“पीरियड्स पर बात करना आज भी चरित्र का मुद्दा क्यों है?”

बीएचयू से मास्टर्स करने के दौरान स्वाति ने जब पहली बार दोस्तों के बीच पीरियड्स का मुद्दा उठाया, तो उनके एक रिसर्च स्कॉलर मित्र ने उनके चरित्र पर ही सवाल उठा दिया। स्वाति को यह बात बेहद खली और उन्होंने ठान लिया कि वह इसी मुद्दे पर काम करेंगी।

रीवा (मध्य प्रदेश) में जन्मीं स्वाति मूलत: बनारस की रहने वाली है, जिनके माता-पिता उन्हें प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहते थे लेकिन लेखन क्षेत्र में रुचि रखने वाली स्वाति ने सामाजिक कार्यों के क्षेत्र को चुना, जिसमें भी पैरेंट्स का भरपूर सपोर्ट मिला।

किस्सा माहवारी पर काम करने का

जब स्वाति वर्ष 2015 में बीएचयू से जर्नलिज़्म एंड मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स  कर रही थी, तब पहली बार उनके दोस्तों की बातचीत में पीरियड्स का मुद्दा आया। उस बातचीत में स्वाति ने काफी मुखरता से हिस्सा लिया। स्वाति के सभी दोस्तों को उनकी यह बेबाकी पसंद आई, बस एक शख्स को छोड़कर जो कि एक रिसर्च स्कॉलर था।

उस वक्त तो उसने भी खूब वाह-वाह किया लेकिन अगले ही दिन इस बात को स्वाति के चरित्र से जोड़ते हुए कहा, ”जो लड़की पीरियड्स पर खुलेआम बात कर करती है, उसका कैरेक्टर अच्छा नहीं होगा।”

स्वाति को यह बात बेहद खली। इसके बाद से ही उन्होंने अपने करियर में इस विषय को शामिल करने का बीड़ा उठाया, जिसकी पहली शुरुआत उन्होंने इस मुद्दे पर लिखने से की। उन्होंने मेट्रो सिटी में माहवारी प्रबंधन के अन्य उत्पादों (मेंस्ट्रुअल कप, कॉटन सैनिटरी पैड और टैंपोन आदि) पर केंद्रित करके कई लेख लिखे।

स्वाति
लड़कियों  के बीच माहवारी जागरूकता कार्यक्रम संचालित करती हुई स्वाति।

इन लेखों को लिखने के दौरान स्वाति के मन में विचार आया कि मेट्रो सिटी में लोग माहवारी प्रबंधन के अन्य उत्पादों की बात कर रहे हैं लेकिन हमारे उत्तर भारत में तो माहवारी पर ही बात नहीं होती। बस फिर क्या था, उन्होंने जनवरी 2017 में ‘मुहीम: एक सार्थक प्रयास’ नामक वेलफेयर सोसाइटी की नींव रखी।

इस मुहीम के माध्यम से स्वाति पिछले कई वर्षों से ग्रामीण महिलाओं, किशोरियों और युवाओं के साथ माहवारी, जेंडर, यौनिकता, स्वच्छता, स्वास्थ्य एवं बाल यौन शोषण के मुद्दों के विषय में जागरूक करने का काम रही हैं। इस वेलफेयर सोसाइटी का उद्देश्य माहवारी के मुद्दे पर स्वस्थ माहौल बनाना है।

‘पीरियड अलर्ट’ की शुरुआती पहल

सदियों से हमारी भारतीय संस्कृति में माहवारी को लेकर एक अघोषित चुप्पी का माहौल रहा है। इस वजह से अब तक ना जाने कितनी महिलाओं की जान जा चुकी है और कितनी अन्य गंभीर रोगों से जूझ रही हैं। स्वाति का मानना है कि अब इस संस्कृति में सकारात्मक बदलाव करने का वक्त आ गया है। बातचीत के ज़रिये ही सही लेकिन माहवारी के मुद्दे पर स्वस्थ माहौल बनाने की दिशा में कार्य करने की ज़रूरत है।

लड़कियों को सैनिटरी पैड्स बांटती स्वाति
लड़कियों को सैनिटरी पैड्स बांटती स्वाति।

इसी विचारधारा का अनुसरण करते हुए मुहीम द्वारा माहवारी के विषय पर सर्वप्रथम ‘पीरियड अलर्ट’ नामक कैंपेन की शुरुआत हुई। इसके तहत स्वाति ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिल कर वाराणसी के पांच ब्लॉक (काशी विद्यापीठ, सेवापुरी, आराजी लाइन, चिरईगांव, चोलापुर और केराकत ) में  माहवारी पर महिलाओं और किशोरियों को जागरूक करने का काम शुरू किया।

पिछले दो वर्षों से प्रतिवर्ष माहवारी के मुद्दे पर समाज की झिझक को तोड़ने के लिए उन गाँवों में माहवारी विषय पर कला-प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है और इन प्रतियोगिताओं में विजित किशोरियों को सम्मानित किया जाता है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य माहवारी पर सकारात्मक और स्वस्थ तरीके से बात की शुरुआत करना है।

पीरियड मंत्रा के तरह चार कार्य

पीरियड अलर्ट के बाद, ‘मुहीम’ के तरफ से माहवारी पर केंद्रित वृहत कार्यक्रम ‘पीरियड मंत्रा’ की शुरुआत की गई। इस कार्यक्रम के अंतर्गत, माहवारी स्वास्थ्य, स्वच्छता, जेंडर, यौनिकता और संस्कृति को शामिल किया गया। इसमें चार तरह के कार्यक्रम चलाए जाते हैं।

माहवारी और स्वास्थ्य: स्वाति कहती हैं कि आधुनिकता के इस दौर की एक कड़वी सच्चाई यह है कि शहरों में माहवारी स्वच्छता या मेंस्ट्रुअल हाइजीन को लेकर जितना शोर-शराबा हो रहा है, उसके मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति आज भी बेहद दयनीय हैं। यहां आज भी महिलाओं और किशोरियां को ‘माहवारी क्या है’, इसके बारे में सही जानकारी नहीं है।

स्वाति
स्वाति।

इस कार्यक्रम के तहत महिलाओं और किशोरियों को माहवारी स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियां (मूलभूत जानकरियां, खानपान व संबंधित बीमारियों के लक्षण) दी जाती है। गाँव में लगातार जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है ताकि महिलाओं और किशोरियों में माहवारी स्वास्थ्य के संबंध में व्यवहारिक व वैचारिक बदलाव लाया जा सके। उल्लेखनीय है कि ‘पीरियड मंत्रा’ कार्यक्रम के तहत ग्रामीण युवाओं को पुरुषों को भी माहवारी के बारे में जागरूक किया जाता है।

माहवारी और स्वच्छता : मुहीम ने माहवारी और स्वच्छता कार्यक्रम के अंतर्गत  न केवल माहवारी के दौरान स्वच्छता के मुद्दे को शामिल किया है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और किशोरियों सूती कपड़े से बने सेनेटरी पैड के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।

जेंडर, यौनिकता और माहवारी: माहवारी का विषय सीधे तौर पर जेंडर और यौनिकता से जुड़ा हुआ है। ऐसे में बेहद ज़रूरी है कि महिलाओं और किशोरियों को जेंडर और यौनिकता से जुड़े मुद्दे के बारे में भी जागरूक किया जाए। इसी तर्ज़ पर ‘पीरियड मंत्रा’ के ज़रिये जेंडर और यौनिकता के मुद्दों पर महिलाओं को जागरूक करने की दिशा में कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

माहवारी और हमारी संस्कृति: पीरियड मंत्रा के तहत माहवारी के मुद्दे पर कला प्रतियोगिताओं का आयोजन, जन-जागरूकता रैली का आयोजन व अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों का एक उद्देश्य है माहवारी पर स्वस्थ माहौल का निर्माण करना।

पीरियड मंत्रा का ‘अपना पैड’

स्वाति बताती हैं कि गाँवों में माहवारी के दौरान महिलाएं गंदे कपड़े लेने को मजबूर होती हैं। इसके कारण कई हैं लेकिन मूल कारण है- आर्थिक विपन्नता। पीरियड मंत्रा कार्यक्रम के तहत उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं तथा किशोरियों को पुराने कपड़े को रि-यूज़ करके सैनिटरी पैड बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि उन्हें स्वच्छ सैनिटरी पैड मिल सके।

पीरियड्स के दौरान
रैली के दौरान महिलाएं।

इसके अलावा पैड निर्माण के इस कार्य को एक लघु रोज़गार के रूप में विकसित करके उनकी आर्थिक स्थिति को भी बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है। स्वाति मानती हैं कि ऐसी छोटी-छोटी कोशिशों से ही माहवारी के मुद्दे पर एक समुचित और स्वस्थ माहौल बनाया जा सकता है, जो कि सतत विकास का परिचायक भी है।

वाराणसी के 50 गाँवों में फैला है मुहीम का कार्यक्षेत्र

मुहीमे के तहत उत्तर प्रदेश के बनारस ज़िले के आस-पास के करीब पचास गाँवों में माहवारी स्वच्छता एवं जागरूकता विषय पर काम किया जा रहा है। इसमें बनारस के काशी विद्यापीठ ब्लॉक, आराजी लाइन ब्लॉक, चोलापुर ब्लॉक, सेवापुरी ब्लॉक और केराकत ब्लॉक (जौनपुर) के गाँव- देलहना, बंदेपुर, बछांव, खनाव, बेटावर, रामपुर, लठिया, खुशीपुर, बछांव, मड़ाव, नरउर, खुल्लसपुर, परमंदापुर, केसरीपुर, हरपालपुर, हरिहरपुर, रामपुर, माधोपुर छितौनिकोट, नागेपुर, भीखमपुर, हरसोस, बेनीपुर, असवारी, चिरईगांव और रतनपुर जैसे करीब पचास से अधिक गाँव शामिल हैं।

‘मुहीम’ की अब तक की उपलब्धियों पर एक नज़र

  • अब तक करीब सात हज़ार महिलाएं और किशोरियां इस ‘मुहीम’ का हिस्सा बन चुकी हैं। इनमें से करीब तीन हज़ार महिलाएं और किशोरियां सक्रिय सदस्य के रूप में काम कर रही हैं।
  • ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों द्वारा प्रतिमाह करीब एक हज़ार ‘अपना पैड’ का निर्माण किया जा रहा है।
  • ‘मुहीम’ के प्रयास से सेवापुरी ब्लॉक के गाँव में स्थित पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजकीय बालिका डिग्री कॉलेज में पहली बार सैनिटरी पैड की वेंडिंग मशीन लगवाई गई। संस्था के साथ हुए अनुबंध के तहत कॉलेज में किशोरियों के साथ पीरियड्स पर उनके व्यवहार परिवर्तन के विषय पर भी लगातार काम किया जा रहा है।
  • ‘मुहीम’ के माध्यम से दिसंबर 2017 में पहली बार बनारस में रेडियो पर बातचीत का कार्यक्रम (रेडियो सिटी) पर आयोजित किया गया।
  • जनवरी 2018 में पहली बार बनारस के किसी गाँव में (आदर्श ग्राम नागेपुर) माहवारी पर पहली बार जन-जागरूकता रैली का आयोजन किया गया।
  • मुहीम के माध्यम से जिन भी गाँवों में माहवारी जागरूकता अभियान चलाया जा गया है, वहां महिलाएं और किशोरियां इस विषय पर मुखर हुई हैं। इसका परिणाम यह रहा कि किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम में एक ना एक किशोरी या महिला का भाषण माहवारी पर ज़रूर होता है।
  • ‘मुहीम’ के माध्यम से स्वाति सिंह को मासिक धर्म पर ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के लिए वर्ष 2018 में लाडली मीडिया सम्मान सहित अन्य कई सम्मान और पुरस्कार मिल चुके हैं।

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