2018 में ईश्वर, अल्लाह के द्वंद में किसान बदहाली का मुद्दा विलुप्त हो गया

कुछ ही दिनों में यह साल भी गुज़र जाएगा और अपने पीछे छोड़ जाएगा कई सवाल, जो गुज़रते समय के साथ अपनी जगह इतिहास के पन्नों में बनाएगा। सवाल जिनके जवाब तलाशना मुनासिब नहीं समझा गया देश के रहनुमाओं द्वारा, ना ही संचार तंत्र ने अपना कैमरा उन मसले की तरफ मोड़ने की ज़हमत उठाई। जो तस्वीर कैमरों में अपनी व्यापक जगह नहीं बना पाई, वो आम जन के मानस पटल पर एक भयावह दृश्य रच गई। जिसकी जवाबदेही भावी काल में उन तमाम लोगों से मांगे जाएंगे, जिन्होंने उन सवालों से अपना मुंह फेर लिया।

2018, इस वर्ष कई बड़ी किसान रैलियां हुईं, जो मज़हब के ध्रुवीकरण एवं सांप्रदायकि मुद्दों के बादलों की ओट में छुप गई। जिस वक्त राम मंदिर मुद्दा गरम हो रहा था, उसी वक्त हज़ारों किसान पैदल चलकर दिल्ली की तरफ कूच कर रहे थे। लुटियन दिल्ली का दरबारी संचार मिलों जाकर अयोध्या में धर्म की चौपाल लगाने और आम जन की भावना को सुलगाने में संलग्न था। टीवी चैनलों से कुछ ही दूर जो किसान देशभर से एकत्रित होकर अपनी व्यथा और बदहाली की ओर अवाम का ध्यान आकर्षित करना चाहते थे, उसे संचार तंत्र ने धर्म के आगे तरजीह देना उचित नहीं समझा। दरबारी मीडिया के इस बेहद असंवेदनशील रवैये से सवाल यह भी उठता है, “क्या उनके घर अनाज धर्म की चक्की का आता है”।

सरकारों और उनके तमाम मीडिया की संवेदनहीनता कोई नई नहीं है। हमने दो वर्ष पूर्व भी तमिलनाडु के किसानों को दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेशाब पीकर, चूहों को मुंह में दबाकर, मानव कंकाल ओढे, नम आंखों से अपनी बदहाली की कहानी सुनाते देखा था। फिर पिछले साल मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसान आंदोलन के दौरान छह निर्दोष किसानों की पुलिस की गोलियों से निर्मम हत्या हमने देखी थी। इस घटना से भी कुम्भकरण की असंवेदनशील नींद में सो रही राज्य और केंद्र की सरकारों की नींद में ज़रा सी भी खलल नहीं पड़ी।

इस साल के आरंभ में ही राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद में, किसानों के पैरों के छाले छुप गए, जिनसे वे नंगे पांव नासिक से मुम्बई पैदल चलकर आए थे। ईश्वर और अल्लाह की द्वंद में किसान बदहाली का मुद्दा ऐसे विलुप्त हो गया जैसे नदियों के संगम में किसी नदी का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

इसी बीच दो अक्टूबर आ गया राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों महान हस्तियों का जीवन ही किसान संघर्ष को दिशा देने के यत्न से परिपूर्ण होता है। गांधी का चंपारण सत्याग्रह भूमिहीन मज़दूर एवं गरीब किसानों के अग्रेजों द्वारा शोषण के विरुद्ध एक सशक्त जनविद्रोह था। लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा बुलंद किया था।

इस अवसर पर जो किसान राजघाट पर जाकर बापू को श्रद्धांजलि अर्पण करना चाहते थे, उन्हें आंसू गैस के गोले और पुलिस की बरसती लाठियां अपने बदन पर खानी पड़ी। यह मंज़र हमें इतिहास के पन्नों में दमनकारी क्रूर अंग्रेज़ी हुकूमत के शोषण की याद बखूबी दिला गया। इसे विडंबना कह लीजिए जिस दिन सारी दुनिया में अहिंसा पर्व मनाया जा रहा था, उसी दिन गांधी के देश में शासन किसानों पर लाठियां बरसा रहा था।

प्रेमचंद के गोदान में होरी की कहानी से आज के किसानों की बदहाली बिलकुल अलहदा नज़र नहीं आती है। कर्ज़ के पहाड़ों में डूबे किसान की आत्महत्या के किस्से अखबार की सुर्खियों से दूर किसी अज्ञात पन्ने पर विलुप्त होते प्रजाति की तरह अपनी दुर्दशा बयान करता है। जिस मुल्क में किसान की जान की कीमत इतनी सस्ती हो वो और कुछ भी हो पर कृषि प्रधान देश नहीं हो सकता है।

इस साल कृषि मंत्रलाय की रिपोर्ट के अनुसार जिस नोटबन्दी का ढोल हर मीडिया पर केंद्र सरकार द्वारा पीटा गया उसने किसान की कमर तोड़ दी। नोटबंदी के बाद नगदी की कमी की वजह से ग्रामीण भारत में हताशा के हालात पैदा हुए। यह बात कृषि मंत्रालय ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति को सौंपे एक बैकग्राउंड नोट में मानी है। नोट के मुताबिक बहुत सारे किसान बीज और खाद नहीं खरीद सकें। नोटबंदी जैसी नीतियों ने किसानों के ज़ख्मों पर नमक रगड़ने का काम किया है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। किसानों का कहना है कि फसल बीमा के प्रीमियम तो काटे जाते हैं लेकिन समय पर पैसा नहीं मिलते हैं। 29-30 नवंबर को दिल्ली में हुई किसान रैली में ज़्यादा से ज़्यादा किसान फसल बीमा को लेकर सवाल उठा रहे थे। किसी को फसल नष्ट होने के बाद बीमा का मुआवज़ा नहीं मिला था तो किसी को बहुत कम पैसा मिले थे और किसी को पैसे मिलने के लिए कई महीने लग गए थे। इस दौर की बीमा कंपनियां क्या हमें अंग्रेज़ों के गुलाम भारत के महाजन और बनियों की याद नहीं दिलाती, जिनका एकमात्र धर्म किसानों की चिताओं पर अपनी रोटियां सेंकना था।

हमारे पास पूंजीपतियों के कर्ज़ माफी के लिए धन है किसानों के कर्ज़ों के लिए लाखों खोखले वादे। समाज में उत्पन्न परस्पर विरोधाभासी स्थिति के दर्शन आप स्वयं ही पा सकते हैं। बशर्ते आपकी आंखें खुली हो, जहां बैंकों में नॉन परफार्मिंग एसेट में लगातार हो रही असंख्य वृद्धि और दूसरी तरफ स्वामीनाथन आयोग के न्यूनतम लागत मूल्यों की सिफारिशों का ज़मीन पर बेहद लचर क्रियान्वयन।

वर्ष 2018 जहां कृषि संकट के भयावह मंज़र विकट परस्थितियों की ओर इशारा कर रहे हैं, वहीं बदरंग सियासत आवाम पर मज़हब का रंग चढ़ाकर ध्रुवीकरण के हथियार से टकराव की ज़मीन तैयार करता नज़र आया। निसंदेह आगामी चुनाव में देश में धर्म के हवन कुंड में असल मुद्दों को भस्म किया जाएगा। कृषि जैसे अहम मुद्दे चुनाव की कसौटी से महरूम रह जाएंगे।

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