आखिर क्यों सफल नहीं हो सका भारतीय सेना का ऑपरेशन पवन

31 साल बीत चुके हैं लेकिन ऑपरेशन पवन भारतीय सेना के लिए आज भी नासूर है, जिसे भारतीय सेना कभी याद नहीं रखना चाहेगी। दिन था 13 अक्टूबर, 1987, भारतीय सेना की रणनीति ऐसी फेल हुई कि इस मिशन में कई सैनिक मारे गएं। सेना की सारी रणनीति धरी-की-धरी रह गई।

13 अक्टूबर, 1987 को आखिर श्रीलंका में क्या हुआ था जानिए-

भारतीय सेना को खुफिया एजेंसियों से मिला इनपुट-

टापूओं के बीच घिरा श्रीलंका देश आज जितना खूबसूरत है, साल 1987 में ये उतना ही डरावना था। इस देश की खूबसूरत वादियों के पीछे कई आतंकवादी संगठन काम कर रहे थे। खैर, उत्तरी श्रीलंका में एक छोटा शहर है, जिसका नाम है पलाली। पलाली शहर में भारतीय सेना के इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (IPKF) का बेस कैंप था, जहां इंडियन पीस कीपिंग फोर्स श्रीलंका में चल रहे विद्रोह प्रदर्शन को थामने की कोशिश कर रही थी।

इंडियन पीस कीपिंग फोर्स का बेस कैंप जाफना क्षेत्र के और श्रीलंकाई मुख्यभूमि के बीच संपर्क करने का अहम केंद्र था। जाफना शहर में जाफना यूनिवर्सिटी थी, जिसे विद्रोही संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम अपनी गतिविधियों को चलाने के लिए प्रयोग करता था। माना जाता है कि इस यूनिवर्सिटी पर लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम ने कब्ज़ा ही इसलिए किया था।

श्रीलंका में मौजूद भारतीय खुफिया एजेंसियों को इनपुट मिलता है कि 11 अक्टूबर, 1987 को लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम के टॉप कमांडर्स की एक बड़ी मीटिंग होने जा रही है, जिसके बाद भारतीय सेना ने ऑपरेशन पवन डिज़ाइन किया। ऑपरेशन का मकसद था कि लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम के टॉप खूंखार कमांडर्स को मीटिंग के दौरान वहीं ढेर कर दिया जाएगा।

120 कमांडो, 60 जवान ऑपरेशन पवन के लिए श्रीलंका हुए रवाना

खुफिया एजेंसियों से इनपुट मिलने के बाद भारतीय सेना ने 120 कमांडो को तैयार किया। ये वो कमांडो थे जो किसी भी देश में जाकर मुश्किल हालात में युद्ध करने में सक्षम थे। कमांडो के साथ बैकअप के तौर पर 13वीं सिख लाइट इनफैंट्री के 60 जवान भी श्रीलंका के जाफना भेजे गए।

माना जाता है भारतीय सेना का यह एकमात्र ऐसा मिशन था जो बिना रणनीति के और बिना कोई खास ब्लूप्रिंट बनाए लड़ा गया, जिसमें भारतीय सेना का नुकसान होना स्वाभाविक था।

अधूरी योजना के तहत कमांडो और सेना के जवानों को हैलिकॉप्टर की मदद से श्रीलंका शहर के जाफना यूनिवर्सिटी के पास मैदान में उतारा जाना तय हुआ था। बता दें कि जिन कमांडो को हैलीकॉप्टर से नीचे लैंड कराना था, उनपर ज़िम्मेदारी थी कि वो बाकि कमांडो के उतरने के लिए ड्रॉप ज़ोन तलाश करेंगे, ताकि कमांडो की अगली खेप को सुरक्षित उतारा जा सके। माना जाता है कि भारतीय सेना ने ऑपरेशन पवन को कामयाब बनाने के लिए काफी प्लानिंग की थी लेकिन बुनियादी बात भूल गए थे।

ऑपरेशन पवन के बारे में लिट्टे संगठन को थी पहले से जानकारी

operation pawan
फोटो सोर्स- Bharat Rakshak

इंडियन पीस कीपिंग फोर्स यानि के IPKF और खुफिया एजेंसियों ने भारतीय सेना को इनपुट तो दे दिया कि 11 अक्टूबर को लिट्टे के टॉप कमांडर्स की मीटिंग होनी है लेकिन सेना को बुनियादी बात बताना ही भूल गए। वहीं सेना ने भी जल्दबाज़ी करते हुए अपनी तैयारियों का खांचा ही नहीं खींचा।

सेना के दिमाग में था कि भारतीय कमांडों ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर संगठन के आतंकियों को खत्म कर देंगे और सकुशल भारत लौट आएंगे। खैर, लिट्टे को इस पूरे ऑपरेशन के बारे में पहले से पता चल गया था। लिट्टे के लड़ाकों ने भारतीय और श्रीलंकाई सेना के रेडियो सिग्नल पकड़ लिए थे। सिग्नल को डिकोड करके उन्होंने जवाबी हमले की पूरी तैयारी कर रखी थी।

लिट्टे ने रातोंरात जाफना यूनिवर्सिटी को एक हमले के किले के रूप में तब्दील कर दिया गया था। यानि कि लिट्टे के लड़ाके बैचेनी से भारतीय सेना के जवानों और कमांडो का इंतज़ार कर रहे थे। इस सबकी भनक ना तो भारतीय सेना को थी और ना ही श्रीलंकाई सेना को लिट्टे संगठन की अंदरूनी तैयारियों के बारे में पता चला।

दुश्मन को कम आंकना भारतीय सेना पर पड़ा भारी

भारतीय सेना अपनी रणनीति के तहत रात के अंधेरे में 40 पैरा कमांडोज़ की टीम को जाफना यूनिवर्सिटी के मैदान में उतारती है। हालांकि इन 40 पैरा कमांडो को हैलीकॉप्टर उतारने में सफल होता है। जब ये कमांडोज़ बेफिक्र होकर अपनी पॉजीशन ले रहे थे, तब पहले से घात लगाए लिट्टे के लड़ाके गोलीबारी शुरू कर देते हैं।

गोलीबारी होने के बाद कमांडों कुछ समझ ही नहीं पाए। लिट्टे की ओर से भारी गोलीबारी के बीच कमांडोज़ हैलिकॉप्टर्स से दूसरी खेप में आने वाले कमांडोज़ के लिए ड्रॉप ज़ोन मार्क ही नहीं कर पाए। यानि कि पायलट के लिए ड्रॉप ज़ोन मार्क करना था, जहां वे कमांडोज़ हैलीकॉप्टर से नीचे उतरते।

जब अगला हैलिकॉप्टर कमांडोज़ की खेप को उतारने वहां पहुंचता है, तो सेना के पायलट को नीचे गोलीबारी का आभास हो चुका होता है। जिसके चलते पायलट को ड्रॉप ज़ोन नहीं मिला, यानि कि भारतीय सेना के कमांडों पूरी तरह से लिट्टे के बुने गए जाल में फंस चुके थे। नतीजा यह रहा कि पायलट ने बाकि कमांडोज़ को नीचे ही नहीं उतारा और वापस वापस बेसकैंप लौट गए।

जाफना की वो रात भारतीय सेना को भुलाए नहीं भूलती

हैलीकॉप्टर लौटने के बाद लिट्टे की प्लानिंग काम कर गई थी। अब उनका सामना महज़ 40 कमांडों से था, वो कमांडो भी पोजिशन पर फिक्स नहीं थे। पूरी तरह से लिट्टे ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया था। लिट्टे को पता था कि अगली खेप ज़रूर आएगी इसलिए उसने अपनी तैयारियों को पुख्ता कर लिया था।

लिट्टे का अगला कदम था, हैलीकॉप्टर आते ही उस पर मशीनगन से हमला कर धराशायी किया जाए। हैलिकॉप्टर के आते ही भारी हथियारों और मशीनगन से हमला शुरू कर दिया गया। हमले में पायलट घायल हो गए लेकिन बहादुरी दिखाते हुए किसी तरह कमांडों की टुकड़ी को नीचे उतार दिया गया।

हालांकि लिट्टे के स्नाइपर्स, कमांडोज़ को अपनी गोलियों का निशाना बना रहे थे। इंडियन आर्मी की प्लानिंग फेल हो गई। भारत के लिहाज़ से देखें, तो कुछ भी प्लानिंग के मुताबिक नहीं हो पा रहा था। 13वीं सिख लाइट इनफैंट्री के जवान भी समय पर नहीं पहुंचे थे।

वहीं लिट्टे की गोलीबारी के कारण जितने जवान भेजे जाने थे, उतने भेजे नहीं जा सके। कमांडो और लिट्टे के बीच 22 घंटे से अधिक तक लड़ाई हुई। भारतीय सेना के 6 पैरा कमांडो मारे गएं। वहीं 35 से अधिक बाकि जवान मारे गए। भारतीय सेना के कई जवानों की लाशें भी नहीं मिलीं।

भारतीय सेना के इतिहास में ऑपरेशन पवन एक नाकाम ऑपरेशन था। ऑपरेशन पवन एक काला दिन ही था, जो आगे 4 साल बाद 1991 में राजीव गांधी की हत्या की वजह बना था। राजीव गांधी की हत्या में लिट्टे का हाथ था।

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