औद्योगिकरण के विकास में गुम होती चिड़ियों की चहचहाहट

“पंछी नदियां पवन के झोकें कोई सरहद ना इन्हें रोके” रिफ्यूजी फिल्म का यह गीत या हुसैन भाइयों की मशहूर गज़ल “मैं हवा हूं, कहां वतन मेरा।” सुनकर एक सुकून सा महसूस होता है। कुदरत के रंगों का ख्याल आना ही मानसिक प्रसन्नता का प्रतीक माना जा सकता है। मेरा बचपन से बड़े होने तक का सफर, दो-तीन शहरों से जुड़ा है।

उसमें से एक शहर है, जो जंगल और पहाड़ से घिरा हुआ है। एक छोटा मगर सुन्दर शहर जमशेदपुर। जब मैं 9वीं में पढ़ता था, तो कई बार हम हुडको पार्क, जो एक छोटे से पहाड़ के ऊपर बना है, वहां चले जाते थे। वहां से शहर और पास की हरियाली देखकर शाहरुख खान के बांहों को खोलने वाला पोज़ मारकर, ठंडी हवा को महसूस करते हुए अपने एकतरफा और बचपन वाली मोहब्बत में गुम अपनी गर्लफ्रेंड का नाम पुकारकर प्यार का इज़हार करना, एक अद्भुत फीलिंग देता था।

वहां बैठकर मैंने कई दोस्तों के लव लेटर्स लिखे हैं और शायद मेरे अंदर के आर्टिस्ट को सामने लाने का क्रेडिट वहां की हवा, पेड़-पौधे और पंछियों को भी जाता है। आज भी जब अंदर से शून्यता महसूस होती है, तो मैं अक्सर अपने गाँव पंजाब जाकर कुछ दिन रह आता हूं। हमारा पुश्तैनी घर गाँव के बाहर खेतों में बना है, तो छत पर चढ़कर शायद उन्हीं एहसासों को अपनी आंखों में समा लेना चाहता हूं, जो हुडको पार्क के पहाड़ पर करता था।

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर।

वैसे हुडको जाने का सिलसिला कई सालों तक जारी रहा लेकिन धीरे-धीरे अलग-अलग प्रकार के पंछी दिखने कम हो गए। वहां अब सिर्फ काले कौवे या इक्का-दुक्का गौरैया चिड़िया ही नज़र आती थी जबकि कुछ साल पहले बटेर, बुलबुल, कोयल, राम चिरैया और भी बहुत-सी प्रजाति, जिसका नाम हमें नहीं पता मगर दिख जाती थी। जैसे-जैसे औद्योगिक शहर का विकास हुआ प्रकृति का नुकसान होता गया। 

इंडस्ट्रियल प्रदूषण हो या किसानों के पराली जलाने से निकला प्रदूषण, हर राज्य एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगा रहा है लेकिन इसे कंट्रोल करने का मामला सिर्फ फाइलों तक ही रह जाता है। अभी मैं पिछले महीने जब पंजाब गया था, तब गेंहू की कटाई हो गई थी। ऐसे में पराली जलाने का काम शुरू था।

मैंने कुछ किसानों से इस सिलसले में बात भी कि लेकिन सबका कहना था कि सरकार ने मामले में कोई तैयारी नहीं की है। बस एक फरमान जारी कर दिया गया कि जो पराली जलाता पकड़ा जाएगा उसपर कार्रवाई होगी मगर प्रशासन को पता है कि कर्ज़ का मारा किसान हर एकड़ पर कुछ हज़ार का खर्च कहां से करेगा? इसलिए वह भी कार्रवाई नहीं करते। “कई बार कार्रवाई हो भी तो जाती होगी?” मेरे इस सवाल पर वह बोले, “पाजी पेहला वी ते अस्सी कर्ज़े विच मर्रे पये या थोड़ा केहर होर होजेगा कार्रवाई।”

इस बात ने मेरी ज़ुबान बंद कर दी और मैं नज़रें झुकाकर वहां से चला गया। मुझे लगता है कि प्रदूषण के लिए हम सभी ज़िम्मेदार हैं। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए हमें ही कुछ करना होगा। हम पेड़ लगा सकते है और जल संरक्षण के ज़रिये भी सराहनीय कार्य की आशा है।

इसमें सबसे बड़ा योगदान सरकार को ही देना होगा। केंद्र और राज्य सरकार दोनों को मिलकर इंडस्ट्रियल प्रदूषण को सबसे पहले कंट्रोल करना होगा और किसानों की पराली ना जलाने को प्रोत्साहित करने के लिए हर एकड़ के खर्चे को सब्सिडी द्वारा सरकार का वहन करना एक अच्छा हल हो सकता है।

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