क्यों स्टूडेंट्स के लिए ज़रूरी है अनुशासन में रहना

समाज के निर्माण में अनुशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अनुशासन ही मनुष्य को श्रेष्ठता प्रदान करता है तथा उसे समाज में उत्तम स्थान दिलाने में सहायता करता है।

विद्यार्थी जीवन में तो इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है क्योंकि इस समय व्यक्तित्व निर्माण प्रांरभ होता है। दूसरे शब्दों में, विद्यार्थी जीवन को किसी भी मनुष्य के जीवनकाल की आधारशिला कह सकते हैं क्योंकि इस समय वह जो भी गुण अथवा अवगुण आत्मसात करता है, उसी के अनुसार उसके चरित्र का निर्माण होता है।

अनुशासन में रहने वाले स्टूडेंट्स सदैव परिश्रमी होते हैं

कोई भी विद्यार्थी बिना अनुशासन के महत्व को समझे सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है। अनुशासन प्रिय विद्यार्थी नियमित विद्यालय जाता है तथा कक्षा में अध्यापक द्‌वारा कही गई बातों का अनुसरण करता है। वह अपने सभी कार्यों को उचित समय पर प्रारंभ करता है तथा उसे उचित समय पर समाप्त करने की चेष्टा भी करता है।

स्टूडेंट्स
फोटो साभार: Getty Images

अनुशासन में रहने वाले विद्यार्थी सदैव परिश्रमी होते हैं। उनमें टालमटोल की प्रवृत्ति नहीं होती तथा वह आज का कार्य कल पर नहीं छोड़ते हैं। उनके यही गुण धीरे-धीरे उन्हें सामान्य विद्यार्थियों से एक अलग पहचान दिलाते हैं।

जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन का उपयोग है

अनुशासन केवल विद्यार्थियों के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में इसका उपयोग है लेकिन इसका अभ्यास कम उम्र में अधिक सरलता से हो सकता है। अत: कहा जा सकता है कि यदि विद्यार्थी जीवन से ही नियमानुसार चलने की आदत पड़ जाए तो शेष जीवन की राह सुगम हो जाती है।

ऐसे विद्यार्थी ही आगे चलकर देश की राह संभालेंगे। कल इनके कंधों पर ही देश के निर्माण की ज़िम्मेदारी आएगी। अत: आवश्यक है कि ये कल के सुयोग्य नागरिक बनें और अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन धैर्य और साहस के साथ करें।

अनुशासन के स्तर में गिरावट आने की वजह

  • बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा के दौर में आज लोग व्यस्त जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जिससे माता-पिता अपनी संतान को वांछित समय नहीं दे पाते हैं। इसी कारण बच्चों में असंतोष बढ़ता है और अनुशासनहीनता उनमें जल्दी घर कर जाती है।
  • इसी प्रकार विद्यालय के कुछ स्टूडेंट्स जब परीक्षा या किसी प्रतिस्पर्धा में असफल हो जाते हैं तो वे कुंठा से ग्रसित हो जाते हैं। उनका असंतोष दूसरे विद्यार्थियों के अनुशासन पर भी प्रभाव डालता है।
  • देश की बढ़ती जनसंख्या भी अनुशासनहीनता के लिए उत्तरदायी है। देश के कुछ विद्यालयों की स्थिति ऐसी हो गई है कि 35-40 की क्षमता वाली कक्षाओं में 150 विद्‌यार्थी पढ़ रहे हैं।
  • कोई भी व्यक्ति स्वत: अनुमान लगा सकता है कि एक अध्यापक किस प्रकार सीमित समय में इतने बच्चों को ठीक ढंग से शिक्षा प्रदान कर सकता है।

अनुशासनहीनता के पथ पर चलने वाले कुसंगति को प्राप्त होते हैं

यह प्रामाणिक तथ्य है कि अनुशासन के बिना मनुष्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर सकता है। विद्यार्थी जीवन में इसकी आवश्यकता इसलिए सबसे अधिक है क्योंकि इस समय विकसित गुण-अवगुण ही आगे चलकर उसके भविष्य का निर्माण करते हैं।

अनुशासन के महत्व को समझने वाले विद्यार्थी ही आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर व ऊंचे पदों पर आसीन होते हैं लेकिन जो अनुशासनहीनता के पथ पर चलते हैं वह शीघ्र ही कुसंगति के कुचक्र में फंस जाते हैं और सच्चाई तथा न्याय के मार्ग से विचलित हो जाते हैं।

फलस्वरूप जीवन में वे ईर्ष्या, लालच, घृणा और क्रोध आदि बुराइयों के अधीन होकर अपना भविष्य अंधकारमय बना लेते हैं। अनुशासनहीनता को अच्छी शिक्षा व उचित वातावरण देकर नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है ताकि विद्यार्थी उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसित हो सके।

अनुशासन में रहने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे राष्ट्र की उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।

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