“सरकार अगर कुपोषण पर ध्यान देती तो चमकी बुखार से मरते नहीं मासूम बच्चे”

बिहार के मुज़फ्फरपुर में चमकी बुखार से मरने वाले बच्चों का आंकड़ा 100 के पार जा चुका है। वहीं काफी विवाद के बाद मंगलवार को राज्य के मुख्यमंत्री का भी इस मामले को लेकर मुज़फ्फरपुर का दौरा हुआ। मीडिया रिपोर्ट की माने तो स्वास्थ्य केन्द्रों पर मरीज़ों की काफी भीड़ है और डॉक्टर और दवा की कमी के कारण इस बिमारी से निपटने में खासी परेशानी हो रही है।

मुज़फ्फरपुर के दो बड़े स्वस्थ्य केंद्र SKMCH और केजरीवाल अस्पताल के वार्ड-ICU में मरीज़ों के लिए जगह नहीं है। हालांकि राज्य सरकार की तरफ से कई तत्कालीन कदम उठाए गए हैं लेकिन अभी भी काफी कुछ किए जाने की आवश्यकता है। बच्चों की चमकी बुखार से हो रही मृत्यु पर कई पक्ष सामने आ रहे हैं, जिसमें बिहार के मुख्यमंत्री ने लोगों के बीच जागरूकता की कमी को एक कारण माना है मगर बिहार में स्वास्थ्य का मुद्दा जितना आसान ऊपर से नज़र आता है, उसकी जड़ें गरीबी और कुपोषण से जुड़ी हैं, जो बिहार की एक महत्वपूर्ण समस्या है।

बच्चों में 57 फीसदी तक स्टंटिंग की समस्या

फोटो सोर्स- Getty

यूनिसेफ के अनुसार स्टंटिंग (बौनापन) को कुपोषण का प्रमुख लक्षण माना गया है, जबकि एन.एफ.एस.एच-4 रिपोर्ट के अनुसार बिहार में कुल 38 ज़िलों में से कई ऐसे ज़िले हैं, जिनमें बच्चों में स्टंटिंग 57 फीसदी तक पाई गई थी। इनमें सीतामढ़ी और मुज़फ्फरपुर जैसे ज़िले शामिल हैं। बच्चों में कुपोषण का कारण उचित आहार और स्तनपान में की गई कमी होती है और यह चौंकाने वाली बात है कि उपरोक्त रिपोर्ट के अनुसार मुज़फ्फरपुर में स्तनपान में कमी के मामले 79 फीसदी तक दर्ज किए गए हैं, जो सभी ज़िलों में सर्वाधिक था। ऐसे में जागरूकता के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य देखभाल और उनके पोषण पर भी और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

डॉक्टरों की है भारी कमी

अगला पक्ष स्वास्थ्य सेवाओं का है, जिसमें बिहार की स्थिति काफी निम्न है। 2018 में बिहार विधानसभा सत्र में एक प्रश्न के जवाब में यह जानकारी सामने आई कि बिहार में प्रति 17685 लोगों पर महज़ एक डॉक्टर काम करता है, जो राष्ट्रीय औसत से 6588 व्यक्ति अधिक है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन ने प्रति 1000 लोगों पर एक डॉक्टर को उचित माना है। ऐसे में यह बात साफ हो जाती है कि स्वास्थ्य सेवाओं को सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।

अन्य स्वास्थ्य योजनाओं में भी कोताही

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शिशु के बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल की भी स्थिति निम्न है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट–4 के अनुसार बिहार में पूर्ण टीकाकरण कवरेज, जिसमें 12 से 23 माह के बच्चे शामिल हैं कि स्थिति पश्चिम चम्पारण में काफी निम्न थी, जो महज़ 29 फीसदी थी। डायरिया से प्रभावित बच्चों को दिया जाने वाला ORS मुज़फ्फरपुर में महज़ 30 फीसदी बच्चों को ही मिल पाता है। हालांकि उपरोक्त रिपोर्ट में 2016 तक के आंकड़ों को शामिल किया गया है, जबकि इस रिपोर्ट के 2018 में आने के बाद राज्य सरकार द्वारा कई कदम उठाने की बात कही गई थी लेकिन मुज़फ्फरपुर के मामले के बाद यह बात साफ हो गई है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में ज़मीनी स्तर पर अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।

समस्या यह है कि किसी भी राज्य सरकार द्वारा पूर्व में नीतिगत रणनीति और नीतिगत कार्यान्वयन में अभाव देखा जाता है। इस घटना के पूर्व गोरखपुर में हुए हादसे भी इसके गवाह हैं, जिसमें कई मासूमों की जान गई थी। हर हादसे के बाद मुद्दे फिर से उभरते हैं लेकिन उस पर ठोस रणनीति नहीं बन पाने के कारण समस्याएं और मुद्दे वहीं रह जाते हैं। बस छूट जाते हैं तो उससे प्रभावित लोगों के दुख और दर्द। ऐसे में केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी एक ठोस रणनीति पर काम करने की ज़रूरत है, तभी ऐसे मामलों से मज़बूती से निपटा जा सकता है।

 

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