कल को तबरेज़ की जगह कोई अपना होगा तो?

मन बेचैन है, सोचती हूं, लिखूं तो क्या लिखूं और कहूं तो क्या कहूं? तबरेज़ की तस्वीर दिमाग में छाई हुई है। उसका चेहरा ज़हन से निकलना मुश्किल हो गया है। उसपर और उसके परिवारवालों पर क्या बीती होगी जब उसे बेरहमी से पीटा गया होगा! यह सब सोचकर डर लगता है, कल को तबरेज़ की जगह कोई अपना होगा तो? मेरे वतन के लोग तो ऐसे नहीं थे। यह कैसे इंसान थे, जिन्होंने एक इंसान की जान ले ली?

लोग मुझसे अक्सर पूछा करते हैं,“क्या तुम्हारे घर में भी पाकिस्तान के मैच जीतने पर खुशी मनाई जाती है?” हर बार की तरह मैं गुस्से में झटककर कहती हूं, “क्यों मनाई जाएगी?” कल को अगर मेरा नाम पूछकर किसी के मन में वही भाव आ गया जो तबरेज़ के लिए आया था तो कल कोई और इस नफरत के हत्ते चढ़ जाएगा। पहलू खान की तस्वीर आज भी ज़हन के किसी कोने में दबी है, जो अक्सर आज के माहौल के कारण याद आ जाती है। मुझे इस डर का एहसास तब हुआ जब अब्बा ने अकेले सफर के लिए निकलते वक्त कहा, “किसी को कहना नहीं कि तुम मुसलमान हो। ज़्यादा बातचीत भी मत करना।” कौन हैं वह लोग जो दिल में इतनी नफरत लिए फिरते हैं? क्या मेरे भी आसपास है? मगर मुझे कोई दिखता नहीं।

बचपन में इतिहास की क्लास के बाद एक दोस्त ने सवाल किया था कि तुम क्यों नहीं गई थी बंटवारे के वक्त? मेरे पास जवाब नहीं था। असल में मुझे यह बात मालूम ही नहीं थी। अम्मी से पूछा तो उन्होंने कहा, “हमें अपना यह वतन प्यारा है इसलिए हमारा घर यही है। हमने यही अपनी पहली सांस ली है और आखिरी भी यही लेंगे।” अम्मी की वह बात अब तक याद है मगर अक्सर सोचती हूं कि क्या अब मेरी बात कोई सुनेगा? अगर किसी ने मेरा भी नाम सुनकर मझे भी देशद्रोही ठहरा दिया तो? अगर उन्हें अम्मी की कही हुई बात पर यकीन ना हुआ तो? क्या हुआ होगा तबरेज़ और उन लोगों के दरमियां? अगर तबरेज़ की तरह मेरी भी आवाज़ ना पहुंची तो?

मैं और मेरी एक मुस्लिम दोस्त, अक्सर इस डर और दर्द के बारे में सोचकर खो जाते हैं और हंसकर एक दूसरे को गुस्सा दिलाने के लिए पूछते हैं, “मुस्लमान हो तुम? देशद्रोही तो नहीं हो?” मगर इस सवाल में अपनी वफा और देशभक्ति साबित करने का एक डर है, जो उस दिन सबके सामने आ ही गया जब मुल्क फिल्म का वह सीन क्लास में देखने पर हमदोनों की आंखें नम हो गई। हम जानना नहीं चाहते कि वह क्या चीज़ थी, जो हमारे भारत को ‘लिंचिस्तान’ नाम दे गई मगर यह नफरत ही तो थी जो एक इंसान का खून कर गई।

इस नफरत को हमें मिटाना होगा क्योंकि डर लगता है, कल को एक और तबरेज़ इस नफरत की चपेट में आ गया तो? यह नफरत उसकी भी जान का सबब बन गयी तो? डर लगता है।

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