“रोटी, कपड़ा और मकान की जगह ‘राष्ट्रवाद’ का होगा यह चुनाव”

राष्ट्रवाद यह शब्द नया नहीं है। इस शब्द का इस्तेमाल वर्षों से होता आ रहा है। आज़ादी के वक्त इस शब्द का इस्तेमाल किया गया था भारत देश के हर नागरिक को एकजुट करके अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ करने के लिए और उनसे अपना आज़ादी का हक लेने के लिए।

उस वक्त इस शब्द ने पूरे राष्ट्र को एक करके आज़ादी दिलाई थी परन्तु आज़ादी मिलने के बाद देश के सभी नेताओं (जो आज़ादी की लड़ाई में सबसे आगे थे) का मानना था कि आज़ादी तो मिल गई पर हम पूर्ण रूप से तभी आज़ाद होंगे जब हर नागरिक के पास रोटी, कपड़ा और मकान होगा। उस वक्त सिर्फ एक ही लक्ष्य था, देश के हर नागरिक के पास रोटी कपड़ा मकान हो, जिससे देश का भी विकास हो सके।

रोटी, कपड़ा, मकान ये तीनों चीज़ें एक चीज़ पर निर्भर थी, वह था रोज़गार। अर्थात अगर हर व्यक्ति के पास रोज़गार होगा तो बेरोज़गारी और गरीबी मिटेगी, हर कोई रोटी कपड़ा मकान अर्जित कर सकेगा और जब हर व्यक्ति का विकास होगा तो देश का भी विकास होगा।

इन सबको ध्यान में रखते हुए देश का संविधान बनाया गया और इन मूलभूत ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार द्वारा कई योजनाएं शुरू की गईं।

फोटो प्रतीकात्मक है। सोर्स- Getty

यह तो बात हो गई मूलभूत ज़रूरतों की, अब बात करते हैं राष्ट्रवाद क्या है या राष्ट्र क्या है?

  • क्या जय हिंद के नारे लगाना राष्ट्रवाद है?
  • क्या भारत माता की जय बोलना राष्ट्रवाद है?
  • या पड़ोसी मुल्क से बदला लेना राष्ट्रवाद है?

तो जवाब है ये सभी राष्ट्रवाद है लेकिन राष्ट्रवाद सिर्फ यही तक सीमित नहीं है। राष्ट्रवाद का असली मतलब राष्ट्र की एकजुटता और राष्ट्रहित है। राष्ट्र सिर्फ चुनिंदा नेता, राजनेता, सैनिकों, हिन्दू-मुस्लिम से नहीं बनता। राष्ट्र बनता है राष्ट्र के हर नागरिक से, चाहे वह अमीर हो या गरीब, हिंदू हो या मुस्लिम, सैनिक हो या किसान या फिर कोई आम आदमी हो। राष्ट्र के हर नागरिक की भलाई से राष्ट्रवाद झलकता है ना कि सिर्फ जयकारों से। जब हर व्यक्ति का विकास होगा तो ही राष्ट्र का विकास होगा।

बात करते हैं वर्तमान की, जहां चुनावी माहौल खूब ज़ोरों पर है। हर पार्टी अपना प्रचार-प्रसार ज़ोर-शोर से कर रही है। जनता को आकर्षित करने के लिए चुनावी मुद्दे बनाये जा रहे हैं। हर पार्टी अपने अलग-अलग चुनावी मुद्दे जनता के सामने पेश कर रही है, एक दूसरे पर दोषारोप भी लगा रही है।

जहां चुनाव में देश के लोगों की मूलभूत ज़रूरतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, वहीं हमेशा की तरह उन्हें छोड़कर अलग चुनावी मुद्दे बनाये जा रहे हैं। पहले जातिवाद, धार्मिक मुद्दा था अब इसमें राष्ट्रवाद को भी जोड़ दिया गया है।

अब रोटी, कपड़ा, मकान की बजाय राष्ट्रवाद पर होगा घमासान

आज ना जाने कितने किसान आत्महत्या कर रहे हैं, युवा रोज़गार के लिए भटक रहा है, लोग सड़कों पर और झुग्गी-झोपड़ियों में गुज़र-बसर कर रहे हैं पर इन चीज़ों को अनदेखा करके मुद्दा बना भी तो राष्ट्रवाद का, जिसमें राष्ट्र हित जैसी कोई बात नहीं है।

2011 की जनगणना के अनुसार 1.77 मिलियन लोग बिना घरों के हैं। ना जाने कब से आवास योजनाएं चल रही हैं फिर भी देश से यह समस्या खत्म नहीं हुई। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 45 किसान रोज़ाना आत्महत्या करते हैं। 45 वर्षों के सबसे चरम स्तर पर बेरोज़गारी 6.1 है, फिर भी इन सारी समस्याओं को अनदेखा कर राष्ट्रवाद, धर्म, मंदिर-मस्ज़िद, जातिवाद की राजनीति की जा रही है जो कि बेहद दुखद है।

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