इन तीन उपायों से प्रदूषण पर किया जा सकता है नियंत्रण

द इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर में विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ‘एयर पॉल्यूशन एंड चाइल्ड हेल्थ: प्रिसक्राइबिंग क्लीन एयर’ के हवाले से बताया गया है कि वर्ष 2016 में भारत में 5 वर्ष से कम वायु प्रदूषण के कारण मरने वाले बच्चों की संख्या 1 लाख के करीब थी। यह संख्या विश्व में 5 वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्यु का पांचवा भाग है।

इन मौतों में 5 वर्ष से कम आयु की बच्चियों का प्रतिशत भारत में 55 प्रतिशत के लगभग है व 5 से 14 वर्ष की आयु के बीच यह प्रतिशत बढ़कर 57 प्रतिशत के लगभग हो जाता है। (वर्ष 2016 में 5 से 14 आयु वर्ग के बच्चों की वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें 7000 हैं, जिसमें से बच्चियों की संख्या 4000 के लगभग हैं)।

यदि हम भारत की तुलना इसके अन्य पड़ोसी देशों से करें तो बांग्लादेश में 11,487, भूटान में 37, चीन में 11,377, म्यांमार में 5,543, नेपाल में 2,086, पाकिस्तान में 38,252 व श्रीलंका में 2016 में 5 वर्ष से कम मरने वाले शिशुओं की संख्या 94 है।

प्रति लाख बच्चों पर यह आंकड़ा 96.6 बच्चियां व 74.3 बच्चे हैं, जो 5 वर्ष से कम आयु वर्ग में आते हैं। वहीं 5 से 14 आयु वर्ग में प्रति लाख पर 3.4 बच्चियां व 2.3 बच्चे हैं।

इन आंकड़ों को देखने पर यह पता चल रहा है कि प्रदूषण के प्रभाव से ज़्यादा खतरा इस देश में पल रही बच्चियों को ही है। मेरे विचार से इसका कारण माता-पिता की बच्चियों की परवरिश में लापरवाही व ध्यान ना देना हो सकता है क्योंकि अभी भी भारतीय समाज अपनी पुरुषवादी सोच से बाहर नहीं आ पाया है।

भारत में बढ़ते प्रदूषण का स्तर एक चिन्ता का विषय है परन्तु आज इतने सारे संसाधनों के बावाजूद भी हम प्रदूषण के स्तर को कम कर पाने में नाकाम ही साबित हुए हैं। भारत, जो कि एक विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, आज अफ्रीका के निम्न आय वर्ग के देशों के साथ, प्रदूषण नियन्त्रण में नाकाम होने पर खड़ा है।

हमारे देश के करीब एक दर्जन से अधिक शहर विश्व के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की सूची में गिने जाते हैं। उत्तर-भारत का ‘कानपुर’ शहर वर्ष 2016 में विश्व का सबसे प्रदूषित शहर घोषित हुआ है।

देश में नदियों के प्रदूषण स्तर में कोई सुधार नहीं हुए है। हालांकि नदियों की सफाई हेतु कार्य योजना व कार्यक्रम बनाये गये हैं परन्तु काम होता नहीं दिख रहा है। जहां हम पहले खड़े थे आज भी वहीं खड़े हैं।

पर्यावरण से जुड़े न्यायिक मामले देखने हेतु हमारे देश में एक राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण भी कार्य रहा है। साथ ही कई कार्यक्रम समय-समय पर सरकार व गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा चलाये जा रहे हैं। इसके बावाजूद भी लोगों में पर्यावरण के प्रति चेतना जगाने में हमारा समाज असफल ही रहा है।

देश की राजधानी दिल्ली में तेज़ी से बढ़ते प्रदूषण के कारण आज वहां तमाम चीज़ों पर रोक लगाने की नौबत आ गई है। यदि हम अभी भी नहीं जागे तो आगे इससे भी भयावह परिणामों का सामना हमें करना पड़ सकता है। पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहे गैर सरकारी संस्थाओं की सच्चाई सभी को पता है, जहां केवल सरकारी पैसे व विदेशों से मिलने वाली मदद को ठिकाने लगाया जाता है। कुछ एक संस्थाओं को छोड़कर बाकी किसी काम के नहीं हैं।

यह सबसे सही समय है जब विश्व बिरादरी को एक करके पर्यावरण प्रदूषण के क्षेत्र में कुछ किया जा सकता है। प्रदूषण से निपटने हेतु वर्तमान में मौजूद पर्यावरण हितैषी तकनीक को अपनाकर व लोगों को भी इन तकनीकों को अपनाने के लिये प्रेरित कर प्रदूषण के बढ़ते प्रभाव को कम किया जा सकता है।

इन उपायों से कर सकते हैं प्रदूषण पर नियंत्रण

वर्तमान में बिजली से चलने वाले हल्के वाहनों के प्रयोग को बढ़ावा देना बहुत आवश्यक है जो आने वाले भविष्य में ईंधन से चलने वाले वाहनों की जगह लेंगे। इससे वायु प्रदूषण को कुछ हद तक खत्म करने में सहायता मिलेगी।

इसके साथ कचरा प्रबंधन में भी आधुनिक तकनीकों का सहारा लेना चाहिये, जिससे कचरा पर्यावरण के लिये खतरा ना बने। इसके लिये जन जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं व लोगों से अपील की जा सकती है कि अपने आम जीवन में 3R का प्रयोग करें जिसका अर्थ है, Reduce अर्थात कचरा पैदा करने वाली वस्तु का अपने दैनिक जीवन में कम-से-कम प्रयोग करना। उदाहरण के लिये पॉलिथीन या उसमें आने वाले सामान।

फिर आता है Reuse मतलब किसी भी वस्तु का एक बार उपयोग होने पर उसे सीधे कचरे में ना फेंककर उसका किसी और प्रकार से उपयोग करना। उदाहरण स्वरूप टी बिग्स या चाय की पत्ती को चाय बना लेने के बाद खाद के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है। इसके बाद आता है Recycle इस प्रक्रिया में कचरे का विघटन करके उससे कोई और वस्तु बनाकर प्रयोग में लाई जाती है। जैसे पुराने अखबार को गलाकर उसकी फिर से लुग्दी तैयार करना।

स्कूलों में पर्यावरण केवल विषय के तौर में ना पढ़ाकर, बच्चों में एक चेतना के तौर पर जगाया जाना चाहिये। कार्यशालाएं इसका बहुत अच्छा माध्यम हो सकती हैं, जिनमें बच्चे पर्यावरण के अनुकूल व्यवहार करना सीखें।

पर्यावरण के प्रति जन सामान्य में चेतना का विकास करना भी आवश्यक है क्योंकि पर्यावरण है तो हम हैं।

(नोट- उपरोक्त संदर्भित आंकड़ो की पुष्टी WHO की रिपोर्ट के हवाले से 30 व 31 अक्टूबर 2018 के ‘द इण्डियन एक्सप्रेस’ में छपी रिपोर्ट से की जा सकती है।)

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