क्या मोदी सरकार ने बिहार के किसानों के साथ भेदभाव किया है?

किसानों के कल्याण के लिए केंद्र सरकार द्वारा संचालित योजनाओं में प्रमुख पांच योजनाओं को हमने चिन्हित किया, जिनमें बजट का आवंटन सबसे अधिक होता है।

इन योजनाओं के नाम हैं-

  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन
  • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना
  • परंपरागत कृषि विकास योजना
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना
  • प्रति बूंद अधिक फसल प्रधानमंत्री सिंचाई योजना

इन योजनाओं की पड़ताल करने पर पता चला कि बिहार सरकार किस तरीके से इन्हें संचालन कर रही है और मोदी सरकार द्वारा किस तरह बड़े पैमाने पर इन योजनाओं में बिहार के साथ भेदभाव किया गया है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन

लोकसभा में प्रस्तुत किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में वित्तीय वर्ष 2015-16 से लेकर 2018-19 तक बिहार के हिस्से का कुल 385.24 करोड़ रुपये था लेकिन वास्तव में मात्र 166.41 करोड़ रुपये ही बिहार को दिए गए। यह आवंटित बजट का मात्र 44.64% है।

साभार: loksabha.nic.in
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यदि नीतीश सरकार द्वारा केंद्र सरकार से प्राप्त राशि के बदले में खर्च का ब्यौरा देखें तो केंद्र सरकार से प्राप्त कुल 166.41 करोड़ रुपए में से बिहार सरकार ने मात्र 101.5 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। यह प्राप्त बजट का 60% है।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना कृषि क्षेत्र के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण योजना है। इस योजना में मोदी सरकार ने बिहार के साथ भेदभाव किया है। आंकड़े बताते हैं कि वित्तीय वर्ष 2015-16 से लेकर 2018-19 के बीच में बिहार के लिए आवंटित 766.77 करोड़ रुपए में से मोदी सरकार ने मात्र 353.79  करोड़ रुपए बिहार को दिए हैं।

साभार: loksabha.nic.in
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यह कुल आवंटित बजट का मात्र 46.14% है। यदि नीतीश जी के खर्च का ब्यौरा देखें तो उन्होंने पिछले चार सालों में प्राप्त बजट में से मात्र 211 करोड़ रुपए खर्च किए, जो कि प्राप्त बजट का मात्र 59.67% है।

परंपरागत कृषि विकास योजना

भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस योजना में बिहार सरकार ने एक भी रुपया खर्च ही नहीं किया है। परंपरागत कृषि विकास योजना मोदी सरकार की अति महत्वाकांक्षी योजना है। इस योजना में पिछले चार वर्षों में बिहार सरकार ने भारत सरकार से प्राप्त बजट का एक भी रुपया खर्च नहीं किया है।

साभार: loksabha.nic.in
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आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2015-16 से लेकर 2018-19 के बीच बिहार के लिए आवंटित 35.96 करोड़ रुपए में से मोदी सरकार ने बिहार को मात्र 19.28 करोड़ रुपए दिए, जो कि कुल आवंटित बजट का मात्र 53.61% है। पिछले 4 साल के कार्यकाल में बिहार सरकार ने एक भी रुपया इस योजना के अंतर्गत खर्च नहीं किया है। बिहार जैसे गरीब राज्य के लिए काफी शर्म की बात है।

सॉइल हेल्थ कार्ड योजना

प्रधानमंत्री मोदी की अति महत्वाकांक्षी ‘सॉइल हेल्थ कार्ड योजना’ का बहुत प्रचार किया गया और कहा गया कि इस योजना ने क्रांति ला दिया है। सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार और नीतीश कुमार ने बिहार के किसानों के साथ भद्दा मज़ाक किया है।

आंकड़े बताते हैं कि इस योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2015-16 से लेकर 2018-19 के बीच बिहार के लिए आवंटित 44.31 करोड़ रुपए में से मोदी सरकार ने मात्र 14.56 करोड़ रुपए बिहार को दिया, जो कि कुल आवंटित बजट का मात्र 32.85% है।

साभार: loksabha.nic.in
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अगर नीतीश जी की इस योजना में खर्च का ब्यौरा देखें तो वह शर्मसार करने वाली है। नीतीश सरकार ने पिछले 4 वर्षों में मात्र 4.34 करोड़ रुपए खर्च किया, जो कि केंद्र सरकार से प्राप्त राशि का मात्र 29.80% है।

प्रति बूंद अधिक फसल प्रधानमंत्री सिंचाई योजना

यह योजना भी बहुत महत्वाकांक्षी योजना है और इसके बारे में भी मोदी सरकार और नीतीश कुमार ने काफी प्रचार किया है। इस योजना में भी मोदी सरकार ने बिहार के किसानों के साथ खिलवाड़ किया है और खुलेआम भेदभाव किया है।

सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2015-16 से लेकर 2018-19 के बीच इस योजना के अधीन बिहार के लिए आवंटित बजट 177 करोड़ रुपए में से मोदी सरकार ने मात्र 72.05 करोड़ रुपए जारी किया। यह कुल आवंटित बजट का मात्र 40.48% है।

यदि इस योजना में नीतीश सरकार द्वारा हुए खर्च का ब्यौरा देखें तो बिहार सरकार ने केंद्र सरकार से प्राप्त कुल 72.5 करोड़ रुपए में से मात्र 39.94 करोड़ रुपए खर्च किए, जो कि कुल प्राप्त बजट का मात्र 55.43% है।

Source: Lok Sabha

इन योजनाओं के आंकड़ों को देखकर ऐसा लगता है कि बिहार के किसानों के साथ मोदी सरकार ने वाकई भेदभाव किया है। ऐसी कोई योजना नहीं है जिसमें बिहार सरकार के हिस्से के आवंटित बजट का 100% पैसा मोदी सरकार ने बिहार को दिया हो।

यह आंकड़े मोदी सरकार के किसानों के विकास के दावों की पोल खोलते हैं जिससे उनके बिहार प्रेम की बात भी गलत साबित होती दिखाई पड़ रही है। नीतीश कुमार जी के किसान प्रेमी होने के दावे को भी यह आंकड़े खारिज करते हैं क्योंकि कम बजट प्राप्त होने के बावजूद भी किसी योजना में वह अच्छे तरीके से खर्च नहीं कर पाए।

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