किसानों को डराकर आंदोलन खत्म कराने वाली सरकार की यह कैसी मंशा?

किसानों को हमारे देश का भाग्य विधाता माना जाता है और जब वे ही भुखमरी, आत्मदाह और आत्महत्या करने को विवश हो जाएं तब आप उस देश की खेती और किसानों के बारे में अंदाज़ा लगा सकते हैं। यह तय है कि जैसे-जैसे उत्पादन में उद्योग, धंधे और पूंजी का महत्व बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे किसानों की हालत बिगड़ती जाएगी। अधिकांश किसान मध्यमवर्ग के होते हैं जिनकी आर्थिक हालत उतनी अच्छी नहीं होती है।

भारत में औद्योगीकरण के बढ़ते कदमों ने किसानों का जीना मुश्किल कर दिया है लेकिन एक बात समझ लेना ज़रूरी है कि भारत की खेती का मतलब केवल खेती नहीं बल्कि यह हमारी सभ्यता और संस्कृति का चिन्ह है।  सरकार यदि इनके प्रति सचेत नहीं हुई तब काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। यह आंदोलन तो एक भूमिका मात्र है।

हमारे बुजुर्ग लोग कहते हैं कि जब हमलोगों को पहले किसानों पर लेख लिखना होता था तब एक ही वाक्य सबसे पहले ज़हन में आता था और वह है, भारतीय किसान कर्ज़ में पैदा होते है, कर्ज़ में जवान होते है और कर्ज़ में ही मर जाते है लेकिन अब विकास के साथ-साथ हालत भी बदल गई है। अब हर साल लाखों किसान जवान होने से पहले ही आत्महत्या कर लेते है।

सबसे दुःखद पहलु यह है कि सरकार अपने आप को किसान का सरकार बताती है और किसानों की आत्महत्या थमने का नाम ही नहीं ले रही है। किसानों के कल्याण के लिए नई नीतियां बनती हैं जिसका फायदा पूंजीपतियों को हो जाता है। उनके दिल्ली आने से लोगों को ऐतराज़ होता है कि राजधानी के राग-रंग की बर्बादी हो जाएगी। शायद खेती-किसानी गुज़रे ज़माने के अवशेष मानें जाने लगे है। भारत में नकली शहरी सभ्यता के लिए किसान कौतूहल का विषय बन गए हैं।

एक बार किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों का एक विशाल प्रदर्शन दिल्ली में हुआ था। शहरी लोग उन्हें ऐसे देखने के लिए जमा हो गए जैसे किसान पिछली सदी के अवशेष है। किसानों की बहुत सारी समस्याएं हैं, जैसे – खाद, बीज, दवाईयां और डीजल के बढ़ते दाम उनका सिरदर्द और बढ़ा रहे हैं।

कभी-कभी तो सरकार इन अनाजों का कम दाम पर ही आयात कर लेती है। हर साल औसत किसानों के साथ ऐसा होता है कि उन्हें उनके लागत से भी कम पैसे मिलते हैं। इस बात का अंदाज़ा तो अभी हाल ही में दिल्ली में एकजुट हुए किसानों से लगाया जा सकता है। फसल की लागत और फिर इन्हें बेचने की परेशानियों के बीच कर्ज़ भी इनके लिए मुश्किलें बढ़ाती हैं।

सरकार पूंजीपतियों को सस्ते दर पर कर्ज़ देती है और वापस नहीं मिलने पर उसे बट्टे खाते में डाल देती है। कर्ज़ नहीं लौटाने पर भी उनके सेहत पर कोई खास असर नहीं होता है लेकिन किसानों को अधिक ब्याज़ दर पर कर्ज़ मिलता है। इस बात का क्या औचित्य है कि ट्रैक्टर या अन्य कृषि उपकरणों के लिए ब्याज़ दर बारह से चौदह प्रतिशत हो। मौसम की मार से परेशान किसान यदि समय पर कर नहीं चुका सके तो इस दर में वृद्धि भी हो जाती है। यदि उनके साथ कोई दुर्घटना घट जाए, कोई गंभीर बीमारी हो जाए तब तो जीवन संकट में पड़ जाता है।

बुढ़ापे की सुरक्षा के लिए उनके पास कुछ बच ही नहीं पाता है। इस तरह से एक असुरक्षित किसान अपने जीवन को ही बोझ समझने लगते है।एक आम आदमी की तरह ही किसान को भी एक अच्छी जीवन जीने की लालसा रहती है। उन्हें यह भी पता है कि सरकार अपने प्रचार-प्रसार के लिए करोड़ों रुपए खर्च करती है, फिर वे आंदोलन क्यों ना करें।

भारत के लोगो को यह नहीं भूलना चाहिए कि महात्मा गांधी किसान परिवार से नहीं थे लेकिन उन्होंने ये समझा कि यदि अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन को सफल बनाना है तो किसानों को साथ लेने होगा।

ये समझना ज़रूरी है कि किसानों और मध्यमवर्गीय आंदोलनों में एक अंतर है। किसान लंबे समय तक संगठित होकर लड़ सकते है। उन्हें डराकर आंदोलनों को खतम करना संभव नहीं है।

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