प्रदूषण कभी चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?

देश में अगले महीने आम चुनाव होने हैं। चुनाव जनता को यह मौका देते हैं कि वे अपने हित से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक दलों के सामने लाएं। यही वह अवसर होता है, जब हमारे राजनेता जनता के समक्ष जाते हैं। इसलिए राजनीतिक दलों के सामने जनता से जुड़े मुद्दे उठाए जाने चाहिए।

वायु प्रदूषण जनता से जुड़ा एक बेहद ही संवेदनशील मुद्दा है, जिसे राजनीतिक दलों को अपने घोषणापत्र में शामिल करना चाहिए। हालांकि राजनीतिक दल आज तक ऐसा करने से बचते रहे हैं लेकिन जिस तरह से वायु प्रदूषण आम जनजीवन को प्रभावित कर रहा है, उसे देखते हुए अब बचना मुश्किल है।

वायु प्रदूषण को मुद्दा बनाना बेहद ज़रूरी

पिछले महीने ग्रीनपीस और आईक्यू एयर विजुअल द्वारा एक रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार यह तथ्य सामने आया कि 2018 में दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहरों की सूची में शीर्ष के 20 शहरों में से 15 प्रदूषित शहर भारत के हैं।

इन प्रदूषित शहरों में 6 शहर ऐसे हैं, जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित हैं। जैसे- गुरूग्राम, गाज़ियाबाद, फरीदाबाद, भिवाड़ा, दिल्ली और नोएडा। दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर गुरूग्राम रहा है, जबकि गाज़ियाबाद दूसरे स्थान पर है।

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इस रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली दक्षिण एशिया की सबसे प्रदूषित राजधानी रही है। यह रिपोर्ट हमारी व्यवस्था की पोल खोलते हुए बताती है कि भारतीय जनता और सरकार पर्यावरण को लेकर कितनी गंभीर है।

5 मार्च 2019 की एयर विजुअल की रिपोर्ट बताती है कि महाराष्ट्र के मुंबई शहर के पास ठाणे में देश की सबसे खराब हवा की गुणवत्ता दर्ज़ की गई है, जो वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) पैमाने पर खतरनाक आंकड़ा 354 को पार कर गया था।

ऐसे कई शहर हैं जो वायु गुणवत्ता सूचकांक के खतरनाक आंकड़े को पार कर गए हैं। यह रिपोर्ट हमारे शहरों के बढ़ते पर्यावरण संकट की तरफ इशारा करते हैं। इंडिया स्पेंड फरवरी 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार 10 में से 8 भारतीय शहरों में रहने वाले लोग वर्तमान में ज़हरीली हवा में सांस ले रहे हैं।

पटियाला के हालात बेहतर

सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा एक मूल्यांकन किया गया, जिसमें 74 शहरों में से केवल एक शहर पटियाला ने राष्ट्रीय सुरक्षित वायु मानकोंं को पूरा किया और लगभग 38 फीसदी शहरों ने सांस लेने में संघर्ष किया, जिसमें लखनऊ, वाराणसी, उज्जैन, पटना, दिल्ली, कोलकाता और सिंगरौली जैसे शहरों में खराब और बहुत खराब वायु गुणवत्ता दर्ज़ की गई है।

जयपुर, कलबुर्गी, जालंधर, मुंबई और पुणे सहित 35 शहरों ने मध्यम प्रदूषित हवा का सामना किया। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के हर छोटे-बड़े शहर प्रदूषण की गहरी मार झेल रहे हैं।

प्रदूषण की वजह से बढ़ते मौत के आंकड़े

7 दिसंबर 2018 को प्रकाशित इंडिया स्पेंड रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2017 में प्रदूषण की वजह से 12.4 लाख मौतें हुई। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि प्रदूषण की वजह से होने वाली मौतों में प्रत्येक 8 में से एक मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई है।

क्रॉनिक आव्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीस (सीओपीडी) भारत में मौत का हृदय रोग के बाद दूसरा बड़ा कारण है। सीओपीडी फेफड़े से संबंधित बीमारी है, जो भारत सहित विकासशील देशों में अधिकांश बाहरी और अंदरूनी वायु प्रदूषण के कारण होते हैं।

यह बीमारी विशेष रूप से बायोमास, लकड़ी और गोबर के जलने से निकलने वाले प्रदूषण से होते हैं। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज स्टडी के अनुसार 2017 में भारत में लगभग 10 लाख लोगों की मृत्यु इस रोग से हुई।

दिल्ली में प्रदूषण
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इस अध्ययन के मुताबिक हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड सहित सभी उत्तरी राज्यों में सीओपीडी की उच्च दर थी। कर्नाटक तथा केरल में भी हालात ऐसे ही थे लेकिन उत्तरी राज्यों में सीओपीडी का खतरा सबसे अधिक था।

इंडिया स्पेंड की जनवरी 2018 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में होने वाली कुल मौतों में 13 फीसदी मौतें सीओपीडी के कारण हुईं और 2016 में 75 लाख लोगों को इस बीमारी का खतरा था।

18 जनवरी 2018 को प्रकाशित इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट बताती है कि भारत में वर्ष 2015 में वायु प्रदूषण के कारण 10.9 लाख मौतों में से लगभग 75 फीसदी मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में हुई थीं, जो एक गंभीर संकट की तरफ इशारा करती है।

राजनेताओं के चुनावी वादों से कोसों दूर है प्रदूषण का मुद्दा

कई अन्य संस्थाओं द्वारा समय-समय पर ऐसी रिपोर्ट जारी होती रहती है, जो बताती हैं कि भारत समेत पूरे विश्व में पर्यावरण का संकट गंभीर होता जा रहा है। हालांकि कई देशों ने पहले ही इसपर काम करना शुरू किया है। भारत में भी कई दफा इस सदर्भ में पहल हुई है लेकिन चुनावी मुद्दा ना होने की वजह से राजनेताओं द्वारा इस मुद्दे पर बात नहीं होती है।

दुर्भाग्य यह है कि पर्यावरण किसी खास वोट बैंक से जुड़ा हुआ मुद्दा नहीं है। ऐसे में राजनीतिक दल चुनाव के समय पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बात ही नहीं करना चाहते हैं। कभी भी किसी राजनेता के मुंह से पर्यावरण को लेकर कोई बात सुनने को नहीं मिलती है।

भारतीय आम जनमानस भी पर्यावरण को लेकर बेहद उदासीन हैं। हमारे देश में चर्चाओं का अंबार लगा हुआ है लेकिन पर्यावरण को लेकर कहीं कोई विमर्श दिखाई नहीं देती है।

बदलते पर्यावरण के संकट राजनेताओं लिए कोई मुद्दा नहीं हैं। कोई भी नेता यह नहीं चाहता है कि पर्यावरण जैसे मुद्दों पर खुलकर बात हो या समाधान के लिए कोई रास्ता निकले।

जिस तरह शहरों में वायु प्रदूषण और अन्य प्रदूषणों में वृद्धि हो रही हैं, उन्हें लेकर इन शहरों में कोई जन-आंदोलन पैदा नहीं किया जाता है। ऐसा लगता है जैसे शहरों ने प्रदूषण के साथ जीना सीख लिया है और जब कोई जन-आंदोलन पैदा भी होता है, तब अकसर उसे सरकार विकास विरोधी मानकर दमन का रास्ता अख्तियार कर लेती है।

मीडिया का रवैया भी निराशाजनक

मीडिया के लिए पर्यावरण जैसे कोई मुद्दा ही नहीं है। वह मीडिया जो 24 घंटे कार्यक्रम करता है, उसके लिए पर्यावरण पर करने के लिए कुछ नहीं होता है। वर्तमान मीडिया के चरित्र को देखते हुए ऐसा लगता ही नहीं कि पर्यावरण जैसे मुद्दे पर भी कभी होने की ज़रूरत है।

हां, मीडिया को अगर लगता भी है कि पर्यावरण पर काम करना चाहिए, तो वह केवल दिल्ली की चिंताएं ही प्रकट करता है। देश के अन्य हिस्सों में फैले प्रदूषण पर मीडिया में कोई बात नहीं होती, जैसे लगता है मीडिया ने दिल्ली को ही संपूर्ण भारत मान लिया है।

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ऐसे में जब चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं, तो जनता को पर्यावरण और प्रदूषण जैसे मुद्दों पर बात करनी चाहिए। जन मुद्दे के रूप में प्रदूषण को राजनीतिक दलों के सामने रखते हुए बताना चाहिए कि यह मुद्दा भारत की संपूर्ण प्रजाति, जल, जंगल और ज़मीन से जुड़ा हुआ है।

यह हमारे जीवन को चौतरफा प्रभावित कर रहा है, जिससे राजनीतिक दलों पर एक दबाव बने और वह अपने घोषणापत्र में पर्यावरण संकट को भी शामिल करने पर विवश हो जाए।

नोट: आंकड़े ‘ग्लोबल एयर पॉल्यूशन 2018’ की रिपोर्ट से लिए गए हैं।

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