#राजस्थानचुनाव2018: मैं एक नया वोटर हूं और काफी गुस्से में हूं

मैं राजस्थान के हनुमानगढ़ विधानसभा सीट का एक नया वोटर हूं और मैं बेहद से भी अधिक गुस्सा हूं। जानना चाहते हैं क्यों? सन् 1994 में इस शहर को ज़िला का दर्जा मिला, लेकिन उससे पहले 1990 से ही पूर्व विधायक आत्माराम चौधरी के बेटे विनोद कुमार यहां से काँग्रेस के टिकट से जीतकर विधायक थे। 1993 में फिर चुनाव हुए और भाजपा से डॉक्टर रामप्रताप, काँग्रेस के विनोद कुमार को हराकर विधायक बने। उसके बाद से दोनों राष्ट्रीय पार्टी इन दोनों पर ही विश्वास जताती आ रही है, ये लोग अपनी सरकार के दौर में मंत्री भी बनें।

दोनों दल अपनी सरकार के कार्यकाल में हुए विकास की गाथा गा रहे हैं पर असल में हुए विकास का इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 25 साल से ज़्यादा के वक्त में हनुमानगढ़ इन दोनों के अलावा एक भी ऐसा नेता पैदा ना कर सका जो कि हनुमानगढ़ के लोगों का विधानसभा में जनप्रतिनिधित्व कर सके।

विकास की बात तो छोड़ ही दें, इतने सालों मे इन लोगों को लगभग एक पूरी पीढ़ी से उनके राजनीतिक अवसर छीनने के लिए क्या शर्मसार नहीं होना चाहिए? बेशक, पर क्या करें राजनेता हैं। यही पहचान होती है ना एक सफल राजनेता की?

जितना निराश मैं जनप्रतिनिधियों से हूं, उतना ही मैं यहां के वोटरों से खफा हूं, जो आज फिर इनके झंडे उठाए खड़े हैं। वो कहते हैं ना “शर्म मगर हमको आती नहीं”। ज़िंदाबाद के नारे भी लगाए जा रहे हैं। क्षेत्र में TINA (there is no alternative) फैक्टर बेहद गंभीर समस्या बनकर उभरा है, जिसका मतलब होता कि कोई भी विकल्प नहीं है। इससे जुड़ा हुआ मैंने एक thread लिखा था, जो मैं यहां शेयर कर रहा हूं। आज सबसे बड़े बदलाव की ज़रूरत वोटर की अप्रोच में है।

1. आज का पाठ

मै वोटर हूं

#शर्म_मगर_हमको_आती_नहीं #राजस्थानचुनाव2018

2.वोट एंड सपोर्ट इसे, वोट एंड सपोर्ट उसे।
क्या यार ऐसा करना क्या राजनीति होता है क्या?
सवाल पूछा उनसे कोई? नहीं ना
तो क्या राजनीति समझते हो?

#शर्म_मगर_हमको_आती_नहीं #राजस्थानचुनाव2018

3. सवाल पूछते क्यूं नहीं हो ?

पूछना ही नहीं आता या डर के मारे सब बीच में ही हो जाता है?

#शर्म_मगर_हमको_आती_नहीं #राजस्थानचुनाव2018

4.जानते हो हमारे नेता लोग हर बार कैसे इतनी आसानी से हमसे झूठ बोलकर निकल लेते हैं?

क्योंकि जैसे वो लोग वादे कर मुकर जाते हैं वैसे हम भी तो पांच साल ये कहने के बाद कि इस बार वोट मांगने आएंगे तो ये कहेंगे, ये पूछेंगे कहकर रह जाते हैं। सही समय पर सवाल जवाब के बजाय चुनावी चटकारे लेना ही पसन्द करते हैं। कुछ फेसबुक DP बदल लेते हैं,या कुछ लोग ज़्यादा ज़ोर से ज़िन्दाबाद का नारा लगाने का प्रयास करते हैं।

और जो बच जाते हैं वो मेरी तरह ज्ञान बांटते हैं।

#शर्म_मगर_हमको_आती_नहीं #सवाल_ही_अस्तित्व_है #राजस्थानचुनाव2018

5. क्या बोले थे?

रोज़गार मांग कर शर्मिन्दा करेंगे

पेट्रोल के दाम बता शर्मिन्दा करेंगे

टूटी सड़क दिखा शर्मिन्दा करेंगे

किसान की दास्तां सुना शर्मिन्दा करेंगे

अपना हर दर्द बयां कर शर्मिन्दा करेंगे

पर हुआ क्या-

ज़िन्दाबाद के नारे लगा उसने मुझे-तुझे हर अपने को शर्मिन्दा किया

#शर्म_मगर_हमको_आती_नहीं  #राजस्थानचुनाव2018 #मैंवोटरहूं

6. क्या आप अपना नेता चुनने के बारे में परेशान हैं? नहीं…?

तो बहुत खराब बात है, जल्दी हो जाइए, क्योंकि पांच साल तक फिर मौका नहीं मिलेगा।
#शर्म_मगर_हमको_आती_नहीं

हममें से हर कोई, जो कि राजनीतिक विशेषज्ञ होने का दावा करता है, दो घंटे तक लेक्चर दे सकता है। पूरे पांच साल किसी ना किसी चौराहे नुक्कड़ गली-मोहल्ले क्लास ऑफिस में खड़े होकर बड़ी आसानी से कहते रहते हैं हमसब कि सब नेता एक जैसे हैं, उनकी गलती बताते हैं, उनसे छुटकारा पाने की बात करते हैं। आज जब चुनाव आए हैं, सवाल पूछने का मौका आया है तो वो लोग सब भूलकर जय-जय, ज़िंदाबाद के नारे लगाते फिर रहे हैं। मुझे भी कुछ लोग, कुछ पार्टी पसंद है, कुछ नहीं हैं लेकिन इसबार मैंने ये निर्णय तो लिया है कि किसी का झंडा पकड़कर नहीं घूमना है।

आपकी, मेरी और हमसब की ज़िम्मेदारी सवाल पूछने की है, वो सवाल जो पांच साल से रटते आए हैं। राजनीति में सबसे उच्च स्थान सवालों का है, ना की चुनावों का। चुनाव हमारे लिए मुद्दों का स्वरूप होना चाहिए ना की खट्टी-मीठी बातों का इवेंट।

तो बड़े हो जाइए, और कुछ नहीं तो ये ज़िंदाबाद वगैरह कहना तो छोड़ दीजिए। कोई इंसान ज़िंदाबाद नहीं होता है, और खासकर जब पेशे से नेता हो। सवाल पर सवार हो जाइए क्योंकि सवाल में ही अस्तित्व है।

हमें ईवीएम मशीन का बटन दबाने वाली मशीन नहीं बनना है।

टिकट वितरण के बाद जब साफ हो चुका है कि दोनों पार्टी से ही कोई फिर से विधायक बनेगा, मैं खुद को एक निहायती मूर्ख नागरिक और बेबस इंसान मानकर मायूसी में बैठा हूं। इसी बीच मेरे घावों पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं दोनों पार्टी के आईटी सेल। सब चीज़ों के बाद एक सोशल मीडिया तो बचता है, जो अपना लगता है लेकिन अभी इस पर भी इनका प्रोपागांडा चल रहा है। हमेशा की तरह बीजेपी वालों का थोड़ा ज़्यादा और काँग्रेस का थोड़ा कम चल रहा है। दोनों ने ही जनता के इकलौते, खुद के स्पेस को छीनने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है।

अब और नहीं, सोशल मीडिया पर जनता की ही बात होगी, जनता के मुद्दों की ही बात होगी। मुझे ज़रा सा भी फर्क नहीं पड़ता कि प्रत्याशियों को सेब से तोला जा रहा है या लड्डू से। इस लेख को मैं दोनों पार्टी को एक नए वोटर के उत्साह को गुस्से में बदलने के लिए बधाई देकर ख़त्म करूंगा।

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