क्या संसद का धार्मिकरण संवैधानिक परम्पराओं का अपमान है?

बड़ा ही विचित्र नज़ारा था, अखाड़े में कुश्ती कुछ इस तरह शुरू होगी किसी ने भी नहीं सोचा था। यहां तक कि इतिहास भी इस तरह की कुश्ती का कभी प्रत्यक्षदर्शी नहीं बना है। देश के दक्षिणी छोर के राज्य से नवनिर्वाचित सांसद, संसद में अपनी गोपनीयता की शपथ के लिए आते हैं और तभी उनके साथी ऊंची-ऊंची ध्वनि के साथ मेज थपथपाते हुए “जय श्री राम” के नारे लगाने लगते हैं।

ऐसे नहीं होना था शपथ ग्रहण!

नवनिर्वाचित सांसद भी दबी सी मुस्कान के साथ अपने दोनों हाथों से अपने मित्रों के जोश को बढ़ाते हैं और शपथ प्रक्रिया पूरी करते हैं और इसके साथ-साथ शपथपत्र के अंत में “अल्लाह हू अकबर” का भी उच्चारण करते हैं। फिर उत्तर प्रदेश राज्य से एक नवनिर्वाचित प्रतिनिधि आते हैं और “भोले बाबा” के नाम का उद्धघोष करते दिखते हैं। फिर पंजाब की नेत्री कुछ इसी तरह की जय जयकार करती हैं।

इस पूरे कार्यक्रम में कहीं किसी ने अपने पिता के नाम को ही गलत बता डाला तो किसी ने वंदे मातरम को ही असंवैधानिक बतलाया। इस पूरे घटनाचक्र में सबसे विचित्र बात ये रही कि कइयों ने अपने धर्म को देश के ऊपर रखा। क्या भारत जैसे लोकतान्त्रिक और पंथनिरपेक्ष देश के लिए यह हितकर है? ये घटना आने वाले 5 वर्षों के संभावित घटनाचक्र को कहीं धूमिल तो नहीं कर रही?

सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत कैसे बनेगा उदाहरण

भारत का लोकतन्त्र समूचे विश्व के लोकतन्त्र के लिए एक उदाहरण है। बात उस वक्त की है जब देश में प्रथम बार चुनाव हो रहे थे और आज़ादी के महज़ 5 वर्षों के भीतर भारत देश को अपने आपको समस्त विश्व के सामने प्रस्तुत करना था। समस्त विश्व इस बात से संदेह में था की एक नवनिर्मित राष्ट्र जो कि आर्थिक एवं सामाजिक आयामों में पिछड़ा हैं वो कैसे एक भावी लोकतन्त्र का निर्माण कर सकता है।

अमेरिका, ब्रिटेन जैसे विकसित देश इस बात को भलीभांति जान रहे थे कि भारत के बंटवारे के बाद जो वीभत्स आकार इन दोनों देशों के लोगों ने महसूस किया है (भारत एवं पाकिस्तान) उसका खामियाज़ा भारत के चुनाव पर पड़ेगा। भारत में पहली बार चुनाव हुए और पूरे उमंग के साथ वयस्क, नवयुवती, नवयुवक, महिलाएं, बुज़ुर्ग सबने अपनी हिस्सेदारी दी और 45.7 प्रतिशत मतदान (जो उस समय की अभूतपूर्व घटना रही होगी) चुनाव आयोग के द्वारा दर्ज की गई।

सबसे महत्वपूर्ण बात भारत के प्रथम चुनाव में यह रही कि भारत के मतदाता वर्ग ने अपने मत का प्रयोग मज़हब, जाति, समुदाय से ऊपर उठकर किया था। क्या हम इसका अनुमान लगा सकते हैं कि 1952 के दौर में हमारे देश की साक्षरता दर क्या रही होगी? मगर लोगों ने समूचे विश्व में एक कीर्तिमान स्थापित किया था। क्या वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद हम उन तमाम ऐतिहासिक गवाहों का मंथन नहीं कर सकते? क्या उन मुद्दों, उन विश्वासों, उन जटिलताओं का पुनः निरीक्षण आज के सांसदों द्वारा नहीं किया जा सकता?

1967 के चुनाव का ज़िक्र करता हूं, जब भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कॉंग्रेस का शासन था और इंदिरा गांधी कॉंग्रेस पार्टी का मोर्चा संभाल रही थीं। उस वक्त भी पार्टी दो भागों में विभाजित थी, “कॉंग्रेस (आर) एवं कॉंग्रेस (ओ)। एक पार्टी के अंदर भी दो विचारधाराओं का बंटवारा देश को एक गलत संदेश दे रहा था। मगर ये दो विचारधाराएं मज़हब के हिसाब से नहीं थी और ना ही समुदाय एवं जाति के उपरांत।

कितना बदल गया संसद!

ये बंटवारा उस आंतरिक सोच के बलबूते अपना पैर पसार रहा था। क्या उस वक्त की राजनीति में और आज की राजनीति, आज के संसद में कोई अंतर है? आज का संसद उस वक्त के संसद से कितना बदल गया है?

पश्चिम में महान विचारक जॉर्ज विलियम हेगेल ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों में राज्य (देश) को सर्वोपरि माना है और इनके सिद्धांतों के कुछ भागों का अनुसरण कार्ल मार्क्स भी किया करते थे। भारत के प्रमुख राजनीतिक विचारक महात्मा गांधी, दादाभाई नैरोजी, एम एन रॉय आदि ने भी राष्ट्र के हित को सर्वोपरि माना है। मगर देश के सबसे बड़े घर में इस तरह की घटना का होना हमें और आगाह करता है कि इस देश की मौलिक संरचना में कहीं छेड़छाड़ ना हो जाए।

भारत में चुनाव आयोग ने समय-समय पर चुनाव में सुधार करने के लिए भिन्न-भिन्न समितियां बनाई हैं जैसे- “वी एम तारकुंदे समिति (1975), दिनेश गोस्वामी समिति (1990), इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) आदि जिसमें कई प्रावधान शामिल किए गए हैं और चुनाव में शामिल होने वाले उम्मीदवार पर कड़ी निगरानी रखी है जैसे धर्म, जाति संप्रदायों के आधार पर मतदाताओं से अपील नहीं की जा सकती, चुनाव प्रचार में पूजा स्थलों का प्रयोग वर्जित है।

नवनिर्वाचित सांसदों का इस प्रकार संसद में शपथ लेने की प्रक्रिया हमारे संवैधानिक ढांचे के ऊपर हंसी और ठिठोली का पात्र बन चुका है। यह घटना उन तमाम अलोकतान्त्रिक विचारधाराओं और अतिवादियों को हमारे पवित्र पंथनिरपेक्ष संविधान को हेय दृष्टि से देखने का अवसर प्रदान कर चुका है। वक्त है इस तरह कि बेज़ुबानी फिर ना कभी संसद में और ना ही कभी सड़कों पर सुनने को मिले। तभी हम अपने देश के सार्वभौमिक विकास में सम्पूर्ण योगदान दे सकेंगे।

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