“मेरे मोहल्ले के चाचा मुसलमान दोस्तों को सलाह देते थे कि हिन्दुओं से दूर रहो”

मैं बचपन में जिस मुस्लिम मोहल्ले में रहता था, वहां एक भी गैर-मुस्लिम परिवार नहीं था। हमेशा यही सुनता था कि अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने का कोई फायदा नहीं है। अगर कोई मुसलमान पढ़ भी ले, तो उसे नौकरी नहीं मिलती और आखिरकार उसे बाप का ही काम करना पड़ता है। ऐसे में ज़्यादा पढ़ाने-लिखाने का फायदा ही क्या!

बस कम-से-कम इतना पढ़ ले कि हिसाब-किताब तो कर ही ले और यह सोच भी गिने-चुने लोगों की ही थी। बाकी ज़्यादातर मुसलमानों के बच्चे तो कबाड़े की दुकान, वेल्डिंग की दुकान और बाइक मैकेनिक की दुकान पर 20-50 रुपये की दिहाड़ी पर काम करने लग जाते थे। उस मोहल्ले का एक भी लड़का प्राइमरी के बाद आगे नहीं पढ़ा। लड़कों को लेकर माँ-बाप की ही सोच जब ऐसी हो, तो पढ़ पाना वाकई में मुश्किल है।

मुसलमानों को हिन्दुओं से दोस्ती ना रखने की नसीहत दी जाती थी

उस मोहल्ले से मेरे साथ 3-4 बच्चे भी मेरे स्कूल में पढ़ा करते थे मगर स्कूल में उनका कोई भी गैर मुस्लिम दोस्त नहीं था, सिर्फ मैं और मेरी बहन के ही दोस्त थे, जो हमारे घर आते-जाते रहते थे। हमारे साथ जो बच्चे स्कूल जाते थे, उनके स्कूल में गैर-मुस्लिम दोस्त इसलिए नहीं थे क्योंकि उनके माँ-बाप ने उन्हें यह हिदायत दी थी कि मुसलमानों के अलावा किसी और को दोस्त नहीं बनाना चाहिए, वे काफिर होते हैं।

यह खास बात एक अंकल जी ने मुझे भी समझाई थी कि इन हिंदुओं को अपने घर मत बुलाया करो और इनसे दोस्ती भी खत्म कर दो। कभी-कभार जब मेरे कुछ हिन्दू दोस्त मेरे घर आते थे, मेरे मोहल्ले के कुछ मुसलमान लड़के उनपर गोश्त के छीछड़े फेंका करते थे ताकि वे फिर उस मोहल्ले में दोबारा ना आएं।

उस बचपने में भी मेरी दोस्ती मेरे दोस्तों से इतनी पक्की थी कि उन्होंने कभी मेरे घर आना नहीं छोड़ा। मैं अपने मोहल्ले के उन मुस्लिम लड़कों में से किसी एक का नाम भी याद नहीं रख पाया जबकि 18-19 साल बाद भी मेरे हिंदू दोस्त आज मेरे अच्छे दोस्त हैं।

यह तो मुझे पता नहीं कि किस दौर में मुसलमानों के मन में यह बात डाल दी गई कि उन्हें सरकार और समाज में हिस्सा नहीं दिया जाएगा। वे पढ़ भी लें तो भी उन्हें वह हैसियत और रुतबा नहीं मिलेगा जैसा कि अन्य लोगों को मिलता है। इस बात का ठीक से पता नहीं लगाया जा सकता कि वह कौन सी वजह थी कि मुसलमान एक झुंड में रहना ज़्यादा फायदेमंद और महफूज़ समझने लगे।

आखिर मुस्लिम बस्तियों में ही क्यों रहना चाहते हैं मुसलमान?

यह बात ज़रूर है कि मुसलमानों के साथ हुए अत्याचार (खासकर दंगों में) ने उन्हें इस बात पर आमादा कर दिया कि वे एक झुंड, एक समूह और एक मोहल्ले में रहें तो सुरक्षित हैं लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी दंगे हुए, मुसलमान अपने ही मोहल्ले या इलाके में सुरक्षित नहीं रहे, बल्कि उन्हीं मोहल्लों में ज़्यादा मार-काट हुई। जो मुसलमान किसी बाहरी इलाके या हिंदू बहुल क्षेत्र में रहते थे, वे ज़्यादा सुरक्षित रहे।

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार: Getty Images

जिस देश में लगभग सभी बड़े और खास ओहदों पर मुसलमान काबिज़ रहे हों, जिस देश का पहला शिक्षा मंत्री मुसलमान हो, जिस देश में 3-3 मुसलमान राष्ट्रपति रहे हों, जिस मुल्क में 4 मुसलमान इस देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश रहे हों और जिस मुल्क में एपीजे अब्दुल कलाम साहब जैसे महान वैज्ञानिक हों उस देश के बाकी मुसलमान यह सोचे कि उन्हें इस देश में हिस्सेदारी नहीं मिलेगी या उन्हें दूसरे मज़हब के लोग दुश्मन ही समझते हैं, यह बात मेरे गले नहीं उतरती।

आज मुसलमान जिस भी हालत में हैं, इसमें किसी दूसरे का कोई हाथ नहीं है। इन्होंने खुद को इस मुकाम पर खड़ा किया है कि लोग उनसे नफरत या दुश्मनी ही करें या उन्हें शक की नज़रों से देखा जाए। 

खुद को मुसलमानों ने इतना अलग-थलग कर लिया है कि आम लोगों में उनके बारे में जानकारी बेहद कम है। ठीक उसी तरह जैसे एलियन किसी दूसरी दुनियां में रहते हैं, हम दुनियां वालों को वे अजीब, टेढ़ी-मेढ़ी शक्ल सूरत वाले, डरावने खतरनाक जानवर लगते हैं।

एक ऐसी प्रजाति में मुसलमान तब्दील हो गए हैं जिनके बारे में साइंटिस्ट अभी भी कुछ नहीं जानते। क्यों मुसलमानों ने खुद को एक छोटे से दायरे में सीमित करके रखा हुआ है? मैं इस देश के कई शहरों में घूमा हूं, कई-कई दिनों तक रहा भी हूं। अगर इस देश की मुस्लिम आबादी 17-18 करोड़ है, तो मैं यह कह सकता हूं कि उसमें से सिर्फ 1% मुस्लिम ही सिर्फ गैर-मुस्लिम या पॉश इलाकों में रहते होंगे, क्योंकि मैंने इस देश के कई हाई-फाई इलाके देखे हैं जहां सिर्फ हिन्दू, जैन, सिख या अन्य मज़हब के लोग रहते हैं मगर मुसलमान नहीं!

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार: pixabay

देश के तमाम हिन्दुओं के ज़हन में मुसलमानों के लिए कई तरह के पूर्वाग्रह हैं, जिसके कारण वे उनसे प्रेम तो कर नहीं सकते। इसका खामियाज़ा वे चंद मुसलमान भी उठाते हैं जो एक अच्छी ज़िंदगी जीना चाहते हैं, पढ़े-लिखे समाज में रहना चाहते हैं। इन सबके बीच मुसलमानों को किराए पर घर ना देने की खबरें तो आम हो चली हैं।

मुसलमानों ने अपने आप को इस हद तक एलियन बना लिया कि कोई बाहरी इंसान उनके बारे में ना तो अधिक जानता है और ना ही उनके मोहल्ले में आना चाहता है। इसमें मुसलमानों की ही गलती है क्योंकि जब लोग उनके बारे में जानेंगे ही नहीं फिर पूर्वाग्रह तो बनेंगे! मुसलमानों को सामने आकर बताना होगा कि उनके बारे में गलत छवि बनाई जा रही है।

मुसलमानों को अपने बच्चों को आज़ादी देनी होगी

मुसलमान को अपने माथे पर लिखकर या झंडे लेकर प्रचार करने की ज़रूरत नहीं है कि वे समझदार लोग हैं। उन्हें बस यह करना है कि अपने बच्चों को उन मोहल्लों से निकालकर बाहर सब के साथ रहना होगा। बच्चों को (लड़का-लड़की दोनों) को स्कूल भेजना होगा। मुसलमान के बच्चे जब स्कूल में हर मज़हब के बच्चो से मिलेंगे-जुलेंगे, तो वे दोनों एक-दूसरे के बारे में जानेंगे। एक-दूसरे के रहन-सहन और कल्चर को पहचानेंगे। एक-दूसरे के लिए दोस्ती वाली सोच विकसित होगी और एक-दूसरे के घर आना-जाना होगा तभी वे एक-दूसरे के मज़हब की इज्ज़त करना सीखेंगे।

मेरे या मेरे तमाम भाई बहन जो भी बचपन से सबके साथ पढ़े हैं और अब नौकरी कर रहे हैं, उनके साथ आज तक किसी भी हिंदू सहपाठी या सहकर्मी ने कोई दोगलापन, कोई बत्तमीज़ी या किसी भी तरह का दुर्व्यवहार नहीं किया है।

मेरे सिर्फ दो मुस्लिम दोस्त हैं

मैं यह बात पूरी गारंटी के साथ कह सकता हूं कि मेरे सिर्फ दो दोस्तों के अलावा कोई मुस्लिम दोस्त नहीं है। आज तक जहां भी काम किया, वहां सिर्फ हिंदू ही रहे थे और हैं, किसी ने भी मुझे इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि मैं मुसलमान हूं, उनसे अलग हूं और ना ही मैंने कभी यह सोचा कि ये मुसलमान नहीं हैं तो मुझे इनसे बचकर रहना चाहिए।।

बचपन से आज तक जितने भी मेरे दोस्त या कलीग हुए हैं, हम सब ने हमेशा एक ही थाली में खाना खाया है। यहां तक कि एक जैनी का व्यवहार भी मेरे साथ बिल्कुल भाई के समान रहा है।

मेरे इस अनुभव से बात पानी की तरह साफ हो जाती है कि अगर मुसलमान खुद को दबाकर, छुपाकर रखेगा तो उसके साथ ऐसा ही सौतेला और एलियन जैसा व्यवहार किया जाएगा। अगर एक मुसलमान पढ़-लिखकर सिर्फ 10 गैर-मुस्लिमों का नज़रिया बदलने में कामयाब हो गया तो समझो 170 करोड़ लोगों का नज़रिया बदलने में कामयाब हो जाएगा और हिंदुस्तान में तो हिंदुओं की आबादी 130 करोड़ ही है।

कितना अच्छा होगा वह माहौल जब ईद पर हिंदू भी हमारी खुशी में शामिल होंगे और मुसलमान भी होली के रंगों में रंगा होगा। मैं उन सभी दोस्तों और सहकर्मियों का शुक्रगुज़ार हूं जिन्होंने मुझे कभी एहसास नहीं होने दिया कि मैं उनसे अलग हूं। शुक्रिया उन सभी कंपनियों के मालिकों का जिन्होंने मेरी काबिलियत पर मुझे नौकरी दी। कई जगह तो मैं सीनियर भी रहा लेकिन कभी किसी ने यह नहीं कहा कि एक मुसलमान कैसे उनपर हुक्म चला सकता है।

कभी-कभी इस देश में लगता है अब हिंदू-मुसलमानों में एक खाई आ जाएगी लेकिन चंद मौकापरस्तों के मंसूबों पर मेरे दोस्तों जैसे करोड़ो हिंदू-मुसलमान पानी फेर देते हैं। यह सदियों से चली आ रही मोहब्बत का नतीजा है जिसे हमारी आने वाली पीढ़ी और मज़बूत करेगी लेकिन बस शर्त एक ही है कि उन्हें स्कूल जाने से रोका ना जाए।

उन गुफाओं जैसी बस्तियों से बाहर निकला जाए और सबके साथ मिलकर रहा जाए। अब वक्त है कि मुसलमान अपने रहन-सहन और जीने का ढर्रा बदले, नहीं तो तेज़ी से बदलते हिंदुस्तान की रफ्तार में मुसलमान इतना पिछड़ जाएगा कि फिर दोबारा उस आधुनिक हिंदुस्तान को छू नहीं पाएगा जिसकी तमन्ना उनके बच्चे पंक्चर लगाते हुए करेंगे।

क्या मुसलमान उस मुख्य धारा में नहीं मिल सकते जहां अच्छे घर, अच्छे स्कूल, साफ-सुथरे मोहल्ले, आर्मी में भर्ती, देश में टैक्स जमा करने में ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सेदारी हो। डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, कलाकार और शिक्षक नहीं बन सकते मुसलमानों के बच्चे? क्या मुसलमान उल्टे तवे पर बड़ी-बड़ी रोटी बनाते हैं? आसमान की तरफ सर उठाकर दुआ मांगते हैं? मक्का में शिवलिंग रखा है आदि-आदि जैसे सवालों के घेरे से कभी बाहर ही नहीं निकल पाएंगे अगर उन्होंने अपने आपको नहीं बदला तो।

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