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“ड्रग माफियाओं पर रिपोर्ट करने के कारण मुझे अखबार से इस्तीफा देना पड़ गया”

नशा करते लोग

ड्रग्स लेते लोग

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जहां आप ना सिर्फ तरह-तरह के लोगों से मिलते हैं बल्कि कई हैरतअंगेज़ अनुभवों से भी रूबरू होते हैं। एक पत्रकार अपने काम के दौरान रसूख वाले लोगों से लेकर बदमाश, फरेबियों और तस्करों के संपर्क में भी आता है। एक पत्रकार का इन लोगों से कभी बेहद दूर तो कभी बेहद पास से वास्ता होता है।

पंजाब से पत्रकारिता की पढ़ाई मुकम्मल करने के बाद मैंने कौशल विकास के तहत उत्तराखंड में ‘अमर उजाला’ अखबार से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की। मेरी किस्मत अच्छी थी कि मुझे अपने क्षेत्र ‘यूएस नगर’ में ही काम करने का मौका मिला। यहां अफीम की तस्करी करने वाले बदमाश पहाड़ों से अफीम लाकर बेचते हैं। अपना गृह क्षेत्र होने के कारण अफीम तस्करों और उनके ठिकानों के बारे में पहले से ही मैं अच्छी तरह से वाकिफ था।

मेरे ऑफिस से मेरे मामा का घर करीब था और इसी कारण जब ऑफिस में देर हो जाती थी तब वहां चला जाया करता था। मेरे मामा के गांव नैनीताल में अफीम तस्कर कॉलेज स्टूडेंट्स को ‘अफीम’ और ‘स्मैक’ सप्लाई करते थे। यह सब गांव में काफी अरसे से चल रहा था और आउटर एरिया में यह गांव होने के कारण पुलिस भी नशे के कारोबार से बेखबर थी, या कहा जा सकता है कि पुलिस सब कुछ जानते हुए बेखबर बनी हुई थी।

चूंकि मैं पत्रकारिता में नया-नया आया था और इस लिहाज से मेरे अंदर जोश अधिक था। मैंने यह सोच लिया था कि बड़े अखबार में काम करने की वजह से किसी के साथ भी भिड़ सकता हूं, जज़्बाती होकर कुछ भी लिख सकता हूं। आफटर ऑल मैं एक पत्रकार हूं लेकिन मैं भूल गया था कि पत्रकार का भी कुछ दायरा होता है, जिनकी हद में रहकर काम करना पड़ता है।

गांव में स्मैक की तस्करी को खत्म करने के लिए मैंने स्मैक बेचने वालों का स्टिंग करने का खतरनाक प्लान बनाया।  मुझे विश्वास था कि स्टिंग करने के बाद जब मैं ‘अमर उजाला’ में बाईलाइन खबर दूंगा तब ज़िले में तहलका मच जाएगी। मुझे लगने लगा कि मैं एक दिन में अव्वल दर्जे का पत्रकार बन जाऊंगा लेकिन यह सब सिर्फ मेरे मन का वहम था। मैं आगे के खतरे के बारे में बिल्कुल अंजान था। मैंने अगले दिन सबसे पहले अपने ऑफिस में फोन करके हाफ डे लिया और गांव के ही अपने एक दोस्त को लेकर ‘आम के बाग’ में बिकने वाली स्मैक के अड्डे का स्टिंग ऑपरेशन करने चला गया।

मैं खरीददार बनकर स्मैक की सप्लाई करने वाली औरत के पास अपने मोबाईल फोन का कैमरा ऑन करके चला गया। मैंने उससे स्मैक मांगी, उसने झट से मना कर दिया, क्योंकि ये लोग काफी शातिर किस्म के होते हैं। सामने वाले इंसान के हावभाव देखकर ही अंदाज़ा लगा लेते हैं कि कौन नशेड़ी है और कौन नहीं।

जब मेरे द्वारा ज़िद किए जाने पर उस औरत को शक हुआ तब उसने वहां सुरक्षा के लिए मौजूद बदमाशों को बुला लिया। मैंने देखा उन लोगों के हाथों में अवैध हथियार थे जिसको हम आम भाषा में कट्टे या तमंचे बोलते हैं। इन हथियारों को ये लोग पुलिस के अचानक छापा पड़ जाने की सूरत में अपने बचाव के लिए रखते हैं। हथियार देखकर मेरे रौंगटे खड़े हो गए। जिसके बाद मैं वहां से खिसक गया लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और अपने दोस्त को इस काम को अंजाम देने के लिए मनाना शुरू कर दिया।

मैंने उसकी जान जोखिम में डाल दी। मैंने उसको स्मैक का ग्राहक बनाकर बाग में दोबारा भेजा लेकिन इस बार हमारी किस्मत अच्छी थी, क्योंकि वहां वह औरत मौजूद नहीं थी। मैंने प्लान के मुताबिक स्मैक खरीदते हुए अपने दोस्त की तस्वीर खींच ली जिनमें वह स्मैक खरीददार नज़र आ रहा था। अखबार में एक बड़ी स्टोरी के लिए यह फोटो पर्याप्त था। सफेद कुर्ते पैजामे में मेरा दोस्त नाबालिग अफीम तस्करों से अफीम खरीदते हुए नज़र आ रहा था।

मैं अपना काम निपटा कर सीधे अपने संपादक को फोन किया कि आज मेरे पास ज़िले की बहुत बड़ी खबर है। संपादक जी ने जब सारी बात सुनकर मुझे शाबाशी दी, तब मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

मैं आम के बाग से वापिस अपने मामा के घर आकर चुपचाप तैयार हुआ और ऑफिस चला गया। मुझे नहीं पता था कि आगे मैंने कितना बड़ा खतरा मोल ले लिया है। मैंने एसएसपी से बात की और शाम 4 बजे तक अपने नाम से पूरी खबर लिखी। एसएसपी को जब मैंने बताया कि मेरे पास पूरे सबूत हैं तब उन्होंने वहां छापा डलवा दिया। पहले ही भनक होने के कारण उन लोगों ने वहां से स्मैक छुपा दी थी और सारा सफाया कर दिया था। पुलिस को मौके पर कुछ नहीं मिलने के कारण उन्हें छोड़ना पड़ा। खैर, मुझे बस यह था कि कल पूरे ज़िले में मेरे नाम से एक बड़ी खबर लगेगी।

लेकिन शाम को जो हुआ वह बहुत डरावना था। मेरे मामा का फोन आया कि उनके पास कुछ हथियार बंद लोग आए थे जो मेरे बारे में पूछ रहे थे। जब उन्होंने मुझसे पूरा मामला पूछा, तब मैंने उन्हें सारी बात बताई। उन्होंने कहा, वे लोग बोलकर गए हैं कि अगर खबर छपी तब अंजाम बुरा होगा। मामा की इस बात ने मुझे और चिंता में डाल दिया लेकिन उन्होंने मुझे बीच का रास्ता बताते हुए कहा कि तुम खबर दो, बस इतना करना कि खबर में अपना नाम मत देना, क्योंकि गांव से नशा खत्म करवाना मामा भी चाहते थे।

मैंने संपादक को फोन करके खबर से मेरा नाम हटाने को कहा, जो मेरे लिए काफी मुश्किल था। संपादक ने बात मानते हुए मेरी जगह क्राईम रिर्पोटर का नाम दिया ताकि माफियाओं को मुझ पर और मेरे मामा पर शक ना जाए। अगले दिन वह खबर क्राईम रिपोर्टर के नाम से छप गई लेकिन मैंने अपने दोस्त को उस खबर में स्मैक खरीदते हुए दिखा दिया था, जबकि वह गांव का ही रहने वाला था। अखबार में लगे फोटों में लोगों ने उसे पहचान लिया।

अमर उजाला में प्रकाशित ड्रग स्टिंग की खबर

इसके बाद उसे काफी धमकियां मिलने लगीं। हालांकि वो डरा नहीं और गांव से नशे को खत्म करने के लिए मेरे साथ खड़ा रहा। हालात ऐसे हो गए कि अब मामा के घर जाना और अमर उजाला में बने रहना खतरे से खाली नहीं था। अगले दिन मैंने अमर उजाला अखबार छोड़ दिया। अखबार छोड़ने का मकसद था कि माफियाओं का ध्यान पूरी तरह से डाइवर्ट रहे। उस दिन मैंने नौकरी छोड़कर कई लोगों के उपर से खतरे को टालने की कोशिश की और ज़िदगी से एक बहुत बड़ा सीख लिया।

मौजूदा समय में कई युवा पत्रकार इस तरह का खतरा मोल ले लेते हैं। ऐसे में पत्रकारिता जगत में जोश के साथ होश का होना बहुत ज़रूरी है। सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि अगर आप कोई ऐसी खबर कर रहे हैं जहां खतरा हो सकता है, तब इसकी जानकारी पुलिस को ज़रूर दें।

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