भारतीय राजनीति महिलाओं का स्वागत क्यों नहीं करती?

आधुनिक भारतीय राजनीति में कई ऐसी महिलाएं रही हैं, जिनकी ऐतिहासिक भूमिका से हम भलीभांति परिचित हैं। स्वतंत्रता के आंदोलनों के दौरान से लेकर आज़ाद भारत में सरकार चलाने तक में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका और पहल अहम रही है।

बावजूद इसके जब राजनीति में महिला भागीदारी की बात आती है तो आंकड़ें बेहद निराशाजनक तस्वीर पेश करते हैं। प्रत्यक्ष (एक्टिव पॉलिटिक्स में महिलाओं की भागीदारी) और अप्रत्यक्ष (वोटर्स के रूप में भागीदारी) दोनों स्तर पर ही भारी गैर-बराबरी से हमारा मुठभेड़ होता है।

हालांकि महिला वोटर्स की अगर बात करें तो स्थिति पहले से थोड़ी बेहतर हुई है। 1980 से 2014 के बीच महिला वोटर्स की संख्या में 15 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ है।

विश्वस्तर पर अगर भारत की एक्टिव पॉलिटिक्स में महिलाओं की स्थिति की बात करें तो भारत 193 देशों में 141वें स्थान पर है। विश्वस्तर पर संसद में 22.6 फीसदी महिलाओं की भागीदारी है। जिसमें भारत का औसत सिर्फ 12 फीसदी है। वहीं रवांडा में 63.8% प्रतिशत महिला सांसद हैं, नेपाल में 29.5 फीसदी, अफगानिस्तान में 27.7 फीसदी, चीन में 23.6 फीसदी हैं।

आज़ादी से लेकर वर्तमान समय में भारतीय राजनीति में महिलाओं की स्थिति

भारत में आज़ादी के बाद पहली केंद्र सरकार (जवाहरलाल नेहरू की सरकार में) के 20 कैबिनेट मिनिस्ट्री में सिर्फ एक महिला (राजकुमारी अमृत कौर) थीं, जिन्हें हेल्थ मिनिस्ट्री का चार्ज सौंपा गया था।

लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में एक भी महिला को जगह नहीं दी गई। यहां तक कि इंदिरा गांधी की 5वीं, 6ठीं, 9वीं कैबिनेट में भी एक भी महिला यूनियन मिनिस्टर नहीं थीं। राजीव गांधी की कैबिनेट में सिर्फ एक महिला (मोहसिना किदवई) को शामिल किया गया।

मोदी सरकार में महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। आज 23 कैबिनेट मिनिस्ट्री में 6 महिलाएं हैं। यूनियन कैबिनेट मिनिस्ट्री में महिलाओं का प्रतिशत 5 प्रतिशत था जो 2014 में बढ़कर 26 प्रतिशत हुआ है।

हालांकि, सीपीआई (एमएल) लीडर कविता कृष्णन का कहना है कि इससे स्थिति ठीक नहीं हुई है। इस सरकार ने सिर्फ कैबिनेट मिनिस्टर के रूप में महिलाओं को शामिल किया है लेकिन उनको कोई खास पावर नहीं है। वह रक्षा मंत्रालय का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि एयर स्ट्राइक जैसे मामले में भी निर्मला सीतारमण का कोई इंगेजमेंट नहीं था, उन्हें बस राफेल मामले में प्रवक्ता के रूप में रख दिया गया है।

भारत में महिला वोटर्स की स्थिति

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1980 से 2014 के बीच महिला वोटर्स की संख्या में 15 प्रतिशत इज़ाफा हुआ है। 1980 में महिला वोटर्स की संख्या जहां 51 प्रतिशत थी, वहीं 2014 में बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई है।

1990 में महिला वोटर्स की संख्या में इज़ाफा होना शुरू हुआ था और 2014 के लोकसभा चुनावों में अब तक का सबसे अधिक महिला मतदान हुआ।

लेकिन अभी भी स्थिति को पूरी तरह से बेहतर नहीं माना जा सकता है। प्रतिशत के मामले में महिला वोटरों की स्थिति कमज़ोर तो है ही साथ ही जो महिलाएं वोट देने जा भी रही हैं उनमें से एक बड़ा प्रतिशत वोट के मामले में खुद से निर्णय लेने में सक्षम नहीं है। उनका वोट किस पार्टी या किस लीडर को जाएगा इसका फैसला घर के पुरुष द्वारा ही होता है और वे उन्हीं निर्देशों को फॉलो करते हुए वोट देने जाती हैं।

दिल्ली के आनंद विहार में रहने वाली 40 वर्षीय प्रियम्यदा बताती हैं कि उनके घर में सारे सदस्य एक ही राजनैतिक पार्टी को वोट देते हैं और वोट देने जाने से पहले हमें बताया जाता है कि हमें किस पार्टी को वोट देना है। कारण पूछने पर उनका कहना था कि हम मुख्यत: राजनीति से सीधे तौर पर जुड़ी नहीं हैं इसलिए वोट किसको देना है, इसका फैसला हमारे घर के पुरुष ही करते हैं।

अगर बात करें राज्यों के हिसाब से महिला वोटर्स के प्रतिशत की तो 2014 लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में महिला वोटर्स का प्रतिशत सबसे कम था (राज्य की आबादी के अनुपात में)। जबकि अरुणाचल प्रदेश में स्थिति ठीक इसके उलट देखने को मिली थी, जहां महिलाओं के सेक्स रेशियो के हिसाब से महिला वोटर्स की संख्या ज़्यादा देखने को मिली थी। इस राज्य में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं ने ज़्यादा वोट दिया था।

कविता कृष्णन का कहना है कि महिलाओं का घर से बाहर निकलकर वोट करना बहुत ज़रूरी है। इसलिए ज़रूरी है कि सरकार और राजनैतिक पार्टियां अपने मेनिफेस्टो में महिलाओं को केंद्र में रखें।

वह आगे बताती हैं, “महिला सुरक्षा पर बात करना तो ज़रूरी है ही लेकिन इसके साथ ही महिलाओं के कई अहम मुद्दे होते हैं जिसे अकसर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, उनके अधिकारों की बात को शामिल किया जाए ताकि महिलाओं की दिलचस्पी भी वोट देने में हो। उन्हें इस बात का एहसास हो कि सरकार बनाने में उनका योगदान भी ज़रूरी है।”

एक्टिव पॉलिटिक्स में महिलाओं की स्थिति

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एक्टिव पॉलिटिक्स में महिलाओं की बुरी स्थिति के लिए ज़िम्मेदार सिर्फ राजनीतिक पार्टियों ही नहीं बल्कि हमारा समाज भी है, जो महिलाओं को राजनीति में स्वीकारने को तैयार नहीं होता है।

प्रियंका गांधी अगर राजनीति में आती हैं तो उनके कपड़े से लेकर उनके नैन नक्श पर टिप्पणी की जाती है। प्रियंका को लेकर यह बातें भी खूब कहीं गईं कि खूबसूरत महिला राजनीति में क्या ही कर पाएगी।

वहीं शरद यादव का वसुंधरा राजे पर कमेंट तो आपको याद ही होगा जब उन्होंने उनके मोटापे पर कमेंट करते हुए का था कि वसुंधरा राजे मोटी हो गई हैं, उन्हें आराम की ज़रूरत है।

इसी तरह ममता बनर्जी, मायावती, सुषमा स्वराज से लेकर तमाम उन महिला राजनीतिज्ञ को इस तरह के कमेंट्स झेलने पड़ते हैं। उनकी किसी भी विफलता पर उनके महिला होने के एंगल को सामने ला दिया जाता है, जबकि विफलता एक पुरुष राजनीतिज्ञ को भी झेलनी पड़ती है।

महिलाओं को राजनीति में कमज़ोर बताए जाने को लेकर दिए जाने वाले तर्क-

  1. महिला कैंडिडेट के जीतने की उम्मीद बहुत कम होती है।
  2. महिलाएं अपने घरेलू काम के बीच राजनीति में एक पुरुष के मुकाबले समय नहीं दे पाती हैं।
  3. महिलाओं को राजनीतिक समझ कम होती है इसलिए अगर वे जीतकर भी आती हैं तो महिला विभाग, शिशु विभाग जैसे क्षेत्र तक सीमित रखा जाता है। हालांकि आज इसके अपवाद भी देखने को मिल रहे हैं, जिसका एक बेहतर उदाहरण डिफेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण हैं।

1. जहां तक बात है महिला कैंडिडेट के जीतने की तो अंतिम तीन लोकसभा चुनाव में महिला कैंडिटडेट के जीतने का प्रतिशत पुरुषों से ज़्यादा रहा है। 2014 के चुनाव में महिला कैंडिडेट का सक्सेस रेट 9 प्रतिशत था जबकि पुरुषों का 6 प्रतिशत।

16वें लोकसभा चुनाव में जीतकर आई महिला कैंडिडेट की संख्या सबसे ज़्यादा थी। बावजूद आज भी कई राजनीति पार्टियां महिलाओं को तवज्जों नहीं देती हैं, इसका असर होता है कि बहुत कम ही महिलाएं एक्टिव पॉलिटिक्स में आ पाती हैं।

1952 से 2014 तक लोकसभा में महिलाओं की स्थिति

Representation-of-Women-in-Lok-Sabha-1952–2014
चार्ट सोर्स- https://yka.io/2VxmrxO

जेनरल इलेक्शन में महिलाओं के लिए आवंटित सीटें

Seats-Allotted-to-Women-in-Recent-General-Elections
चार्ट सोर्स- https://yka.io/2VxmrxO

 

बिहार की बीजेपी यूथ लीडर अमृता भूषण का कहना है कि महिलाएं चुनाव जीतती नहीं हैं, यह बात गलत है। जब आप चुनाव लड़ते हैं तो पार्टी की बात होती है, एजेंडा की बात होती है और व्यक्तिगत कैंडिडेट की बात होती है। महिला या पुरुष की नहीं।

चुनाव में महिलाओं के जीतने का प्रतिशत भी पुरुषों से ज़्यादा देखा जाता है। मुझे लगता है कि महिलाओं का नाम सही जगह पर रखने वाले लोग शायद कम होते हैं। उनका कहना है कि बीजेपी में इस बार महिलाओं को ज़्यादा सीटें मिलने की उम्मीद है।

2. महिलाओं के राजनीति में कम समय देने के तर्क पर राजद की एमएलए इजया यादव का कहना है कि एक महिला कैंडिडेट को अपने क्षेत्र में एक पुरुष कैंडिडेट के मुकाबले ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। पुरुष कैंडिडेट को घर के अंदर नहीं लेकर जाता है। एक महिला कैंडिडेट बाहर भी सभा करती है और लोगों के घर के अंदर जाकर महिलाओं से भी मिलती है।

3. राजनीति में महिलाओं का प्रतिशत कम होने की वजह से महिलाओं को कैबिनटे के बंटवारे में अकसर इग्नोर भी किया जाता है। उन्हें अमूमन फाइनैंस, होम, डिफेंस और हेल्थ जैसे क्षेत्र अलॉट नहीं किए जाते हैं इसके बदले उम्हें वुमेन, चिल्डेंन, क्लचर जैसे विभाग सौंप दिए जाते हैं।

चुनाव प्रचार में शामिल महिलाएं लीडरशीप तक क्यों नहीं पहुंच पाती?

अधिकांश पार्टियों में यह देखा जाता है कि चुनाव प्रचार में या पार्टी के अन्य कार्यों में महिलाओं की भागीदारी बड़ी संख्या में होती है लेकिन जब बात चुनाव में उतरने की होती है तो उसका एक छोटा प्रतिशत ही सामने आ पाता है। यह स्थिति लेफ्ट पार्टियों में भी बड़े स्तर पर देखने को मिलती है।

इस बारे में कविता कृष्णन का कहना है कि बिलकुल मैं इस बात को एक्सेप्ट करती हूं। सभी पार्टियों में महिला कार्यकर्ता को लीडर के रूप में तैयार करने की ट्रेनिंग की कमी है। हमें इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत है, तभी राजनीति में महिलाओं की स्थिति में सुधार आ सकता है।

महिला आरक्षण

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राजनीति में महिलाओं की स्थिति बेहतर करने के लिए ज़रूरी है कि राजनीति में महिला रिज़र्वेशन लाया जाए, जो पिछले कई सालों से अधर में अटका पड़ा है। संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का बिल 2010 में पास करा लिया गया था लेकिन लोकसभा में समाजवादी पार्टी, बीएसपी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियों के भारी विरोध की वजह से यह बिल पास नहीं हो सका।

उस वक्त कॉंग्रेस की सरकार थी और कॉंग्रेस के पास बहुमत नहीं था लेकिन आज मोदी सरकार के पास बहुमत होने के बावजूद यह बिल पास नहीं हो पाया है।

देवेगौड़ा की सरकार ने सबसे पहले 1996 में संसद में महिला आरक्षण बिल पेश किया था। 2010 में राज्यसभा में बिल पास तो हो गया लेकिन लोकसभा में कॉंग्रेस को बहुमत नहीं होने की वजह से लोकसभा में यह बिल पास नहीं हो सका।

राजनीति में महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियां

आरजेडी से एमएलए (मोहिउद्दीन नगर विधानसभा क्षेत्र) इजया यादव राजनीति में महिलाओं के कम प्रतिशत का कारण बताते हुए कहती हैं कि समस्या यह है कि महिलाओं के काबिल होने के बावजूद उन्हें मौका नहीं मिलता है। महिलाओं में अकसर पुरुषों से बेहतर लीडरशीप क्वालिटी देखी जाती है बावजूद उन्हें कम ही आंका जाता है।

एक महिला राजनेता के रूप में आने वाली समस्या के बारे में बीजेपी यूथ लीडर अमृता का कहना है कि पीआर के स्तर पर हम महिला राजनेताओं को समस्या का सामना करना पड़ता है। एक पुरुष जितनी आसानी से पीआर कर सकते हैं वह एक महिला के लिए मुश्किल होता है। वजह, फील्ड में ज़्यादातर पुरुष ही हैं, वे बेझिझक कहीं भी बैठते हैं, बातें करते हैं, जबकि महिलाओं के साथ कई बार बाधा हो जाती है।

राजनीति में नेपोटिज़्म और महिलाएं

कई महिलाएं चुनाव जीतकर तो आती हैं लेकिन उन्हें कहां, क्या और कैसे फैसले लेने हैं, इस सबका निर्धारण उनके घर के पुरुष ही करते हैं। हालांकि यह स्थिति पंचायत चुनावों में ज़्यादा देखने को मिलती है। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के मामले में तस्वीर थोड़ी अलग है।

राजनीति में नेपोटिज़्म पर बात करते हुए इजया यादव कहती हैं कि मुखिया के स्तर पर घर के पुरुष हावी ज़रूर होते हैं, जिसका बड़ा कारण ग्रामीण परिवेश और उस महिला की शिक्षा में कमी होती है लेकिन विधानसभा के स्तर पर ऐसा नहीं है।

अगर एक पुरुष भी MLA है तो परिवार के सहयोग के बिना वह काम नहीं कर पाएगा। राजनीति एक इंसान की बस की बात नहीं है, परिवार का इंगेजमेंट होता ही है। वह आगे बताती हैं, “मैं ही MLA हूं, मैं सबकुछ खुद कर तो लेती हूं लेकिन मुझे सपोर्ट की ज़रूरत होती है, खासकर सिक्योरिटी के मामले में।

वहीं अमृता बताती हैं कि मुखिया लेवल पर नेपोटिज़्म की समस्या है, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में महिलाएं ज़्यादा निकलती नहीं हैं लेकिन आपको एक निश्चित प्रतिशत में महिला कैंडिडेट को लाना ही होता है। इस तरह वे पुरुष जो अपना अस्तिव बनाए रखना चाहते हैं, वे अपनी पत्नियों को खड़ा करना चाहते हैं। इस परिस्थिति में उनको मजबूरी भी है महिला को खड़ा करना।

विधानसभा, लोकसभा स्तर पर नेपोटिज़्म पर बात करते हुए अमृता कहती हैं, “इस स्तर पर नेपोटिज़्म की स्थिति कम होती है लेकिन ऐसा नहीं है कि बिलकुल ही नहीं है। कोई कद्दावर नेता जो किसी वजह से चुनाव नहीं लड़ पाता है, तो अपनी पत्नी को खड़ा करता है। हालांकि यह स्थिति बेहद कम देखने को मिलती है।”

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