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क्या यूपी में अगड़ी जाति का वोट बीजेपी के पाले में है?

नरेन्द्र मोदी

नरेन्द्र मोदी

2019 लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों ने अपनी कमर कस ली है। साथ ही साथ मीडिया बंधु भी चुनाव कवरेज करने के लिए बड़े आतुर हो गए हैं।

यह लोकसभा चुनाव 2014 के लोकसभा चुनाव से बिल्कुल अलग है, क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ जब एनडीए सत्ता में आई थी, तब विपक्ष का पत्ता एकदम साफ था।

पीएम मोदी की नेत्रृत्व वाली एनडीए सरकार कई सारे वादों के साथ सत्ता में आई थी। प्रचंड बहुमत के बावजूद भी बहुत सारे महत्तवपूर्ण मुद्दों पर वह असफल भी हुए हैं।

उत्तर प्रदेश की सीटें बेहद महत्वपूर्ण

543 लोकसभा सीटों वाले भारत के लोकतंत्र के बादशाह की ताज़पोशी उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों वाले 80 लोकसभा सीटों में अधिकाधिक सीट प्राप्त करने पर काफी हद तक निर्भर करता है।

ममता बनर्जी। फोटो साभार: फेसबुक

उसके बाद महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश व राजस्थान जैसे अन्य राज्य जो इस दावेदारी को सशक्त बनाने में काफी अहम भूमिका निभाते हैं ।

बंगाल भेदना भी ज़रूरी

दक्षिण के राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा शुरू से ही रहा है। कभी-कभार काँग्रेस व भाजपा जैसे राष्ट्रीय पार्टियों के जादू का सिक्का वहां पर चल पाया है। 42 लोकसभा सीटों वाले पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में भी इस बार तृणमूल काँग्रेस की स्थिति 2014 के चुनाव से थोड़ी सी अलग ज़रूर होगी।

कई स्थानीय और निकाय चुनावों में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी की हालत पेचीदा हुई है। कुछ दमनकारी शक्तियों ने वहां के वोटर्स व विपक्षी दलों के लोगों पर अत्याचार किया है।

बिहार के बदले से तेवर

वहीं, 40 लोकसभा सीटों वाले बिहार में माहौल बदले से नज़र आ रहे हैं। भाजपा से गठजोड़ बनाने वाले जदयू को इस बार सीटें ज़्यादा मिली हैं व भाजपा ने अपनी सीटों की संख्या में कमी की है।

राफेल पर भाजपा को घेरने वाली शिवसेना अब भाजपा के साथ

पूर्ववर्ती लोकसभा चुनाव के मुकाबले 48 लोकसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में भी अभी देखना काफी दिलचस्प होगा कि भाजपा-शिवसेना की जोड़ी कितनी कारगर साबित होती है। राफेल मुद्दे पर शिवसेना ने भी काँग्रेस के सुर में सुर मिलाकर भाजपा का विरोध किया था व बहुत सारे मुद्दों पर पूर्व में भी जमकर विरोध किया था।

इन सबके बीच यह भी देखना दिलचस्प होगा कि जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, क्या उत्तर प्रदेश में बुआ-बबुआ की जोड़ी काँग्रेस के साथ आएगी? या चुनाव परिणाम आने के बाद ही कोई अहम फैसला लेगी।

अगड़ी जाति का वोट महत्वपूर्ण

चुनाव में सफलता अगड़ी जाति के वोट बैंक पर निर्भर करती है। इस नए गठबंधन के बनने के बाद इस तरह की चर्चा आम होने लगी है कि 2019 चुनावों में दलित, जाट, मुसलमान और यादव वोट बैंक की आखिर कितनी अहमियत होगी।

इस चर्चा के बीच हम अकसर यह भूल जाने की गलती कर बैठते हैं कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सफलता के लिए अगड़ी जाति यानि सवर्णों का वोट बैंक बेहद महत्वपूर्ण है। कई आंकलनों में यह बात सामने आई है कि उत्तर प्रदेश में कुल वोटर्स का 25 से 28 फीसदी हिस्सा अगड़ी जातियों का है, जिसमें ब्राह्मणों की संख्या सबसे अधिक है।

लंबे वक्त तक प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ रहने वाली काँग्रेस भी अपनी चुनावी सफलता के लिए अगड़ी जाति के वोट बैंक के समर्थन पर निर्भर करती थी।

काँग्रेस के बाद राज्य की सत्ता क्षेत्रीय पार्टियों, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के हाथों में रही। यहां वक्त के साथ बीजेपी का भी उदय हुआ। फिलहाल प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी की ही सरकार है और उनकी चुनावी सफलता काफी हद तक अगड़ी जाति के वोट बैंक के समर्थन पर निर्भर है।

बीजेपी के लिए फायदेमंद रहा है अगड़ी जाति का वोट

इससे पहले मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर साल 1991 और 1993 में बीजेपी उत्तर प्रदेश में सत्ता का स्वाद चख चुकी है मगर इस बार समीकरण विपरीत हैं।

बीते कई चुनावों के दौरान सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़) ने जो सर्वे किए हैं, उनके अनुसार लोकसभा या विधानसभा चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा हो या बुरा, प्रदेश में 50 फीसदी से अधिक अगड़ी जाति के वोट पार्टी के खाते में गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। फोटो साभार: Getty Images

साल 1996 और 1998 के लोकसभा चुनावों में यानि 11वीं और 12वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों में अगड़ी जाति के 54 फीसदी वोट बीजेपी को मिले। वहीं, 1999 के लोकसभा चुनावों में यह मत प्रतिशत बढ़कर 63 फीसदी हो गया।

2004 और 2009 के लोसकभा चुनावों में बीजेपी को अगड़ी जाति के 52 फीसदी वोट मिले, जबकि 2014 के चुनावों में मत प्रतिशत का यह आंकड़ा बढ़ कर 60 फीसदी तक पहुंचा।

बेहद महत्वपूर्ण है 2019 लोकसभा चुनाव

अगर मुद्दों की बात करें तो यह चुनाव भारत के आगामी 5 वर्षों की प्रगति को तो प्रभावित करता ही है और साथ ही साथ भविष्य में बहुआयामी नीतियों को प्रभावित करने वाला भी होगा। अपने करियर के अंत बिंदु पर खड़ा जवान और खेतों में खड़ा किसान इस चुनाव को काफी हद तक प्रभावित करेंगे।

फोटो साभार: सोशल मीडिया।

देश के सामने त्रासदी के रूप में खड़ा आतंकवाद ,आंतरिक सुरक्षा का मसला, लाखों-लाख आदिवासियों को उनकी स्थायित्व का मसला, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य व कृषि सुधार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक हनक होने का मसला आदि पूरी तरह से चुनाव को प्रभावित करेंगे।

तो आइए हम सभी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के महापर्व को काफी धूमधाम से मनाएं व भारत के बेहतर भविष्य के लिए अपने वोट की चोट से भारत और भारत के लोगों के हितों को भूलने वाले लोगों को सत्ता से पदस्थ करें व एक बेहतर भारत निर्माण के स्वप्न को पूरा करने में अपना समुचित योगदान दें।

जैसा कि मेरे आदर्श कवि आदरणीय राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की पंक्तियां इन बातों को चरितार्थ करती हैं-

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।


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