।

हमें यह सोचना होगा कि क्या हम 70 वर्षो में वैष्णव जन बन पाए हैं ? अब शायद इस भजन को उलट कर पढ़े तो मौजूदा सच्चाई से रूबरू हो सकते हैं। जब सारे विचारो को कुचल कर उसकी प्रासंगिकता को खत्म करने का प्रयास वर्षों से चला आ रहा है, तब गांधी के साथ निकटता दिखाने को अगर मजबूरी का नाम दें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी ।

गांधी के बहुआयामी चरित्र के तौर पर हमे उनका चरखा भी दिखाई देता है। दिल्ली एयरपोर्ट पर मौजूद गांधीजी का वह चरखा जो विश्व में सबसे बड़ा चरखा होना का दावा करता है, उसकी उपयोगिता बस सेल्फी लेने तक रह गई है। चरखा आर्थिक स्वतंत्रता और ग्राम स्वराज के प्रतीक चिन्ह के तौर पर किताबों में कैद है। जिसका परिणाम हम देश के छोटे और मंझौले उद्योगों की खस्ता होती हालत से समझ सकते हैं। गांव के गांव खाली होते गए और महानगरों में सैकड़ो झुग्गियां बनती गई। उन झुग्गियों में आज भी लोग अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की ज़मीन तलाश रहे हैं जिसे नव उदारवाद और पूंजीवाद ने अपनी हथेली में कैद कर रखा है।

जिस तबके की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए अपनी प्रतीकात्मक स्मृति को पीछे छोड़ गए गांधी, उसके सामने हमने चरखे का आकार तो बड़ा कर दिया, मगर छोटे कर दिए तो बस विचार। विडंबना देखिए, जो चरखा मेहनतकश वर्ग की आर्थिक बेड़ियों को तोड़ता, उसी चरखे को एयरपोर्ट पर कैद कर दिया गया

खैर इसी बीच अपने वजूद को तलाशता हुआ 2 अक्टूबर आ पहुंचा है। कुछ बाते होँगी, कुछ दावे होंगे, राजनेताओं द्वारा कुछ स्नेह सुधा छलकेगा, कुछ भावुक क्षण भी होंगे जो हमे भाव-विभोर कर जाएंगे। यहां तक कि अखबार का संपादकीय पन्ना सम्पूर्ण गांधीवाद की गाथा गाएगा और टीवी पर ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ जैसी फिल्म देखकर हम अपनी मज़बूर समझ विकसित करेंगे।

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